फरीदाबाद (म.मो.) समय-समय पर आई हरियाणा सरकारों ने जमकर अरावली की संरक्षित वन-भूमि पर कब्जे कराए। सैंकड़ों की संख्या में फार्म हाउस, बैंक्वेट हॉल, गौशालाएं, स्कूल-कॉलेज व कॉलोनियां, मंदिर आदि के अवैध निर्माण होने दिए गए। इसके एवज में तमाम सम्बन्धित विभागों के अफसरों व नेताओं ने अच्छी-खासी लूट कमाई कर डाली। जब सुप्रीम कोर्ट की आंख खुली तो इन तमाम अवैध निर्माणों को हटाने के आदेश जारी किए। इसके साथ-साथ यदि सुप्रीम कोर्ट उन अफसरों के विरुद्ध भी कार्रवाई करती, जिन्होंने यह सब होने दिया, तो कहीं ज्यादा अच्छे नतीजे आ सकते थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना के नाम पर जिस तरह का खेल तमाशा जि़ला प्रशासन कर रहा है उससे भारी खर्चे के बावजूद परिणाम कोई खास निकलते नजर नहीं आ रहे। प्रशासन बड़े फार्म हाउसों तथा बड़ी अट्टालिकाओं को छूने से बचता हुआ गरीब लोगों के छोटे-मोटे घरों पर अपनी जोर आजमाइश कर रहा है। पहले दौर में जहां खोरी गांव के दसियों हजार परिवारों को उजाड़ा था अब नम्बर लगा है सैंकड़ों वर्ष पुराने गांव अनंगपुर का। समय के साथ-साथ गांव की आबादी बढऩे के चलते गांव का फैलाव होना स्वाभाविक था जो हुआ भी। अब प्रशासन इन्हीं घरों को तोडऩे पर उतारू है, दर्जनों घर तोड़ भी दिए।
ऐसा ही एक घर जय भड़ाना का भी है। सन 1934 के राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार जय के दादा स्वर्गीय जयमल ने करीब पांच एकड़ के प्लॉट पर अपनी 100 से अधिक गायों का बाड़ा बनाया था। जाहिर है उस वक्त न तो आज की तरह बिजली व अन्य नागरिक सुविधायें होती थीं और न ही पक्की छतों वाले कमरे बनाने सम्भव थे। इसलिए छान-छप्पर व अधकच्ची-पक्की दीवारें खड़ी करके गुजारा किया जाता था। जय व उसके भाई पक्का मकान बना कर सन् 1976 से हाउस टैक्स आदि का नियमित भुगतान करते आ रहे थे। सन् 1981 में उन्होंने बिजली कनेक्शन भी ले लिया था। दादा जयमल की तरह इनके बाड़े में आज भी करीब ढाई सौ गायें हैं। इसी जगह पर दादा जयमल और पिता चंद्ररूप की समाधियां हैं और एक मंदिर भी है। इन सब बातों से बढ़कर वन विभाग द्वारा जारी किए गए एक पत्र के अनुसार बीते ढाई सौ वर्षों से इन को काबिज माना गया है। इस सबके बावजूद एक जुलाई को प्रशासन ने भारी दल-बल के साथ इनके तमाम कमरों को ध्वस्त कर दिया। इन्हें सामान तक निकालने का समय नहीं दिया। घर की महिलाओंं को पुलिस वालों ने बालों से पकड़ कर बुरी तरह घसीटा। घर के लड़कों को इस तरह पीटा गया जैसे कि वे आतंकवादी हों। जय के अनुसार इस विद्वेषपूर्ण क्रूर कार्रवाई के पीछे स्थानीय सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर का हाथ है।
इस प्रशासनिक गुंडागर्दी को लेकर पूरा अनंगपुर गांव, अपने सारे मतभदे भुलाकर एकजुट होकर खड़ा हो गया। मर्दों के साथ-साथ महिलाएं भी रानी झांसी का रूप धर कर मैदान में डटीं। सारे गांव ने जम कर उस कृष्णपाल गूजर व धनेश अधलखा को कोसा व गालियां बकीं, जिन्हें इन्होंने बतौर सांसद व विधायक चुना था। विदित है कि इस गांव पर कृष्णपाल गूजर का अत्यधिक प्रभाव रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि उनके घरों को तो ढूंढ-ढूंढ कर तोड़ा जा रहा है जबकि सड़क पर खुले में खड़ी अट्टालिकाएं प्रशासन को नज़र नहीं आतीं। जाहिर है उनका इशारा मानव रचना विश्वविद्यालय, दो बड़े-बड़े स्कूल, पाखंडी बाबा का सिद्धदाता आश्रम व अन्य कई इमारतों की ओर था जो इनको नजर नहीं आता। ऐसे ही अनेकों बड़े भवनों का जिक्र ग्रामीणों ने खुलकर किया। इसी मसले को लेकर 14 जुलाई को महापंचायत का आयोजन किया गया था। इसमें भाजपा के अलावा तमाम राजनीतिक दलों के लोग शामिल हुए थे। अपनी फजीहत से बचने के लिए कृष्णपाल गूजर व स्थानीय विधायक अधलखा तो क्या गांव से चुना गया पार्षद बिंदे भड़ाना भी शामिल नहीं हुआ। पूछने पर ये लोग कहते हैं कि उन्हें तो किसी ने बुलाया ही नहीं। इस पर लोगों का कहना है कि तुम्हें वोट मांगने के लिए कब-किसने बुलाया था? उस वक्त तो तुम खुद ही भिखारियों की तरह घर-घर, गली-गली घूमते फिर रहे थे और अब गांव पर संकट आया तो तुम न्योते का इंतजार करते हो। अपनी इस तरह की फजीहत से परेशान केंद्रीय मंत्री गूजर ने मुख्यमंत्री व अन्य अधिकारियों आदि से मिल कर समस्या का कोई समाधान निकालने का भरोसा जनता को देकर अपनी जान छुड़ाने का प्रयास किया है।