ईएसआई कॉपोरेशन : दवा खरीदारी में बड़ा घोटाला

ईएसआई कॉपोरेशन : दवा खरीदारी में बड़ा घोटाला
September 16 17:52 2024

नई दिल्ली (मज़दूर मोर्चा) देश भर के करीब चार करोड़ मज़दूरों के वेतन से चार प्रतिशत वसूल कर अपने खजाने में 1 लाख 79 हजार करोड़ रुपये पर कुण्डली मारे बैठे केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के अधिकारी सदैव मज़दूरों को इलाज से वंचित रखने के साजिश रचते रहते हैं। मज़दूरों को इलाज से वंचित रखने के साथ-साथ सत्ता से जुड़े लोगों की जेबें भरने की जुगत भी लगाई जाती है। ऐसी ही एक जुगत जन औषधि सिस्टम से दवाइयां खरीदने का आदेश पत्र है। विदित है कि ईएसआई कॉर्पोरेशन द्वारा चलाये जाने वाले तमाम अस्पतालों के लिये दवाएं खरीदने के लिये एक रेट कॉन्टे्रक्ट (आरसी) तैयार किया जाता है। इसके द्वारा करीब 1200 दवाएं आदि नियमित रूप से खरीदी जाती है। लेकिन कोई भी अस्पताल केवल इन 1200 दवाइयों के सहारे चल नहीं सकता। लगभग तमाम अस्पतालों, खासकर बड़े अस्पतालों को आरसी के अतिरिक्त 6000 से अधिक दवाओं की आवश्यकता पड़ती हैं। इनको प्राप्त करने के लिये स्थानीय दवा विकेे्रताओं से टेंडर आधारित एक समझौता किया जाता है। टेंडर इस बात का होता है कि दवा विके्रता कितना डिस्काउंट देगा? जो विके्रता अधिकतम डिस्काउंट देने का लिखित समझौता करता है, उसी से अस्पताल दवाएं खरीदता है। स्थानीय विके्रता होने के चलते वह अस्पताल की आवश्यकतानुसार बिना कोई समय गंवाये आवश्यक दवायें उपलब्ध करा देता है। ऐसा न करने की स्थिति में अस्पताल स्वयं बाजार से वह दवा खरीदकर, कीमत का अंतर उसके बिल में से काट लेता है। सैंकड़ों करोड़ की ब्रॉन्डेड व जैनरिक दवाओं की इस खरीदारी पर कुछ चोर अफसरों व नेताओं की गिद्ध दृष्टि पड़ी तो उन्होंने उसमें सेंधमारी करने की योजना बनाई। उनकी नजऱ में ईएसआई मज़दूरों को ब्रांडेड दवाओं की तो कोई जरूरत होती ही नहीं, यदि हो भी तो मरीज़ खुद बाजार से खरीद ले।

जैनरिक दवाएं खरीदने के लिये जनऔषधि सिस्टम से सभी दवाएं खरीदने का फरमान जारी कर दिया। यह कम्पनी आम जनता को 25 प्रतिशत डिस्कॉउंट देती है जबकि ईएसआई को 20 प्रतिशत देगी, यानी कि पांच प्रतिशत की तो ठगी यहीं हो गई। इससे भी बड़ी ठगी तो यह है कि ईएसआई अस्पतालों को लोकल केमिस्ट जेनरिक दवाइयों पर 80 प्रतिशत तक का डिस्कॉउंट देती आ रही थी जो अब जन औषधि सिस्टम के कारण घटकर 20 प्रतिशत रह जायेगा।

गरीब मज़दूरों के खून-पसीने की कमाई पर यह सैंकड़ों-करोड़ की लूट कोई मामूली लूट नहीं है। गौरतलब है कि मज़दूरों का लहू पीने की यह योजना, 28 फरवरी 2024 को रिटायर होने वाली पूर्व केन्द्रीय श्रम सचिव आरती आहूजा ने 31 जनवरी 2024 को बनाई थी। इसका आविष्कार उन्होंने मात्र पांच माह की अपनी इस तैनाती के दौरान कर डाला। इससे पहले वे केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में स्वास्थ्य सचिव पद पर तैनात रह चुकी थीं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और ईएसआई कॉर्पोरेशन की कार्यशैली तथा मरीज़ों के प्रति दायित्वों में दिन-रात का अंतर है जिसे जानने व समझने का कोई प्रयास आरती आहूजा ने नहीं किया। स्वास्थ्य मंत्रालय की नीति के अनुसार केवल कुछ दवाएं सरकार खरीदती है और बाकि मरीज़ों को बाहर से खरीदने को कह दिया जाता है। उनकी नीति के अनुसार मरीज़ों को केवल सरकारी अस्पतालों में रेफर किया जाता है न कि प्राइवेट अस्पतालों में।

इसी तर्ज पर वे कॉर्पोरेशन को चलाना चाहती थीं। वे कदापि नहीं चाहती थीं कि ईएसआई मरीजों के लिये ब्रॉन्डेड दवाइयां खरीदी जाएं और आवश्यकता पडऩे पर उन्हें निजी अस्पतालों में रेफर किया जाए। उस मूर्ख एवं जनविरोधी आरती आहूजा ने कभी यह जानने व समझने का प्रयास नहीं किया कि ईएसआई अस्पतालों में आने वाले मरीज़ कॉर्पोरेशन को अग्रिम रूप से पैसा देते आ रहे हैं; उनका पूरा इलाज करने का कानूनी दायित्व कॉर्पोरेशन का है। लेकिन उस मूर्ख महिला को यह सब समझने की आवश्यकता इसलिये नहीं थी कि उसकी पुश्त-पनाही पर मोदी की संघी सरकार खड़ी थी। जानकारों के मुताबिक फार्मास्यूटिकल एंड मेडिकल डिवाइसेज ब्यूरो ऑफ इंडिया (पीएमबीआई) ने दवाइयों की सप्लाई के लिए कुछ संघी व्यापारियों की कंपनियों से समझौता किया हैं, उनके धंधे को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें यह कार्य सौंपा गया है।

आरती आहूजा के निर्देशन में ईएसआई अस्पतालों की स्थिति बद से बदतर कर दी गई। खर्चा बचाने के लिये न केवल ब्रॅान्डेड दवाइयों की बल्कि इम्पलांट आदि की खरीदारी पर भी कड़ा अंकुश लगा दिया गया।

विदित है कि सुपरस्पेशलिटी के मामलों में ब्रांडेड दवाओं के बगैर इलाज असम्भव होता है। आरती आहूजा के निर्देशन में खरीदारी तो प्रतिबन्धित की सो की, रेफरल पर भी पाबंदी लगा दी गई। उनके अनुसार रेफरल केवल सरकारी अस्पतालों को ही किया जाना चाहिये। इसके चलते कॉर्पोरेशन को मोटा भुगतान कर चुकने वाले गरीब मज़दूर इलाज कराने के लिये दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

गोबर से भरे दिमाग़ वाली इस आरती आहूजा ने कभी ये देखने का प्रयास नहीं किया कि उसकी नाक के नीचे बसई दारापुर मेडिकल कॉलेज के 600 बिस्तरों में से 300 बेड हमेशा खाली क्यों रहते हैं? इतना ही नहीं देश भर में कॉर्पोेरेशन के अस्पतालों में भी 50 से 60 प्रतिशत बिस्तर खाली ही पड़े रहते हैं क्यों?

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Mazdoor Morcha
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