संदीप सिंह कमजोरी को ताक़त में बदलने का माद्दा सिखाया है। हारती हुई बाज़ी को पलटने का साहस बनाया है। अभी युद्ध रुका नहीं है मगर युद्ध की बिसात बदली है। ईरान ने कूटनीतिक चालाकी से इसराइल को इस युद्धविराम से अलग करने का प्रयास किया है। सीधे अमेरिका से समझौता हुआ है। नए क्षेत्रीय देश खिलाड़ी बनकर अब इस शतरंज का हिस्सा बने हैं। ईरान की जनता ने अजेय साहस, धैर्य और वीरता का परिचय दिया है। कोई और देश होता तो शायद अब तक टूटकर अपने घुटनों पर रेंग रहा होता। ईरानी नेतृत्व ने भी महान साहस दिखाया है। हमारे डरपोक नेतृत्व को कुछ सीखना चाहिए जो एक फ़ोन कॉल से डरकर ऑपरेशन सिंदूर वापस ले लेते हैं और एक फोन कॉल और एपस्टीन फाइल से डरकर अमेरिका से 45 लाख करोड़ का सामान खऱीदने का व्यापार समझौता कर लेते हैं। यह हथियारों से लड़ा जाने वाला युद्ध मात्र नहीं है। यदि यह वही होता तो ईरान कब का इसे हार चुका था। सेना का युद्ध यह ऊपर ऊपर से है। दरअसल यह सिस्टम को बदलने का युद्ध है जो युद्ध की सतह के नीचे, अक्सर युद्ध के मैदान से बाहर दुनिया के फाइनेंसियल स्ट्रक्चर को बदलने के जोखिम भरे रास्ते पर बढ़ चला है। यह ऊर्जा, पेट्रोल-गैस-हीलियम, रसायनों, पेट्रोकेमिकल, खाद-उर्वरक, दवाईयां, रूक्रढ्ढ मशीनें, सेमीकंडक्टर्स इंडस्ट्री के पेचीदा रास्तों से होते हुए नए वित्तीय तंत्र, (संभवत: ब्रिक्स करेंसी आदि) को खड़ा करने की ओर बढ़ रहा है।
यदि यह कामयाब हुआ तो एक नई मल्टीपोलर दुनिया के लिए तैयार हो जाना चाहिए। और एक महा शक्तिशाली ईरान के लिए भी। चीन इस शतरंज के दूसरे छोर पर बैठा खेल रहा है। भारत के पास अथाह मौक़े बनने जा रहे हैं। ईरान का बाजार भारत के बहुत बड़ी संभावना है। यदि भारत का निज़ाम, मोदीजी और उनका तंत्र अपनी घुटनाटेकू और जी-हूज़ूर मानसिकता से बाहर आकर इस मौके को हाथोंहाथ लेता है तो क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते भारत की आर्थिकी को एक नई उछाल मिल जाएगी। मोदीजी और उनकी गैंग की इसराइल पर अतिनिर्भरता न भारत के अर्थतंत्र के लिए सही है न बदलती दुनिया में भारत की भूमिका के लिए। अपने निजी निवेशों और राजदारों को बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है कि भारत के सामरिक, राजनीतिक और आर्थिक हितों को बचाया और मज़बूत किया जाए। क्या मोदीजी का ग्रुप राष्ट्रहित का यह कदम उठायेगा या फिर व्यक्तिगत हितों की ही रक्षा करेगा?