धार्मिक कट्टरताओं का कहर सबसे ज़्यादा स्त्रियों पर टूटता है. लगभग सभी धर्म घोर पितृसत्तात्मक हैं, पुरुषों के लिये, पुरुषों द्वारा, पुरुषों की दृष्टि से लिखे गए हैं, इसमें संशय की गुंजाइश कम होती जा रही है. बहस बस इस बात की है कि किस धर्म ने कितनी कम या ज़्यादा रियायत स्त्रियों को दी है. मगर ये तय है कि सभी धर्म उन्हें कहीं न कहीं पुरुषों से दोयम मानते हैं.
जो धार्मिक नियमों का इच्छा अनिच्छा से पालन करती रहें वे स्त्रियाँ अच्छी और अनुकूल, जो उन नियमों को लागू करने में सत्ता की पक्की समर्थक हों वो बेहतरीन, और जो विरोध करने लगें अपने समान हक़ , अवसर, सम्मान और चुनने की स्वतंत्रता की बात करें वो धिक्कार के क़ाबिल हैं या मानसिक रूप से दिवालिया.
2022 में मॉरल पुलिसिंग के चलते 22 वर्षीय माशा अमीनी की हिरासत में मृत्यु के बाद पिछले साल ईरान में महिलाओं द्वारा लम्बा प्रोटेस्ट क्यों चला हिजाब के खि़लाफ़, जिसे लगभग कुचल दिया गया मगर महिलाओं के भीतर 1979 में जबरन लादी गई हिजाब की पाबंदी के खि़लाफ़ असंतुष्टि और आक्रोश को कैसे कुचला जाएगा? मुझे नही पता कि कल प्रोटेस्ट करने वाली इस छात्रा का नाम क्या है, और जेल में जाने के बाद वो जीती रहीं या नहीं, मगर उनके इस साहस ने इस तस्वीर को महिलाओं के हिजाब के खिलाफ़ चल रहे संघर्ष का प्रतीक बना दिया है.