गुडग़ांव (मज़दूर मोर्चा) केन्द्रीय श्रममंत्री मनसुख मांडविया को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ चुकी है कि बीमाकृत मज़दूरों को आवश्यक चिकित्सा सुविधा देने के लिए मौजूदा अस्पताल पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए मेडिकल कॉलेज खोलने जरूरी हैं। इसी के चलते उन्होंने कुछ माह पूर्व देश भर में 10 नए मेडिकल कॉलेज इसी वर्ष यानी 2025 में चालू करने का आदेश दिया था।
मंत्री जी का ऐसा सराहनीय फैसला जानने के बाद ‘मज़दूर मोर्चा ने सुझाव दिया था कि गुडग़ांव जहां 15 लाख बीमाकृत मज़दूर रहते हैं, में भी मेडिकल कॉलेज खोलने की सख्त जरूरत है। इसी तरह विशाखापट्टनम व पुणे (महाराष्ट्र) में भी ऐसी ही आवश्यकता है। खुशी की बात यह है कि मंत्री जी ने इसी सप्ताह गुडग़ांव में मेडिकल कॉलेज खोलने का फैसला कर लिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मानेसर में जहां चार साल पूर्व कॉर्पोरेशन ने आठ एकड़ ज़मीन हरियाणा सरकार से खरीदी थी उसके आस-पास अतिरिक्त भूमि खरीद कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल बनाया जाएगा। लगता है मंत्री जी को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ चुकी है कि बीमाकृत मज़दूरों को पर्याप्त एवं आवयश्क चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने के लिए मेडिकल कॉलेजों का खोलना अति आवश्यक है। इन मरीज़ों को व्यापारिक अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल खोलने से जहां मज़दूरों को बेहतरीन सुपर स्पेशलिटी वाली चिकित्सा सेवाएं सुलभ हो सकती हैं वहीं देश को पर्याप्त मात्रा में डॉक्टर भी उपलब्ध हो सकेंगे जिनकी आज भारी कमी चल रही है। बेशक, पूरी तरह से तो भ्रष्टाचार इन मेडिकल कॉलेजों में भी नहीं रोका जा सकेगा लेकिन उतनी खुली लूट तो नहीं ही हो पाएगी जो अभी तक व्यापारिक अस्पताल इलाज के नाम पर कॉर्पोरेशन को लूट रहे हैं। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह की लूट में कॉर्पोरेशन अधिकारियों की भी अच्छी-खासी हिस्सा-पत्ती रहती है। इसी के चलते ईएसआई मुख्यालय में बैठे भ्रष्ट एवं नालायक कमिश्नरों का गिरोह मेडिकल कॉलेजों के खुलने का सदैव विरोध करता आ रहा है। लेकिन मौजूदा श्रम मंत्री मांडविया ने इनके विरोध को दरकिनार करते हुए मेडिकल कॉलेजों को खोलने का सिलसिला शुरू कर दिया है।
श्रम मंत्री मांडविया को केवल मेडिकल कॉलेज खोलने से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उन्हें मुख्यालय में बैठे उन नालायक एवं हरामखोर अफसरों से भी सख्ती के साथ निपटना चाहिए जो मेडिकल कॉलेजों एवं अन्य चिकित्सा सेवाओं को ढंग से चलने नहीं दे रहे। दूर जाने की जरूरत नहीं, मंत्री जी की नाक के नीचे, बसई दारापुर में चल रहे मेडिकल कॉलेज अस्पताल को ही ध्यान से देख लेना चाहिए। इस अस्पताल में कभी शत-प्रतिशत बिस्तर फुल रहते थे अब 35 से 50 प्रतिशत बिस्तर ही भर पाते हैं। जाहिर है कि यहां चिकित्सा सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं जिसके चलते मरीजों को इधर-उधर रे$फर करके पल्ला झाड़ लिया लिया जाता है। और तो और खुद मेडिकल कमिश्नर कमलेश हरीश अपना इलाज बसई दारापुर में कराने की बजाय बेशर्म होकर $फरीदाबाद चली आती हैं। यही अकेली नहीं मुख्यालय का हर छोटा-बड़ा अधिकारी जब देखो तब फरीदाबाद के मेडिकल कॉलेेज मेें इलाज कराने पहुंचा रहता है, मंत्रीजी को इसका संज्ञान लेना चाहिए। उनका आना-जाना तो सरकारी खर्च पर हो जाता है, लेकिन जिन सैंकड़ों मरीजों को इधर से उधर भटकाया जाता है उनकी चिंता मुख्यालय में बैठे इन कमिश्नरों को जरा भी नहीं है। इन हालात में श्रममंत्री को चाहिए कि चिकित्सा सेवाओं में आगे बढऩे के साथ-साथ मुख्यालय में वर्षों से भरे-पड़े कूड़े की भी साफ-सफाई करें।
ईएसआई कॉर्पोरेशन एक ऐसा राष्ट्रीय उपक्रम है जिसके द्वारा देश भर की तमाम चिकित्सा सेवा सम्बन्धी आवश्यकताओं को तो केवल पूरा किया ही जा सकता है बल्कि चिकित्सा शिक्षा में भी बड़ा योगदान किया जा सकता है। इसमें सरकार की ओर से कोई खर्च नहीं किया जा सकता। इसमें केवल मज़दूरों व उद्यमियों की भागीदारी रहती है। इसकी तमाम सीमाएं भी कॉर्पोरेशन द्वारा ही समय-समय पर तय की जाती हैं। जरूरत है तो केवल इस उपक्रम को ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के साथ चलाने की।