ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल, सेवाओं में भारी कटौती

ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल, सेवाओं में भारी कटौती
September 29 17:39 2025

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) देश भर के मज़दूरों से प्रतिमाह वसूली करके अपने खजाने में 1 लाख 88 हजार करोड़ रुपये दबाए बैठा कॉर्पोरेशन, मज़दूरों को दी जाने वाली सेवाओं में भारी कटौती करने में जुटा है। प्रतिदिन डायलिसिस के लिए आने वाले मरीजों को दिए जाने वाले नाश्ते, लंच व डिनर में मिलने वाली खुराक में भारी कटौती कर दी गई है। नाश्ते में मिलने वाले दो अंडे अथवा पनीर तो बिल्कुल बंद कर दिए गए हैं, तथा इनके साथ मिलने वाले उबले चने व पोहा की मात्रा भी घटा दी गई है। मरीज को संक्रमण से बचाने के लिए टेबल पर बिछाई जाने वाली टिश्यू पेपर की चादर भी बंद कर दी गई है। मरीजों से कहा जाता है कि चादर बिछानी हो तो अपने घर से लाया करो। इससे भी बड़ा जुल्म तो यह है कि डायलिसिस के दौरान आवयश्कता पडऩे पर लगने वाले इंजेक्शन भी बंद कर दिए गए हैं। मरीजों से कहा जाता है कि जान प्यारी है तो ये इंजेक्शन बाजार से खरीद कर ले आओ। इनकी $कीमत 700-800 रुपये बताई जाती है। ये बेशर्मी की इन्तेहा नहीं तो और क्या है?

किडनी से सम्बन्धित मरीजों को देखने के लिए केवल एक ही डॉक्टरआशीष मल्होत्रा हैं। ये भी पूर्णकालिक न होकर मात्र दो घंटे के लिए, प्रात: 10-12 बजे तक बैठते हैं। इस दौरान ये केवल 25 मरीज ही देखते हंै। इसके लिए मरीज टोकन लेने के लिए प्रात: छ: बजे से ही लाइन में लग जाते हैं। डॉ. मल्होत्रा द्वारा लिखी दवाओं आदि को ऑनलाइन करने का काम एक अन्य डॉक्टर लंच के बाद करते हैं। लिहाजा मरीजों को इस काम के लिए तीन बजे तक यहां रुकना पड़ता है। इसके बाद दवा काउंटर की लाइन में लगते हैं। यदि मरीज उस दिन दवा न ले सके तो अगले दिन उसे फिर से ऑनलाइन करवाना पड़ता है।

डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली दवाई को लेने जब मरीज दवा काऊंटर पर जाता है तब शायद ही किसी मरीज को लिखी हुई पूरी दवाएं मिल पाएं। अधिकांश दवाओं के लिए ‘एनएÓ की मुहर लगा दी जाती है। इसका मतलब होता है कि दवा उपलब्ध नहीं है। जाहिर है ऐसे में मरीज को बाजार से ही दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। कैंसर की $कीमती दवाओं के लिए तो साफ तौर पर कह दिया जाता है कि वे अपनी सम्बन्धित डिस्पेंसरियों से जाकर लेंगे जिन्हें राज्य सरकार द्वारा चलाया जाता है। बेशक इन्हें राज्य सरकार चलाती है लेकिन पैसा तो यहां भी कॉर्पोरेशन का ही लगता है। लेकिन इस चक्करबाजी में मरीज को न तो यहां दवा मिलती है न ही वहां मिल पाती है। मरीजों को भटका-भटका कर मारने का यह नायाब तरीका लागू करने के लिए कॉर्पोरेशन पूर्व डीन को हटा कर डॉ. कालिदास को यहां लाया है। कैंसर एक टर्शरी सेवा है जिसकी सारी जिम्मेदारी कॉर्पाेरेशन की है, इसलिए इसकी दवा डिस्पेंसरी में होने का कोई सवाल ही नहीं होता है।

एक्सपायर दवाओं का मामला
बीते करीब तीन सप्ताह से प्रशासन द्वारा बड़े पैमाने पर एक्सपायर हुई दवाओं का ढोल तो पीटा जा रहा है परन्तु यह बताने को कोई तैयार नहीं है कि इनकी $कीमत कितनी रही होगी और ये किन हालात में एक्सपायर हुईं?सर्वविदित है कि 2020 में कॉर्पोरेशन केे इस अस्पताल को, कोरोना के नाम पर जि़ला प्रशासन ने अपने कब्जे में ले लिया था। बीमाकृत मज़दूरों के लिए ओपीडी व अन्य सभी प्रकार की चिकित्सा सेवाएं पूरी तरह से बंद कर दी गई थीं। यह स्थिति करीब दो साल तक बनी रही। ऐसे में उन दवाओं का एक्सपायर होना स्वाभाविक था जो बीमाकृत मज़दूरों के लिए खरीदी गईं थीं। वे दवाएं तो एक्सपायर हुईं सो हुईं कोरोना के नाम पर जो अंधाधुंध दवा खरीदारी जि़ला प्रशासन के कहने पर की गई, वे सब भी कोरोना खत्म होने के बाद एक्सपायर हो गईं। इस मूर्खतापूर्ण कार्यान्वयन के लिए, जिस पर मज़दूरों से वसूला गया धन बेदर्दी से बर्बाद कर दिया गया, कॉर्पोरेशन किसको जिम्मेदार ठहराना चाहता है?

आज भी स्टोर में प्रबन्धन का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है, सब तुक्कम-तुक्का काम चल रहा है। स्टोर में दवाओं के प्रबन्धन, रख-रखाव व इन्वेंट्री का सारा काम फार्मासिस्टों द्वारा किया जाता है। इनकी निगरानी के लिए कभी भी किसी भी डॉक्टर को नियुक्त कर दिया जाता है। आमतौर पर ये डॉक्टर अपनी डॉक्टरी विषय के विशेषज्ञ तो होते हैं लेकिन स्टोर हैँडलिंग उनके लिए एक नया एवं अजीबोगरीब काम होता है। इसके लिए फार्मासिस्टों की एक पुरानी मांग रही है कि उनका भी केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तर्ज पर अलग कैडर बना कर पदोन्नतियां देकर जिम्मेदारियां सौंपी जाएं।

ठेके पर लगी फैकल्टी का वेतन बंद
कॉर्पोरेशन के इशारे पर डीन डॉक्टर कालिदास ने बीते सप्ताह एसआर डॉक्टरों व पीजी छात्रों का आधा वेतन काट लिया था। इसके साथ-साथ एसआर डॉक्टरों को तीन साल के लिए रखने की बजाय 39 दिन के लिए रखने की योजना लागू करनी चाही थी। इन लोगों के उग्र विरोध एवं हड़ताल के दबाव में आकर उनका काटा गया वेतन तो दिया ही गया साथ में 39 दिन वाली योजना को भी स्थगित करना पड़ा।

इन डॉक्टरों से मात खाकर अब डॉक्टर कालिदास ठेके पर रखे गए फैकल्टी से उलझे हुए हैं। उनका वेतन जो पहली सितम्बर को मिल जाना चाहिए था वो खबर लिखे जाने तक नहीं मिला। बहाना यह लिया जा रहा है कि उनकी बॉयोमीट्रिक हाजिरी की पड़ताल की जा रही है। डीन बहादुर किसको बेवकूफ बना रहे हैं? आज के कम्प्यूटर युग में यह काम महीनों का नहीं बल्कि चंद मिनटों का है।
विदित है कि अधिकांश फैकल्टी ठेके पर रखी गई है। इनमें वे विशेषज्ञ प्रोफेसर स्तर के डॉक्टर भी शामिल हैं जो विभिन्न बड़े सरकारी संस्थानों से सेवानिवृृत होकर आए हैं। चर्चा है कि इन वरिष्ठ डॉक्टरों से भी डीन बड़े अफसराना एवं धमकी भरे लहजे में बात करते हैं। इसके चलते इन डॉक्टरों ने अन्यत्र नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी है। जाहिर है इसके परिणामस्वरूप यहां विशेेषज्ञ डॉक्टरों का अभाव होना तय है। नेफ्रोलॉजी की डॉक्टर डेनिस, न्यूरोलॉजी के डॉ. मयंक, कैंसर के डॉक्टर राय ने नोटिस दे दिया है, कार्डियोलॉजी के डॉ. बिनय पांडे तो छोड़कर पहले ही जा चुके हैं। कार्डियोलॉजी के नियमित विशेषज्ञ डॉ. अरविंद को यहां से बसई दारापुर भेज कर इस विभाग को लगभग ठप कर दिया गया है।

कॉर्पोरेशन के इशारों पर नाचते हुए डीन वह सब कुछ करते जा रहे हैं जिससे इस अस्पताल का स्तर भी बसई दारापुर के बराबर आ जाए। विशेषज्ञ डॉक्टरों के छोड़ जाने के फलस्वरूप, जाहिर है कि मरीजों का आना भी कम हो जाएगा और आएंगे भी तो उनको इधर-उधर भटका कर पल्ला झाड़ लिया जाएगा। इससे न केवल वेतन पर होने वाला भारी खर्च घटेगा साथ में दवाओं व अन्य प्रकार के खर्चे भी कम होते चले जाएंगे। विदित है कि पीजी व पोस्ट पीजी कोर्स चलाने के लिए वरिष्ठ प्रोफेसरों की आवश्यकता होती है। उनके न रहने से ये कोर्स भी स्वत: दम तोड़ जाएंगे, जैसा कि बसई दारापुर में हुआ है। फिलहाल यहां 19 विषयों में पीजी कोर्स तथा छह विषयों में पोस्ट पीजी कोर्स चल रहे हैं।

इनमें करीब 300 युवा डॉक्टर शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसके मुकाबले बसई दारापुर में मात्र दो विषयों में कुल बारह लोग पीजी कोर्स कर रहें हैं। बसई दारापुर में केवल वही लोग दाखिला लेते हैं जिन्हें और कहीं जगह न मिली हो, क्योंकि यहां न तो शिक्षण-प्रशिक्षण का कोई माहौल है और न ही मरीजों के इलाज की समुचित व्यवस्था है। जैसे कार्डियोलॉजी में कैथलैब न होने के बावजूद डॉ. अरविंद को वहां भेजा गया है। ऐसे में वह भला क्या सीख पाएगा? वैसा ही माहौैल फरीदाबाद में बनाने के लिए डॉ. कालिदास को यहां डीन नियुक्त किया गया है।

दफ्तरी बाबुओं से दुखी डॉक्टर
यदि डीन और एमएस (चिकित्सा अधीक्षक) की प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त-दुरूस्त हो तो किसी भी डॉक्टर को दफ्तरी बाबुओं के चक्कर न लगाने पड़ें। लेकिन इसके अभाव में हर छोटे-मोटे काम के लिए वरिष्ठतम डॉक्टरों को भी दफ्तरी बाबुओं के सामने याचक की तरह जाकर खड़े होना पड़ता है। इस पर बाबू फूल कर कुप्पा हो जाता है। अपनी इस आत्मसंतुष्टि के लिए वह इन डॉक्टरों के काम को अटका-लटका कर बार-बार चक्कर लगवाता है। यह स्थिति तब और भी भयंकर हो जाती है जब एक बीटेक इंजीनियर बाबू बनकर रह गया हो और डॉक्टर को अपने सामने खड़ा देख कर तुलनात्मक रूप से वह अपने आप को डॉक्टर से श्रेष्ठ नहीं तो कमतर भी मानने को तैयार नहीं होता। इसी मानसिकता के चलते वह डॉक्टर के साथ ऐसा व्यवहार करता है जिससे डॉक्टर का असहज होना स्वाभाविक हो जाता है। आए दिन आने वाली इस तरह की घटनाओं से डॉक्टरों के भीतर का$फी रोष पनप रहा है। यह तभी दूर हो सकता है जब डॉक्टर लोग बाबुओं से उलझने की बजाय सीधे डीन व एमएस से मिलें।

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Mazdoor Morcha
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