फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) गत माह केन्द्रीय श्रममंत्री मनसुख मांडविया ने एक मीटिंग के दौरान ईएसआईसी (मूर्खालय) में बैठे मूर्ख कमिश्नरों से पूछ लिया कि कॉर्पोरेशन के मेडिकल कॉलेजों में कितनी फैकल्टी रेगुलर तथा कितनी ठेकेदारी में है? जवाब मिला कि मात्र 20 प्रतिशत रेगुलर तथा शेष 80 प्रतिशत ठेकेदारी में है। मंत्री जी द्वारा इसका कारण पूछने पर निकम्मे कमिश्नरों ने आंय-बांय-शांय करते हुए बताया कि वे भर्तियां करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन भर्ती पूरी नहीं हो पाती। इसी पूछताछ के दौरान मंत्री जी को पता लगा कि कई-कई साल तक पोस्टें विज्ञापित ही नहीं की जातीं। इसके अलावा बड़ी संख्या में रेगुलर फैकल्टी कॉर्पोरेशन से इस्तीफा देकर अन्यत्र निकल जाते हैं।
मंत्री जी द्वारा सख्ती से हड़काने पर 13 दिसंबर 2024 को असिस्टेंट प्रोफेसर (एपी)के 287 पद विज्ञापित कर दिए गए। इनके आवेदन की अंतिम तिथि 31 जनवरी रखी गई है। इन विज्ञापित पोस्टों का क्या परिणाम होगा, यह जानने से पहले 2022 में विज्ञापित पोस्टों का हाल जान लें।
वर्ष 2020 के बाद 2022 में कॉर्पोरेशन द्वारा एपी के 491 पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे। भर्ती की कछुआ चाल से चली प्रक्रिया के द्वारा 330 उम्मीदवार अगस्त 2024 में चयनित हुए लेकिन इनमें से केवल 220 लोगों ने ही नौकरी ज्वाइन करी। यानी कि इतनी लम्बी चयन प्रक्रिया के बाद 491पोस्टोंं के मुकाबले केवल 220 एपी ही कॉर्पोरेशन को मिल पाए। जिस नीति से मुख्यालय में बैठे ये मूर्ख कमिश्नर भर्तियां कर रहे हैं, उसके अनुसार तो जिंदगी भर भी रेगुलर फैकल्टी नहीं मिल पाएगी। मौजूदा नीति के अनुसार जो चयनित अभ्यर्थी फरीदाबाद ज्वाइन करना चाहता है उसे ये लोग भेजते है अलवर, जो ज्वाइन करना चाहता है दिल्ली, उसे भेजेंगे बंगलुरू आदि-आदि। इसके परिणामस्वरूप चयनित अभ्यर्थी कहीं भी ज्वाइन नहीं करते और सैंकड़ों पोस्टें खाली की खाली रह जाती हैं। इसके विपरीत यदि ये कमिश्नर चयनित अभ्यर्थियों की पसंद के अनुसार तैनातियां प्रदान कर दें तो सभी नहीं तो 90 प्रतिशत तक पोस्टें भरी जा सकती हैं।
अभी दिसंबर में जो पोस्टें विज्ञापित की गई हैं वे केवल चालू मेडिकल कॉलेजों के लिए ही हैं और केवल एपी के लिए ही आवेदन मांगे गए हैं जबकि एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसरों के खाली पदों के लिए भी आवेदन मांगे जा सकते थे। यहां परिस्थिति और भी ज्यादा खराब है, क्योंकि प्रोफेसरों के अलावा एसोसिएट प्रोफसरों के स्थान पर भी रिटायर प्रोफेसरों को लगा रखा है। इसी विज्ञापन में 10 नए मेडिकल कॉलेजों के स्वीकृत पदों के लिए भी रिक्तियां जोड़कर विज्ञापित हो सकती थीं जो नहीं की गईं। जाहिर है इससे दो बार भर्ती प्रक्रिया चलानी पड़ेगी जिसके परिणामस्वरूप फैकल्टी प्राप्त करने में अनावश्यक देरी होगी।
दरअसल मूर्खालय में बैठे मूर्ख कमिश्नरों का हाल यह है कि उन्हें अपनी कोई समझ तो है नहीं, जब चयनित डॉक्टर उन्हें समझा कर अपनी-अपनी पसंद के अनुसार तैनाती मांगने के लिए उनके दरवाजे पर जाते हैं तो उन्हें बुरी तरह से अपमानित किया जाता है। विदित है कि कमिश्नरों के इन पदों पर डिस्पेंसरी स्तर के डॉक्टर तैनात हैं और इनके सामने फरियाद करने वाले वरिष्ठ डॉक्टर होते हैं जिन्हें हड़काने से इनके अहम को संतुष्टि प्राप्त होती है। इससे दुखी होकर अनेकों चयनित डॉक्टर ज्वाइन न करना ही बेहतर समझते हैं। लेकिन इन कमिश्नरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इनकी ओर से तो चाहे मुंबई वाले मेडिकल कॉलेज की तरह सारे ही मेडिकल कॉलेज बंद हो जाएं अथवा बसई दारापुर वाले मेडिकल कॉलेज की तरह आधी-अधूरी क्षमता पर चलते रहें, इनकी बला से, इतना ही नहीं इनकी हार्दिक इच्छा तो यह है कि मेडिकल कॉलेेज ईएसआईसी में होने ही नहीं चाहिए।
भर्ती प्रक्रिया के अलावा पदोन्नति तथा सेवा शर्तों में भी अनेकों ऐसी खामियां हैं जिनके चलते कॉर्पोरेशन की सेवा में फैकल्टी तभी तक रहना पसंद करती है जब तक उसे कोई उपयुक्त एवं बेहतर संस्थान में नौकरी न मिल जाए। इसके सबूत के तौर पर उन सैंकड़ों एपी तथा एसेसिएट प्रोफेसरों को देखा जा सकता है जो यहां की नौकरी छोड़कर दिल्ली के संस्थानों में एक रैंक नीचे के पद पर भी चले गए। इसका दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि कॉर्पोरेशन में अभी तक फैकल्टी पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी है। प्रोफेसरों की कमी पूरी करने के लिए रिटायर्ड लोगों को ठेके पर रखा जाता है जो युवा प्रोफेसरों के मुकाबले एक चौथाई काम भी नहीं निकाल सकते। यदि कॉर्पोरेशन की पॉलिसी सकारात्मक होती तो यहां की फैकल्टी से ही धीरे-धीरे पदोन्नति होकर प्रोफेसरों की कमी पूरी हो सकती थी।
मंत्रीजी, पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते जरूर जानते होंगे कि दिल्ली के सफदरजंग, आरएमएल तथा लेडी हार्डिंग जैसे देश भर के 10 बड़े मेडिकल कॉलेजों को चलाने के लिए जिस डीजीएचएस (डायरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विसेजेज) को तैनात किया जाता है वह वरिष्ठतम प्रोफेसरों में से एक होता है। वह अपनी योग्यता एवं अनुभव के आधार पर इन सभी मेडिकल कॉलेजों को सुचारु रूप से चलाता है। इसके विपरीत मांडविया जी अपने जिन कमिश्नरों के द्वारा 10 पुराने व 10 नए मेडिकल कॉलेज चलवाना चाहते हैं, वे बिल्कुल इसके लायक नहीं हैं। यह तथ्य जितना जल्दी मंत्रीजी को समझ में आ जाएगा उतना ही कॉर्पोरेशन तथा इससे जुड़े मज़दूरों का कल्याण हो पाएगा। मुख्यालय से छन-छन कर आने वाली खबरों के अनुसार इन्हीं कमिश्नरों ने मंत्री जी से अनुरोध किया था कि इस वर्ष 10 की बजाय केवल पांच नए मेडिकल कॉलेज ही शुरू कर लें तो बेहतर होगा। अब कोई पूछे इन कमिश्नरों से कि 10 मेडिकल कॉलेज चलाने से उनकी सेहत पर क्या फर्क पड़ रहा है?
जैसी कार्रवाई एक के लिए करनी होती है वैसी ही पांच या दस या बीस के लिए भी करनी होती है। खर्चा उनके घर से नहीं जाता, फिर उन्हें क्या तकलीफ है 10 खोलने में? बल्कि मंत्री जी को चाहिए कि 2026 के लिए एक नया टारगेट सेट करते हुए घोषित कर दें कि जहां भी पांच लाख या इससे अधिक बीमाकृत मज़दूर हैं वहां सभी जगह मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे। अब मंत्रीजी के लिए समझने वाली बात यह रह जाती है कि वह कब तक इन मूर्ख कमिश्नरों से माथापच्ची करते रहेंगे? क्या यह कहीं अधिक बेहतर नहीं होगा कि इनसे पिंड छुटाकर किसी ढंग के आदमी को यह दायित्व सौंप दिया जाए।