डॉ. रामवीर यूं तो कोई शंका होने पर संविधान की व्याख्या करने का काम सर्वोच्च न्यायालय का है पर चूंकि वह ‘कौन सच्चा भारतीय है’ (जस्टिस दीपांकर दत्ता) और आवारा कुत्तों (जस्टिस जे बी पारदीवाला) जैसे बड़े प्रश्नों से जूझ रहा था इसलिए चुनाव आयोग ने स्वयं ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उन प्रश्नों का उत्तर दे दिया जिसके लिए लोगों के सर्वोच्च न्यायालय जाने की आशंका थी। विपक्ष ने पूछा था कि केंचुआ चुनाव केन्द्रों की सीसी टीवी फुटेज क्यों नहीं दे रहा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया, बताया क्या पत्रकारों से पूछा कि क्या ऐसी फुटेज सार्वजनिक की जानी उचित है जिसमें वोटर माताएं बहनें दिख रही हैं। अनुमान किया जा सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त भाजपा के बेटी बचाओ नारे को कितनी गम्भीरता से लेते हैं, आखिर हर महिला वोटर किसी की बेटी तो होती ही है! दरअसल केंचुआ निष्पक्ष चुनाव प्रबन्धन के अपने मुख्य काम को छोड़ कर अन्य हर काम के लिए गम्भीर है बशर्ते काम उनके द्वारा बताया गया हो जो उनको (ज्ञानेश कुमार को) लाए हैं। भाजपा नारा नहीं देती – नारों का टैंप्लेट देती है, ‘हम उनको लाएंगे जो राम को लाए हैं’ ऐसा ही टैंप्लेट है जिस पर हर नौकरशाह चल रहा है। वैसे भी सामन्ती मूल्यों को बढ़ाना भाजपा के एजेंडे में है। स्वामिभक्ति से बडा सामन्ती मूल्य क्या हो सकता है! जगदीप धनखड यहीं तो चूक गए, अल्पज्ञ खोजते फिर रहे हैं क्या हुआ क्या हुआ।
हां तो मुद्दा था महिलाओं की निजता, सुरक्षा का। जिस व्यवस्था ने कुम्भ स्नान करती अर्धनग्न महिलाओं के वीडियो महीने भर सरकारी सहयोग से चलाएं हो उसे ही आज वोट करती महिलाओं के सीसीटीवी फुटेज में अनौचित्य दिख रहा है। शुद्ध शाकाहारी परम वैष्णव अपने रसोइए को डांट रहा था ‘मेरे आमलेट में प्याज क्यों डाला?’ यानि अंडा स्वीकार प्याज से परहेज! इस चुटकुले और ज्ञानेश कुमार की प्रेस कॉन्फ्रेेंस में क्या अन्तर है? ज्ञानेश जी को भी ज्ञान है कि समस्या महिलाओं की निजता की नहीं है वोट चोरी दिख जाने की है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव में वोट चुराते चुनाव अधिकारी मसीही का वीडियो जनता भूली नहीं है। चुनाव आयोग द्वारा ज्ञान बांटने की परम्परा तो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ही शुरू कर गए थे, ज्ञानेश कुमार तो उन्हीं का पकड़ाया बैटन ले कर रिले रेस में हैं। राजीव कुमार से पत्रकारों ने पूछा था कि चुनाव सात चरणों में क्यों हो रहा है उत्तर में उन्होंने भारत की भौगोलिक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि इतने बड़े देश में कहीं नदी नाले पहाड़ हैं तो कहीं मैदान हैं, सुरक्षा बलों को लाने ले जाने में भी कठिनाइयां होती हैं। उनसे कौन पूछे कि जब पहले चार चरणों में चुनाव हुआ था तब नदी नाले पहाड़ नहीं थे क्या! सुरक्षा बलों के यातायात के लिए सड़कें और वाहन भी पहले से बढ़े हैं तो चार चरणों में चुनाव अब क्यों नहीं हो सकता।
भारतीय ज्ञान परम्परा में एक उपाधि होती थी तर्कशिरोमणि। भाजपा ने जिन लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया है वे तर्कशिरोमणि तो नहीं कुतर्क शिरोमणि अवश्य हैं। हां राजीव कुमार और ज्ञानेश कुमार में महा कुतर्क शिरोमणि उपाधि के लिए एक अघोषित प्रतियोगिता अवश्य है। लेखक का सुझाव है कि विज्ञान भवन में एक भव्य समारोह हो जिसमें मोदीजी अपने 9कर9कमलों से राजीव कुमार और ज्ञानेश कुमार को महाकुतर्कशिरोमणि उपाधि की प्रतियोगिता में ब्रेकेटिड फस्र्ट आने का पुरस्कार वितरित करें।