फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जहां एनआईटी तीन नम्बर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल को ईएसआई कॉर्पोरेशन खुद सीधे तौर पर संचालित करता है वहीं सेक्टर आठ के अस्पताल तथा इससे जुड़ी 14 डिस्पेंसरियों को राज्य सरकार का श्रम विभाग संचालित करता है।
कॉर्पोरेशन व राज्य सरकारों के बीच तय समझौते के अनुसार चिकित्सा सेवाओं पर होने वाले कुल खर्च का केवल आठवां भाग राज्य सरकार का तथा शेष सात भाग कॉर्पोरेशन खर्च करता है। यानी कि कुल खर्च यदि आठ रुपये है तो एक रुपया राज्य सरकार तथा शेष सात रुपये कॉपोरेशन खर्च करता है। इसके अलावा अस्पताल व डिस्पेंसरियों के लिए ज़मीन खरीदना व इमारतों का निर्माण करना भी कॉर्पोरेशन का ही दायित्व होता है। इतना ही नहीं इमारतों की तमाम तरह की मरम्मत व रख-रखाव का काम भी कॉर्पोरेशन ही करता है। कॉर्पोरेशन व सरकार के बीच इस लेन-देन को लेकर हमेशा ही क्लेश की स्थिति बनी रहती है। न तो कॉर्पोरेशन वाले कुछ देकर राजी और न ही हरियाणा सरकार कुछ लेने को। इसी के चलते इस अस्पताल व 15 डिस्पेंसरियों की स्थिति भयंकर दुर्दशा का शिकार बनी हुई है। इसके परिणामस्वरूप एनएच तीन स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल पर भयंकर दबाव बना रहता है।
इन हालात से परेशान स्थानीय मज़दूर नेताओं ने कई बार कॉर्पोरेशन से गुहार लगाई है कि वह राज्य सरकार से सेक्टर आठ के अस्पताल व इससे जुड़ी डिस्पेंसरियों को मुक्त कराकर अपने हाथ में ले ले। समझा जाता है कि कॉर्पोरेशन के उच्चतम स्तर पर इस मसले का संज्ञान लिया जा रहा है। इससे हरियाणा सरकार कुछ परेशान नज़र आ रही है क्योंकि उन्हें अपने साम्राज्य मेंं सेंध सी लगती प्रतीत हो रही है। बेशक उनसे यह काम संभल नहीं पा रहा फिर भी वह इसे छोडऩे को तैयार नहीं है। इसी संदर्भ में समझा जाता है कि हरियाणा के श्रम मंत्री अनिल विज के आदेश पर सेक्टर आठ के इस अस्पताल में पीपीपी मोड में एमआरआई, सीटी स्कैन आदि-आदि चलाने के लिए टेंडर जारी कर दिया है। चर्चा तो यह भी है कि इसी अस्पताल के बगल में स्थित सर्वोदय अस्पताल वाले यह ठेका लेने के लिए प्रयासरत हैं क्योंकि उनके पास जगह की कमी है और ग्राहक बहुत ज्यादा हैं। ऐसे में ईएसआई के इस अस्पताल का लाभ सर्वोदय वाले उठाना चाहते हैं।
इस योजना के तहत ठेकेदार अपनी ओर से तमाम तरह की मशीनें लगाएगा जो प्राय: बड़े अस्पतालों से रिजेक्ट होकर बाजार में बिकने आती हैं। जाहिर है ये पुरानी मशीनें आधुनिक महंगी मशीनों का एक घटिया विकल्प होती हैं। इन्हें चलाने के लिए ठेकेदार किसी वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट की जगह मात्र एक रेडियोग्रा$फर से ही काम चलाता है। इस योजना के अनुसार ईएसआई के डॉक्टरों द्वारा भेजे गए मरीज़ों का भुगतान तो कॉर्पोरेशन करेगा और बाहर से आने वाली पब्लिक से सीधे तौर पर वसूली ठेकेदार करेगा। इसमें एक पेंच और सामने यह भी आएगा कि जिन बीमाकृत मरीजों के लिए डॉक्टर एमआरआई आदि नहीं लिखेगा और वे उसे कराना चाहेंगे तो वे अपनी जेब से पैसा देंगे।
संदर्भवश, इस अस्पताल में बीते कई वर्षों तक अल्ट्रासाउंड मशीन न रहने के बाद करीब पांच वर्ष पहले ही यह मशीन आई थी जिसकी हालत अब खस्ता हो चुकी है। लगभग यही हालत यहां की एक्सरे मशीन की भी है। रेडियोलॉजिस्ट न होने के चलते रेडियोग्रा$फर तथा काम-चलाऊ एवं डंग टपाऊ ट्रेंड डॉक्टरों से ही मरीजों को बहलाया जाता है। समर्थ एवं सजग मरीज इस अस्पताल में उलझने की बजाय सीधे मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचते हैं। जाहिर है इससे वहां का कार्य-भार अनावश्यक रूप से बढ़ जाता है।
डिस्पेंसरियों में फिर से चलेंगी जांच लैबोरेट्री हरियाणा सरकार के ईएसआई चिकित्सा विभाग ने पिछले दिनों घोषणा की है कि तमाम डिस्पेंसरियों में लेबोरेट्री की सुविधा प्रदान की जाएगी ताकि मरीजों को इसके लिए मेडिकल कॉलेज न जाना पड़े। घोषणा के अनुसार इसके लिए तीन करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत हो चुका है। इस पैसे से उपकरण व अन्य साजो-सामान खरीदा जाएगा। उसके अलावा आवश्यक स्टाफ भी भर्ती किया जाएगा। विदित है कि ईएसआई मैैन्युअल के अनुसार ये तमाम सुविधाएं डिस्पेंसरियों में होनी चाहिए और कभी हुआ भी करती थीं जबकि इनकी उपलब्धता सेक्टर आठ के अस्पताल में भी नहीं बची है। अब यकायक ऐसा क्या हो गया जो ये सुविधाएं उपलब्ध कराने की लफ्$फाजी की जा रही है? घोषणा में यह नहीं बताया गया है कि उक्त सुविधाएं कब से शुरू हो जाएंगी? संदर्भवश सुधी पाठक जान लें कि किसी भी डिस्पेंसरी में न तो टीका लगाने की सुविधा है और न ही मरहम-पट्टी की। दवाओं की तो बात ही मत पूछो। इन हालात में कोई डॉक्टर काम करना भी चाहे तो कैसे कर सकता है? ऐसे में डॉक्टर व अन्य स्टाफ भी केवल जैसे-तैसे हाजिरी लगाने व टाइम- पास करने तक ही सीमित रहता है।