फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मुख्यमंत्री नायब सैनी द्वारा निलंबित किए गए पूर्व चीफ इंजीनियर बीरेंद्र कुमार कर्दम का कमरा चीफ इंजीनियर विवेक गिल को आवंटित किया गया है। किसी भी सरकारी अधिकारी को मिली कुर्सी और इस्तेमाल वाला सामान उसका निजी नहीं होता, इसलिए तबादला या पद छोडऩे पर अधिकारी कुर्सी समेत सारा सामान छोड़ कर जाता है और आने वाला दूसरा अधिकारी उसी कुर्सी पर बैठ कर काम शुरू कर देता है। लेकिन गिल महोदय को बीके कर्दम से न जाने क्या खुन्नस है कि उन्होंने बीके कर्दम द्वारा इस्तेमाल की गई एक एक चीज हटवा कर कुर्सी-मेज़ से लेकर फर्नीचर यहां तक कि आगंतुकों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कप-गिलास तक सब बदलवा डाले।
निगम सूत्रों के अनुसार ऊंची कही जाने वाली जाति के गिल साहब तथाकथित नीची जाति वाले कर्दम द्वारा इस्तेमाल किए गए सामान को अपने लिए इस्तेमाल योग्य नहीं मानते, यही कारण है कि आवंटन होने के बावजूद उस कमरे में कदम भी रखना मुनासिब नहीं समझा और कमरे का सारा सामान हटा कर नया लगाने का फरमान सुना दिया। मेज-कुर्सी तो समझ में आती है कि बीके कर्दम इस्तेमाल करते थे लेकिन पंखा, आगंतुकों की कुर्सियां, अलमारी आदि भी बदलने का फरमान सुना दिया गया। ऑफिस के रिनोवेशन में तीन-चार लाख रुपये खर्च होना बताए जा रहे हैं जबकि कमरे से निकाला गया अच्छा-भला फर्नीचर व अन्य सामान कबाडख़ाने में डाल दिए गए। जाहिर है कि इस रेनोवेशन का खर्च विवेक गिल ने अपनी जेब से दिया नहीं, जनता को चूस कर वसूली गई रकम चीफ साहब की खुशी और ऐशोआराम पर लुटाई गई।
हालांकि गिल के कुछ शुभचिंतक उनकी इस करतूत को कर्दम द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का तिरस्कार किया जाना बता कर उनका बचाव कर रहे हैं। जबकि खुद विवेक गिल भी उसी जमात के शातिर खिलाड़ी हैं। 21 जून 2021 को तत्कालीन निगमायुक्त गरिमा मित्तल ने उनके भ्रष्टाचार के कारण उनके खिलाफ चार्जशीट देने की सरकार से सिफारिश की थी। गिल ने इससे भी बड़ा कांड तो न्यायपालिका के साथ कर दिया था। बताते चलें कि मई जून 2024 को हाईकोर्ट के आदेश पर नगर निगम के संदिग्ध शैक्षणिक योग्यता वाले अधिकारियों की डिग्री की जांच और सत्यापन कर रिपोर्ट भेजनी थी। इसके लिए आईएएस महावीर कौशिक की अध्यक्षता में गठित कमेटी में विवेक गिल को सदस्य बनाया गया था। उसे नगर निगम के एसई श्याम सिंह, एक्सईएन पदमभूषण, एक्सईएन ओमदत्त, एसई सहित गुडग़ांव, रेवाड़ी, मानेसर के भी कई एक्ईएन की शैक्षणिक योग्यता का सत्यापन करना था। कोई उसके प्रमोशन में अड़ंगा न लगाए इसलिए विवेक गिल ने जांच में जानबूझ कर कमियां छोड़ी और हाईकोर्ट में गलत जांच रिपोर्ट पेश कर दी गई, नतीजा यह हुआ कि नगर निगम के सभी फर्जी डिग्री वाले इंजीनियर और अधिकारी न सिर्फ बचे बल्कि प्रदोन्नति की लाइन मेें लग गए।
भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में अक्षम सीएम खट्टर की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत ही विवेक गिल को चार्जशीट किए जाने के बजाय सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर पद पर पदोन्नत कर गुडग़ांवां भेज दिया गया था। जैसे कि खट्टर के कार्यकाल में हुए अधिकतर भ्रष्टाचार की जांच आज भी लंबित हंै उसी तरह उस जांच में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। जांच पर कार्रवाई ठंडे बस्ते में डाल देने से कोई बेगुनाह नहीं हो जाता, यह बात विवेक गिल के शुभचिंतकों को भी समझ लेनी चाहिए। सच्चाई यह है कि, काम फर्नीचर या सामान से नहीं होता, इसके लिए अधिकारी की नीयत साफ होनी चाहिए, यदि भ्रष्टाचार ही करना है तो फिर चाहे जो कुर्सी-मेज या कलम हो क्या फर्क पड़ता है।