प्रफुल्ल कोलख्यान अद्भुत परिस्थिति में फंस गया है देश। लोकतंत्र का इतना बुरा हाल है कि कुछ कहते नहीं बनता है। कुछ कहना-सुनना तो तब होता है न, जब न्याय
रविंद्र पटवाल मशहूर शायर साहिर लुधियानवी के गीत की एक पंक्ति कुछ सी प्रकार से हैं- “रहने दे अभी थोड़ा सा भरम, ये जाने वफ़ा ये जुल्म न कर।” गीत
डॉ. रामवीर ये जो हो रहा है गलत हो रहा है मगर तंगनजरों को बड़ा भा रहा है। भौंचक हूं भारत कहां जा रहा है पीते नहीं पर नशा हो
राम पुनियानी जैसे-जैसे 2024 के आमचुनाव नजदीक आ रहे हैं, कुलीन वर्ग के कुछ मुसलमान अपने समुदाय से अपील कर रहे हैं कि भाजपा के बारे में अपनी राय पर
विवेक कुमार की ग्राउन्ड रिपोर्ट सर वो एक्चुअली आप हिस्ट्री के बारे में बात कर रहे थे न उसी से हमारे एमटीएस उमेश को शक हुआ कि कहीं आप गाइड
“संयुक्त राज्य अमेरिका के इस्पात और तेल के सम्राटों और बाकी सम्राटों ने मेरी कल्पना को हमेशा तंग किया है. मैं कल्पना ही नहीं कर सकता कि इतने सारे पैसेवाले
हरिशंकर परसाई मेरे एक मित्र को पीलिया हो गया था। वे अस्पताल में भर्ती थे। प्रभावशाली आदमी थे। सब डॉक्टर लगे थे। एक दिन मैं देखने गया तो पाया कि
भय का भूत होता है, वास्तविकता का नहीं. भ्रामक धारणाओं व अंधविश्वास के वशीभूत हो कर भूतप्रेत की कल्पना कैसे मानसिक रोगों को जन्म देती है, जानें. बिहार के चैनपुर
राम पुनियानी आने वाली 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन होना है. इसके लिए जिस स्तर पर व्यापक तैयारियां की जा रही हैं और इसमें भागीदारी के
राम पुनियानी 1980 के दशक में देश के इतिहास ने एक नया मोड़ लिया था. पहली बार, राममंदिर जैसा भावनात्मक मुद्दा आर्थिक और सामाजिक न्याय जैसे मूलभूत मुद्दों से ज्यादा