डीआरटी के पीठासीन अधिकारी एमएम ढोंचक ने उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के फैसले को खंडपीठ में दी चुनौती

डीआरटी के पीठासीन अधिकारी एमएम ढोंचक ने उच्च न्यायालय  के एकल न्यायाधीश के फैसले को खंडपीठ में दी चुनौती
April 06 15:03 2025

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
चंडीगढ़ के ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी)-2 के पीठासीन अधिकारी एमएम ढोंचक ने एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील की है। इसमें उन्होंने भारत संघ द्वारा उनकी निलंबन की अवधि 180 दिन के लिए बढ़ाने के 5 नवंबर, 2024 को जारी किए आदेश को चुनौती दी है। अपनी लैटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) में ढोंचक ने कहा है कि एकल न्यायाधीश ने अपने फैसले में उनके द्वारा किए गए किसी अशिष्ट व्यवहार का कोई विवरण नहीं दिया। दूसरा आरोप काम करने की गति को धीमा रखना बताया गया है जबकि रिकॉर्ड के अनुसार उनके द्वारा निपटाए गए केसों की संख्या बाकी अन्य 38 न्यायाधिकरणों से भी अधिक है। इन तथ्यों और ढोंचक की बेदाग ईमानदारी को दरकिनार करते हुए एकल पीठ ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया। समझा जा सकता है कि ढोंचक का एकमात्र ‘कुसूरÓ यह था कि वे बेकाबू बार के आगे झुके नहीं।

फैसला करते समय एकल जज ने इस बात का भी ध्यान नहीं रखा कि ढोंचक केवल चार साल के लिए नियुक्त हुए थे और 21 फरवरी 2026 को उनका कार्यकाल खत्म हो जाएगा। जब दस हजार से अधिक मामले उनके पास लंबित पड़े हों, उन्हें निलंबित करने और कार्रवाई करने का फैसला तुरंत ले लिया गया। विवादित फैसले में बताया गया कि जांच अधिकारी ने 29 मई 2024 को जांच करने से इनकार कर दिया और 12 फरवरी 2025 तक दूसरा जांच अधिकारी नियुक्त नहीं किया गया था। यदि विवादित फैसले के सार को समझा जाए तो ऐसा लगता है कि अपीलकर्ता ढोंचक केवल जांच अधिकारी की नियुक्ति की मांग कर रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है। इस आधार पर उन्हें दोषी ठहराया जाना और उनके निलंबन की अवधि बढ़ाकर उन्हें दंडित किया जाना कलंकपूर्ण है।

ढोंचक के अनुसार भारत संघ द्वारा 5 नवंबर 2024 को उनका निलंबन 180 दिन यानी 8 मई 2025 तक बढ़ाए जाने के अवैध, अतार्किक और मनमाने आदेश के विरुद्ध उन्होंने हाईकोर्ट में रिट दायर की थी। साथ ही उन्होंने अपनी बहाली के लिए परमादेश जारी करने की मांग की थी। एकल जज ने अपने फैसले में ढोंचक द्वारा दिए गए किसी भी तर्क एवं तथ्य को लिखने व उस पर टिप्पणी करने की भी जरूरत नहीं समझी। एमएम ढोंचक ने पीठ को बताया कि एकल जज के फैसले के पैरा 17 में उल्लेख किया गया है कि प्रतिवादी भारत संघ के वकील द्वारा पेश किए गए रिकॉर्ड में सस्पेंशन रिव्यू कमेटी (एसआरसी) की 23 अक्तूबर 2024 की बैठक के मिनट शामिल थे। यह रिकॉर्ड उनके संज्ञान में ही नहीं लाया गया और उन्हें इसे देखने से वंचित रखा गया जो कि प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है।

एकल जज ने लिखा है कि उनका निलंबन रद्द करने से निष्पक्ष जांच बाधित होगी। यह किसी भी समझदार व्यक्ति की समझ से परे है, क्योंकि ढोंचक के काम करने से जांचकर्ता के काम में कोई बाधा नहीं पड़ सकती। उनका निलंबन एवं उसका विस्तार भी किसी सक्षम अधिकारी द्वारा ही किया जा सकता है जो कि नहीं किया गया।
एकल जज के फैसले में विरोधाभास तब नजर आता है जब एक जगह वह कहते हैं कि निलंबन के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है और दूसरी जगह वह अपील किए जाने को मना करते है। एकल जज यह भी तय नहीं कर पाया कि निलंबन हुए एक साल बीतने के बाद भी जांच अब तक पूरी क्यों नहीं हुई, इसके लिए कौन दोषी है।
ढोंचक के अनुसार वित्तीय संस्थानों की ऋण वसूली के लिए उनके काम को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। न्यायाधिकरण में लगभग दस हजार मामले लंबित हैं, इनके अलावा नए मामलों की आमद भी हो रही है, उनके क्षेत्राधिकार में पूरा हरियाणा और चंडीगढ़ आते हैं।

20 मार्च को न्यायमूर्ति नवीन चावला और रेणू भटनागर की बेंच ने एलपीए पर सुनवाई की। जस्टिस ढोंचक के तर्क सुनने के बाद केंद्र सरकार के वकील ने नोटिस स्वीकार किया और बेंच ने मामले की सुनवाई 15 अप्रैल 2025 को निर्धारित कर दी।

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