फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जनता के प्रति सरकार की उदासीनता व उद्योगपतियों की अंधी मुनाफाखोरी के चलते, सांस लेने को न तो शुद्ध वायु रही और न ही पीने को शुद्ध पानी। सिंचाई के लिए भी जहरीले पानी के चलते कैंसर महामारी का रूप लेता जा रहा है। मुनाफाखोरी के चलते इसका इलाज इतना महंगा कर दिया गया है कि आम जनता बेमौत मरने को मजबूर है।
मज़दूरों से वसूले गए पैसे से चलने वाले ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में भी कैंसर का इलाज किया तो जा रहा है परन्तु वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। कैंसर मरीजों की भारी संख्या को देखते हुए यहां कम से कम 200 बिस्तरों, 10 विशेषज्ञ डॉक्टरों और 50 नर्सिंग स्टाफ की आवश्यकता है। इसके विपरीत यहां केवल 50 बेड, तीन डॉक्टर व 10 नर्सिंग स्टाफ ही उपलब्ध है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक डॉक्टर नियमित व दो को पार्ट टाइम रखा गया है। कैंसर मरीजों के लिए एचडीयू हाई डिपेंडेंसी यूनिट की आवश्यकता है लेकिन वह उपलब्ध नहीं है। ऐसे मरीजों को आईसीयू से कम लेकिन जनरल वार्ड से अधिक देखभाल की जरूरत होती है। नियमानुसार, संक्रमण से बचाए रखने के लिए प्रत्येक मरीज व उसके नर्सिंग स्टाफ को अकेले-अकेले रखना चाहिए। जबकि यहां एक ही कमरे में छ: से आठ मरीजों को एक ही नर्स के हवाले कर दिया जाता है। बोन मैरो ट्रांस्प्लांटेशन (बीएमटी) कैंसर की बीमारी में एक अति महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके लिए यहां एक भी डॉक्टर पूर्णकालिक नही है। वैसे इस प्रक्रिया की कोई योजना कॉर्पोरेशन के दिमाग में कभी थी भी नहीं। यह तो विशेषज्ञ डॉक्टर राहुल भार्गव द्वारा स्वैच्छिक एवं मानवता आधारित सेवा दिए जाने के कारण यहां पर पूर्व डीन डॉ. असीम दास ने शुरू करा दी थी। यह एक महंगी प्रक्रिया होती है। इसमें डॉक्टर की भारी फीस व अत्यधिक महंगी दवाइयां लगती हैं।
बेशक डॉक्टर भार्गव नाम मात्र की फीस ही लेते हैं लेकिन महंगी दवाईयों तथा इलाज के लिए विशेष कक्ष तथा प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ उपलब्ध कराने में कॉर्पोरेशन मुख्यालय में बैठे जनविरोधी एवं हरामखोर कमिश्नरों की जान निकलती है। इसके बावजूद डॉ. भार्गव अभी तक 54 मरीजों का सफल इलाज कर चुके हैं। यदि मुख्यालय का पर्याप्त सहयोग मिले तो यह संख्या कई गुणा तक बढ़ सकती है। फिलहाल ऐसे मरीजों को कॉर्पोरेशन द्वारा इलाज देने की बजाय इधर-उधर भटका कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।
हाल-फिलहाल में पता चला है कि मेडिकल कॉलेज द्वारा एक ऐसा एप तैयार किया जा रहा है कि जो मरीज़ को याद दिलाएगा कि दवा लेने का समय हो गया है। गौरतलब है कि अभी यहां के मरीज़ इतने हाई-फाई नहीं हुए हैं कि उन्हें याद दिलाने के लिए किसी एप की जरूरत है। न केवल कैंसर बल्कि हर बीमारी के लिए मरीज़ सदा से ही अपने व अपने तीमारदारों के भरोसे समय पर दवा लेते आए हैं और लेते रहेंगे। आवश्यकता है तो केवल पर्याप्त मात्रा में डॉक्टरी सहायता व उचित दवाएं समय पर मिलती रहें।