मोदी राज में आवागमन हुआ दूभर फरीदााबद (मज़दूर मोर्चा) राजधानी दिल्ली व औद्योगिक नगरी फरीदाबाद के बीच प्रात: छ: बजे से आठ बजे के बीच जो शटल ट्रेनें चला करती थीं वे कोरोना के नाम पर ऐसी बंद हुई कि पुरानी स्थिति में वापस आना ही भूल गई। इनमें से कुछ ट्रेनें बल्लबगढ़ से, तो कुछ पलवल से, तो कुछ कोसी व मथुरा से चल कर दिल्ली पहुंचती थी। इन तमाम ट्रेनों में दैनिक यात्री इस कदर ठूंस-ठूंस कर भरे रहते थे कि डिब्बों में चढऩा-उतरना कोई आसान काम नहीं होता था। इन ट्रेनों में मासिक शुल्क 100 रुपए के आस-पास हुआ करता था और एक दिन का भाड़ा आठ-दस रुपए तक होता था। मोदी की मूर्खता के चलते ये तमाम ट्रेनें यकायक बंद कर दी गई।
करीब एक साल तक इन ट्रेनों को बंद रखने के बाद बेइमान एवं जनविरोधी मोदी सरकार ने धीरे-धीरे इक्का-दुक्का ट्रेन चलानी शुरु तो की लेकिन उन पर ‘स्पेशल’ का फट्टा लगा कर किराया तीन गुना तक बढ़ा दिया। मासिक शुल्क वाली योजना तो कई महीनों तक पूरी तरह स्थगित रखी गई। जाहिर है ऐसे में यात्री मजबूरन मोदी का मुंहमांगा भाड़ा देकर यात्रा करते रहे। गौरतलब है कि कोरोना के तुरन्त बाद मेट्रो ट्रेन सर्विस बाकायदा पूरी तरह बहाल हो गर्ई थी। वहां कोई ‘स्पेशल’ का फट्टा लगा कर भाड़े की लूट भी नहीं की गई। रेलवे शटल सेवा अपर्याप्त होने के चलते यात्रियों का बड़ा भाग मेट्रो रेल की ओर शिफ्ट कर गया। कोरोना के चार साल बाद आज भी प्रात: छ: से नौ के बीच मात्र पहले की अपेक्षा आधी ही शटल सेवाएं उपलब्ध हैं। जिसके चलते मेट्रो रेल व बसों पर सवारियों की निर्भरता अधिक बढ़ गई।
शटल सेवा के अपर्याप्त आवागमन के चलते यात्रियों को मेल ट्रेनों में 40 रुपए का टिकट लेकर सफर करना पड़ता है। इन ट्रेनों का ठहराव केवल निजामुद्दीन व नई दिल्ली स्टेशनों पर ही होता है। बीच वाले स्टेशनों के लिए यात्रियों को मेट्रो रेल व बसों पर ही निर्भर रहना पड़ता है जिस पर समय व पैसा अधिक खर्च करना पड़ता है। गौरतलब है कि कोरोना से पहले दिल्ली पलवल के बीच मात्र तीन रेलवे ट्रैक चालू थे जो अब बढ़ कर चार हो गए हैं। उसके बावजूद ट्रेन सेवाओं को नहीं बढ़ाया जा रहा। हां, लूट कमाई के लिए $फरीदाबाद स्टेशन पर सैकड़ों करोड़ की लागत से भवन निर्माण कार्य जोरों से चल रहा है। जबकि रेल यात्रियों को जरूरत है अधिक रेलगाडिय़ों की।
स्थानीय सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर जो शहर की नालियों, खरंजों व छोटी-मोटी सड़कों पर नारियल फोड़ते घूम रहे हैं, उन्हें क्या यात्रियों की यह समस्या नहीं दिखती? वे नगर निगम, ‘हूडा’ व एफएमडीए के कामों में जो वाहियातपने की दखलंदाजी करते रहते हैं उसके बजाय उन्हें केन्द्र सरकार से सम्बन्धित रेल-व्यवस्था में सुधार की ओर ध्यान देने की जरूरत है। गूजर महोदय जनता को बहकाने के लिए बल्लबगढ़-पलवल मेट्रो रेल का शगूफा छोड़ते हैं तो वे शायद ये नहीं जानते कि खंबों पर चलने वाली मेट्रो रेल ट्रैक की लागत जमीन पर डाले जाने वाले साधारण रेल ट्रैक से 100 गुना अधिक आती है। जाहिर है कि इतनी महंगी लागत को पूरा करने के लिए जो भाड़ा मेट्रो रेल वसूलेगा, क्या साधारण यात्री उसे भुगता पाएंगे?