गजब: नाम एंटी करप्शन ब्यूरो, काम भ्रष्ट नौकरशाहों को बचाना फऱीदाबाद ( मज़दूर मोर्चा) ज़ीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटने वाली खट्टर सरकार में नगर निगम में हुए दो सौ करोड़ का घोटाला सैनी सरकार में घट कर महज सवा दो करोड़ का रह गया है। अब क्योंकि सवा दो करोड़ का छोटा सा घोटाला है तो एंटी करप्शन ब्यूरो ने भी मान लिया कि यह सोनल गोयल, एम शाईन और अनिता यादव जैसे आईएएस अफसरों के स्तर से कहीं छोटा है, सो अदालत में पेश किए गए चालान में इन तीनों का नाम नहीं रखा गया है। सिर्फ ठेकेदार सतबीरा सहित नगर निगम के बड़े- छोटे बीस कर्मचारियों पर ठीकरा फोड़ा गया है। समझा जा सकता है कि दो सौ करोड़ के घोटाले को सवा दो करोड़ करने और तीन आईएएस अफसरों को बचाने में एंटी करप्शन ब्यूरो के ‘कर्मठ और ईमानदार अधिकारियों ने जांच में कितनी मेहनत की होगी।
राज्य सतर्कता एंव भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो चंडीगढ़ की ओर से बुधवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार ब्यूरो ने आरोपी सतबीर सिंह ठेकेदार सहित नगर निगम के तत्कालीन एईएन दीपक कुमार, एक्सईएन रमन शर्मा, राजन तवेतिया एक्सईएन आउटसोर्सिंग, चीफ इंजीनियर दौलत राम भास्कर, लेखा शाखा के क्लर्क नवीन रत्रा, ऑडिट अधीक्षक दीपा पब्बी, सीमा भाटिया, शशी आर्य, अकाउंट ऑडिट शाखा के ओआई सतीश कुमार, एओ विशाल कौशिक, ऑडिटर जरीना, ऑडिटर अमित, सुनील कुमार, राजेन्द्र सिंह, सीनियर ऑडिटर मनीश शर्मा, नवीन कुमार उर्फ नवीन यादव, ज्वाइंट कमिश्नर दीपक थापर, आउटसोर्सिंग क्लर्क पंकज व प्रदीप कुमार यानी कुल 20 लोगों के खिलाफ चालान पेश किया है। इन सबके खिलाफ आईपीसी के तहत धोखाधडी, फर्जी दस्तावेज बनाने, सुबूत मिटाने, सरकारी नौकर होते हुए जानबूझ कर क्षति पहुंचाने, आपराधिक न्यासभंग, जालसाजी आदि की धाराओं के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं।
चालान में बताया गया है कि इन सबने सतबीर सिंह ठेकेदार के साथ मिलीभगत करके बल्लबगढ़ में वार्ड नं. 8, 9, 10, 31, 33 से 40 में इन्टरलॉकिंग टाईल, स्टोन मैटल सप्लाई, नालियों की मरम्मत व पुलियों के निर्माण कार्य के एक समान कीमत के 46 फर्जी बिल व दस्तावेज तैयार किए। इन बिलों के जरिए सतबीर सिंह ठेकेदार की फर्मो में 2 करोड़ 25 लाख 53 हजार 749 रुपये का गलत भुगतान करके सरकारी राशि का गबन किया है। दो सौ करोड़ के घोटाले को सवा दो करोड़ तक लाने में एसीबी के अधिकारियों को करीब आठ साल की गहन छानबीन करनी पड़ी। 2018-19 में एसीबी घोटाले में आईएएस सोनल गोयल, एमशाईन और अनिता यादव को बराबर का दोषी बता रही थी, यहां तक कि ठेकेदार सतबीरा के बयान के आधार पर तत्कालीन मंत्री मूलचंद शर्मा भी इस भ्रष्टाचार में फंस रहे थे। सतबीरा के इकबालिया बयान थे कि उसने मूलचंद को चालीस लाख कीमत वाली फॉच्र्यूनर गिफ्ट की थी। एसीबी ने मूलचंद से वह फॉच्र्यूनर बरामद भी कर ली थी।
चीफ इंजीनियर डीआर भास्कर की गिरफ्तारी और पूछताछ के बाद तो एसीबी को घोटाले की पूरी कहानी पता चल गई थी। आईएएस सोनल गोयल के खिलाफ उनके सक्रिय रूप से शामिल होने के पुख्ता साक्ष्य जुटा लिए गए थे। यहां तक कि एसीबी उनके खिलाफ केस दर्ज कर पूछताछ करने की तैयारी कर रही थी। लेकिन वो कोर्ट चली गईं। आईएएस एम शाईन और अनिता यादव ने भी करोड़ों रुपयों के फर्जी विकास कार्यों की फाइलें पास की थीं, इन दोनों अधिकारियों को भी जांच में शामिल किया गया था। गबन के गवाह रहे नगर निगम के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों का तो यहां तक दावा है कि फर्जी विकास की फाइलों को पास करने का आदेश मुख्यमंत्री के निजी सचिव खुल्लर के पास से आता था, सीएम कार्यालय से आए इस मौखिक आदेश के आधार पर ही गबन और कमीशन का खेल चला। एसीबी को जांच में इन सारे तथ्यों की जानकारी हो गई थी।
अब क्योंकि मुख्यमंत्री के मातहत आने वाली एंटी करप्शन ब्यूरो पर सरकार की बदनामी और फजीहत से बचाने का दबाव था, और यदि जांच गहराई से की जाती तो मूलचंद शर्मा से लेकर खुल्लर जैसे वरिष्ठ नौकरशाहों तक बात पहुंचती। ऐसे में सरकार की मंशा के अनुरूप जांच कर रही एसीबी ने सारे घोटाले का मास्टर माइंड सतबीरा और चीफ इंजीनियर डीआर भास्कर को बनाकर बाकी निगम के प्यादों को बलि का बकरा बना डाला। कोई भी मोटी बुद्धि वाला व्यक्ति बता सकता है कि बिना आला अफसरों की ख्वाहिश और मौखिक आदेश के कोई भी कर्मचारी चाहे वह ऑडिट शाखा का अधीक्षक हो या क्लर्क अपनी नौकरी दांव पर नहीं लगाता। अब जहां सीएम साहब के निजी सचिव के यहां से आदेश जारी हो रहा हो तो क्या निगमायुक्त और क्या क्लर्क सब जी हुजूरी ही करेंगे। इतना तो तय है कि दो सौ करोड़ के घोटाले को मात्र सवा दो करोड़ में समेट कर जो करीब 197 करोड़ राशि गोल कर दी गई है, बड़े अधिकारियों को बचाने में उसका बड़ा योगदान रहा होगा।
हालांकि प्रेस विज्ञप्ति में आईएएस अफसरों का नाम नहीं है लेकिन चालान दाखिल करते वक्त अदालत को यह बताया गया कि इन नौकरशाहों के खिलाफ सप्लीमेंटरी चालान बाद में दाखिल किया जाएगा। शायद यह कहना इसलिए जरूरी समझा गया होगा क्योंकि चालान किए गए उक्त 20 आरोपियों की कोई औकात नहीं कि वे अपने बूते एसा घोटाला कर सकें। नगर निगम में निगमायुक्त की मर्जी के बगैर एक पत्ता भी हिल नहीं सकता, ऐसे में इन नौकरशाहों की मिलीभगत के बगैर कोई घोटाला संभव नहीं हो सकता।