फैकल्टी के बाद एसआर डॉक्टरों को भी भगाने की तैयारी फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) देश भर में फैले कॉर्पोरेशन के तमाम अस्पतालों में से सर्वश्रेष्ठ यहां के अस्पताल का सत्यानाश करने का अभियान पूरे जोरों पर है। दरअसल कॉर्पोरेशन मुख्यालय कभी नहीं चाहता था कि सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट (एसएसटी) की सुविधाओं का विस्तार यहां किया जाए। इसके लिए आवश्यक पीजी (पोस्ट ग्रेजुएशन) के प्रोग्राम भी यहां चलाने में मुख्यालय की कभी कोई रुचि नहीं रही थी। इस तरह के कोर्स में उनकी रुचि का नमूना बसई दारापुर के उस संस्थान में देखा जा सकता है जो केवल पीजी कोर्स के लिए बनाया है। वहां इस तरह की पढ़ाई एवं प्रशिक्षण की लचर व्यवस्था के चलते न तो ढंग के पढऩे वाले हैं और न ही पढ़ाने वाले हैं। केवल नाममात्र का ही पीजी संस्थान बन कर रह गया है। मुख्यालय ऐसा ही हाल फरीदाबाद का भी करना चाहता है ताकि यहां के 600 करोड़ के बजट को 300 करोड़ वार्षिक से नीचे लाया जा सके।
एसएसटी के जिन विशिष्ट डॉक्टरों को यहां पर रखा गया था उन्हें एक-एक करके भगाया जा रहा है। उनके स्थान पर खानापूर्ति के तौर पर निचले स्तर के डॉक्टरों को बैठाने की तैयारी है। इतना ही नहीं तीन साल का पीजी कोर्स करने के बाद जिन प्रशिक्षित डॉक्टरों को तीन साल की निश्चित अवधि के लिए एक लाख चालीस हजार के मासिक वेतन पर एसआर (सीनियर रेजिडेंट) नियुक्त किया गया था उन्हें भी भगाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्हें कहा जा रहा है कि वे नए सिरे से आवेदन फार्म भरकर 39 दिन के लिए इस पद को ग्रहण करें। इस अवधि को एक बार और इतने ही दिनों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।
यह आदेश पूर्णतया अवैध है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार समझदार एवं मजबूत एसआर डॉक्टरों ने प्रशासन के इस आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया है। इस बाबत उनका अनकहा जवाब यह समझा जा रहा है कि वे उनकी धमकी में आने वाले नहीं है, दम हो तो उन्हें बर्खास्त कर । ये लोग प्रबंधन को ेचेतावनी देकर 11 सितंबर से हड़ताल पर चले गए। हालांकि उनकी मांग पर डीन ने गौर करने का आश्वासन दिया है। पर छ: से सात लाख रुपए की दवाएं तो लगती ही हैं साथ में कुछ नर्सिंग स्टाफ भी इसमें लगाना पड़ता है। कॉर्पोरेशन इसे पूर्णतया पैसे की बर्बादी मानता है। इसलिए अब यह प्रोग्राम बंद ही रहेगा। जानकार बताते हैं कि डॉ. राहुल ने पूर्व डीजी मुखमीत सिंह के माध्यम से यह चेरिटेबल सेवा बसई दारापुर के अस्पताल में देने की पेशकश की थी। लेकिन मुख्यालय में बैठे जन विरोधी हरामखोर अफसरों ने इसे सिरे नहीं चढऩे दिया। इस बाबत डीजी द्वारा पूछने पर यहां के तत्कालीन डीन डॉ. असीम दास ने तुरन्त हामी भर ली और बीएमटी शुरू कर दिया। इसके अलावा बड़ी संख्या में आने वाले कैंसर मरीजों के लिए कुछ ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टरों का जुगाड़ पूर्व डीन डॉक्टर दास ने किया था। बेशक ये जुगाड़ भी अपर्याप्त था लेकिन कुछ नहीं से तो कुछ होना ही बेहतर समझ कर इलाज देने का प्रयास किया जा रहा था। लेकिन अब इसे भी ठप कर दिया गया है। दोनों ऑन्कोलॉजिस्ट भगा दिए गए हैं क्योंकि उनकी लिखी दवाएं कॉर्पोरेशन को धन की बर्बादी लगती थी।
कार्डियोलॉजी विभाग से दो विशेषज्ञ डॉक्टरों को भगाने के बाद से कैथ-लैब का काम लगभग ठप पड़ा है। वहां न तो हृदय के वॉल्व बदले जा रहे हैं, न ही पेसमेकर लग रहे हैं और न ही स्टेंट डालने का काम सुचारु रूप से चल रहा है और एंजिओग्राफी का काम नाम मात्र का ही चल रहा है। इससे सम्बन्धित 30 बेड का सीसीयू वार्ड लगभग खाली सा पड़ा हुआ है। जाहिर है कि ऐसे में हृदय रोगियों को इधर-उधर भटकाने के लिए विभाग में कुछ डॉक्टर जरूर मौजूद हैं। नेफ्रोलॉजी व न्योरोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण विभाग में कोई भी विशेषज्ञ डॉक्टर पूर्णकालिक तौर पर तैनात नहीं हैं केवल काम चलाने के नाम पर मरीजों को भटकाने व बहलाने के लिए कनिष्ठ डॉक्टर अथवा अंशकालिक डॉक्टर नियुक्त हैं। गतांक में भी लिखा जा चुका है कि नेफ्रोलॉजी में मैट्रो अस्पताल के एक डॉक्टर को केवल 25 मरीज देखने के लिए रखा है जो केवल 10 से 12 बजे तक निपट जाते हैं। बाकी मरीजों के लिए, यदि जेब में पैसे हों तो मैट्रो अस्पताल में उनका स्वागत है।
मुख्यालय की धूर्तता एवं मूर्खता के चलते यहां की फैकल्टी को विकसित नहीं होने दिया गया। कॉर्पोरेशन की नीतियों के चलते कोई भी फैकल्टी यहां अधिक समय तक ठहरने की बजाय मौका मिलते ही निकल भागती रही है। इसके परिणामस्वरूप यहां सेवानिवृत प्रोफेसरों को ही ठेके पर रखकर काम चलाने का प्रयास किया जाता रहा है। समझा जा सकता है कि 65 से 70 वर्ष के बुजुर्ग प्रोफेसर उतना काम तो नहीं ही कर सकते जितना कि कोई अपेक्षाकृत जवान प्रोफेसर कर सकता है। ऐसे में बुजुर्ग प्रोफेसर और जवान एसआर मिल-जुल कर बेहतर काम करने का माहौल बना कर मरीजों को अच्छी-खासी सेवाएं दे रहे थे। लेकिन अब वह माहौल भी पूरी तरह से बिगाड़ दिया गया है। बुजुर्ग प्रोफेसरों को उसी डंडे से हांकने का प्रयास किया जा रहा है जिससे जूनियर कर्मचारियों को हांका जाता है और एसआर जो बेहतर सेवा दे रहे थे उन्हें भी भड़का कर आन्दोलन की राह पर धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप अस्पताल की ऑक्युपेंसी 80 प्रतिशत तो आ गई है और यदि यही रफ्तार रही तो शीघ्र ही बसई दारापुर के स्तर यानी 50 प्रतिशत तक गिर जाएगी। जाहिर है उसके बाद यहां की लम्बी लाइनें घट कर इतनी छोटी हो जाएंगी कि किसी को भी चार मिनट से अधिक खड़ा न होना पड़े। यही संकल्प तो डीन डॉ. चाव्हाण कालिदास दत्ताराय का है।