ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में गार्डों व नर्सों की छटनी, धरना-प्रदर्शन जारी

ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में गार्डों व नर्सों की छटनी, धरना-प्रदर्शन जारी
February 13 11:16 2026

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कार्यरत 300 सुरक्षा गार्डों में से 82 को काम से निकाल दिया गया। निकालने का तरीका भी बड़ा अजीब व नवेला था। दिनांक 31 जनवरी शाम को इनके मोबाइल पर व्हाट्सएप के द्वारा इन्हें कल से ड्यूटी न आने को कहा गया। किसी भी नौकरी से निष्कासन का यह अवैध तरीका पहली बार देखने को मिला। यह श्रम कानूनों की खुली अवहेलना है। 240 दिन लगातार नौकरी कर चुके किसी भी कर्मचारी को इस तरह से नहीं निकाला जा सकता। निकाले गए सभी कर्मचारी पांच या इससे भी अधिक वर्षों से यहां सेवारत रहे हैं। कुछ तो 10 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। उक्त 82 गार्डों में से 11 सुपरवाइजर स्तर के होने के साथ-साथ सेवानिवृत्त फौजी भी हैं। शेष 71 गैरफौजी यानी सिविलियन हैं दबाव पडऩे पर प्रबन्धन ने 11 सुपरवाइजरों को तो काम पर बहाल कर दिया है जबकि शेष 71 संस्थान के बाहर धरने पर बैठे हैं। इस मामले में प्रबन्धन का कहना है कि उसने न तो इन्हीें भर्ती किया था और न ही निष्कासित किया है। ये तमाम लोग एक ठेकेदार कम्पनी के कर्मचारी हैं जो आवश्यकता पडऩे पर विभिन्न संस्थानों को कर्मचारी उपलब्ध कराते हैं। ठेकेदार कम्पनी का निर्धारण दिल्ली स्थित कॉर्पोरेशन मुख्यालय द्वारा किया जाता है।
प्रबन्धन का यह बयान केवल जनता को मूर्ख बनाने व श्रम कानूनों को धता बताने के लिए दिया जाता है। वैसे भारत सरकार ने भी जान-बूझकर श्रम कानून में इस तरह की धोखाधड़ी करने की गुंजाइश छोड़ रखी है। यदि कानून में यह गुंजाइश न रखी जाती तो संस्थान को सीधे तौर पर ही अपनी आवश्यकता के अनुरूप कर्मचारी भर्ती करने पड़ते। बता दें कि मेडिकल कॉलेज में 24 सुपरवाइजर और 357 गाड्र्स के पद स्वीकृत हैं।

सरकार द्वारा नियंत्रित तमाम संस्थानों के लिए यह आवश्यक है कि गार्ड के पदों पर सेवानिवृत्त फौजियों को ही तैनात किया जाए। इसके लिए रक्षा-मंत्रालय ने बाकायदा कुछ संगठन कायम कर रखे हैं जहां से पंजीकृत फौजियों को इन पदों के लिए बुलाया जा सकता है। इतना ही नहीं सरकार ने इनके लिए न्यूनतम वेतन 30 हजार रुपए मासिक भी तय कर रखा है जबकि राज्य भर में 15000 रुपए मासिक तक में गार्डों को रखा जाता है। –ञकॉर्पोरेशन के इस संस्थान ने अपनी विशेष आवश्यकताओं के आधार पर 10 प्रतिशत तक सिविलियन गाड्र्स रखने की अनुमति ले रखी है। इसके द्वारा महिला गाड्र्स को रखने की बात कही गई थी। लेकिन धीरे-धीरे स्थानीय मंत्रियों-विधायकों आदि के दबाव में 10 प्रतिशत की इस सीमा का उल्लंघन करते हुए बड़ी संख्या में सिविलियन गार्ड भर्ती कर लिए गए।

धरना-प्रदर्शन के अलावा अब ये गार्ड अपने-अपने आकाओं-कृष्णपाल गूजर, सतीश फागना, मूलचंद, राजेश नागर, गौरव गौतम आदि के चक्कर लगा रहे हैं। बदले में ये नेता भी इन्हें तरह-तरह के झूठे-सच्चे आश्वासन देकर बहला रहे हैं। उनकी इतनी हिम्मत नहीं कि वे कॉर्पोरेशन के मुख्यालय में बैठे उच्चाधिकारियों अथवा केन्द्रीय मंत्री मनसुख मांडविया पर दबाव डाल कर इनका कोई भला करा सकें। इतनी बड़ी छटनी के पीछे कॉर्पोरेशन का मुख्य उद्देश्य खर्च घटाना है। उसे संस्थान एवं उसमें कार्यरत लोगों की सुरक्षा से कुछ लेना-देना नहीं, हो भी कैसे सकता है जब उद्देश्य ही खर्च घटाना हो।
नर्सिंग स्टा$फ की भारी कमी के बावजूद 30 नर्सों को काम से हटाने के पीछे भी लक्ष्य खर्च घटाना ही है। विदित है कि यहां 900 बिस्तरों के लिए 587 नर्सिंग स्टाफ के पद स्वीकृत हैं, इनमें रेगुलर केवल 150 हैं और लगभग चार सौ ठेके पर। इनमें से एक तिहाई से अधिक पद रिक्त हैं। पहले से ही चल रही इस स्टाफ की कमी के बावजूद 30 नर्सों को और हटा दिया गया। जाहिर है कि इससे मरीजों को मिलने वाली नर्सिंग केयर, जो पहले से ही कम मिल रही थी अब और भी कम मिलने लगेगी। लेकिन कॉपोरेशन को मरीजों की केयर से क्या लेना-देना, उनसे वसूली तो हर महीने हो ही जाती है, अब उन्हें पर्याप्त सुविधाएं देने की अपेक्षा खर्च घटाने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। कॉर्पोरेशन की इसी मज़दूर विरोधी नीति के चलते उसके खजाने में दिन दूनी-रात चौगुनी वृद्धि होते-होते रकम दो लाख करोड़ के करीब पहुंच चुकी है।

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Mazdoor Morcha
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