मज़दूर मोर्चा ब्यूरो अक्टूबर 2024 में हुए हरियाणा विधानसभा चुनावों के आश्चर्यजनक परिणाम देखने पर स्पष्ट नजर आ रहा था कि चुनाव-प्रक्रिया में भारी घोटाला हुआ है। ये घोटाला इतनी सफाई एवं महारत के साथ चुनाव आयोग ने किया था कि उसको पकड़ पाना आसान काम नहीं था। दिनांक पांच नवम्बर को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी प्रेसवार्ता में जिस तरह से इस घोटाले का पर्दाफाश किया है, वह कोई सरल काम नहीं है।
उसी वर्ष लोकसभा चुनाव में मतदान कर चुके साढ़े तीन लाख मतदाताओं के वोट काट देना और 25 लाख नए एवं फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़ देना, वह भी इस सफाई से कि पकड़ में न आने वाला कारनामा चुनाव आयोग ने किया था। एक-एक मतदाता से नाम बदल-बदल कर कई-कई बार विभिन्न बूथों से भाजपा के पक्ष में मतदान कराया गया। राहुल ने इन्हें खोज-खोज कर इनके फोटो, बदले हुए नाम, बदली हुई आयु, बदले हुए अते-पते सहित पूरे सबूत एकत्र करने के बाद ही प्रेसवार्ता में इस घोटाले को उजागर किया। बेशक 80 मिनट की इस वार्ता में काटे गए तथा जोड़े गए तमाम मतदाताओं का पूरा ब्योरा नहीं दिया जा सकता था, लेकिन वे पूरा ब्योरा तमाम सबूतों सहित लेकर बैठे थे।
वार्ता में उपस्थित पत्रकारों तथा देश भर में सुनने वाली तमाम एजेंसियों के लिए विस्तृत जांच का खुला न्योता दिया गया था। एक-एक पते पर सैंकड़ों मतदाताओं के नाम दर्ज पाए गए। ऐसे मतदाता भी पाए गए जिनके नाम दूसरे राज्यों की मतदाता सूचियों में भी दर्ज थे। इस चोरी को सम्पन्न करने के लिए चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को मतदान शुरू होने से कुछ समय पूर्व ही जारी करता है ताकि कोई उनकी चोरी न पकड़ सके। मतदान केन्द्रों की वीडियो ग्राफी का प्रावधान इसलिए किया गया था कि मतदान के बाद मतदाताओं को पहचाना जा सके। इसी पहचान को छुपाने के लिए चुनाव आयोग यह वीडियो किसी को देखने ही नहीं देता।
गुजरात में भयंकर आपराधिक वारदातें सफलता पूर्वक करने का अनुभव रखने वाले नरेन्द्र मोदी व अमितशाह ने 2014 में देश की सत्ता हथियाने के बाद आगामी 50 साल तक का रोड-मैप तैयार कर लिया था। इसके लिए मीडिया पर कब्जा, न्यायपालिका को अपनी कठपुतली बनाना तथा तमाम केन्द्रीय एजेंसियों व संवैधानिक संस्थाओं को अपनी अंगूठे के नीचे रखना जरूरी था। इन्हीं में से एक चुनाव आयोग भी है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पहले जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में देश के मुख्य-न्यायाधीश बैठ कर करते थे, उसे अब मोदी व शाह करने लगे हैं। जाहिर है कि यह जोड़ी चुन-चुन कर ऐसे लोगों को चुनाव आयुक्त बनाती है जो इनके इशारों पर नाचे।
चुनावी हेरा-फेरी के लिए पहले बटन दबाने में हेरा-फेरी, फिर मशीन बदलने की हेरा-फेरी उसके बाद मतदान आंकड़ों की हेरा-फेरी और रही-सही कसर पूरी करने के लिए मतगणना में हेरा-फेरी चुनाव आयोग द्वारा की जाती रही। एक हथकंडा पकड़े जाने के बाद दूसरा अपनाया जाता था। उक्त सारे हथकंडे पकड़े जाने के बाद चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों में नाम जोडऩे व काटने का नया खेल शुरू किया है। हरियाणा और महाराष्ट्र में सफलता पूर्वक खेलने के बाद अब इसकी तैयारी बिहार में की गई है। यहां करीब 70 लाख वोट काटे गए व 18 लाख वोट जोड़े गए हैं। यहां कितनी कामयाबी मिलेगी अथवा चुनाव आयोग को मुंह की खानी पड़ेगी, इसका खुलासा तो 14 नवम्बर को ही हो पाएगा।
राहुल द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब देना तो चुनाव आयोग को चाहिए था लेकिन सबसे पहले मिर्ची लगी मोदी सरकार को। इनके एक मंत्री किरण रिजिजु ने कहा कि राहुल कभी कम्बोडिया, थाईलैंड, कोलम्बिया तथा अन्य विदेशों में घूमने-फिरने के बाद देश में आकर ऊल-जुलूल बकवास करते रहते हैं। एक मंत्री ने तो यह भी कहा कि वे युवाओं को भड़का कर दंगा कराना चाहते हैं। हरियाणा के चुनाव अधिकारियों ने कहा कि यदि चुनाव में कोई घपला-घोटाला हुआ था तो अभी तक किसी ने कोई शिकायत क्यों नहीं की? एक साल बाद इस तरह के आरोप लगाने का कोई औचित्य नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि प्रेस-वार्ता की बजाय उन्हें चुनाव आयोग अथवा न्यायपालिका के दरबार में जाना चाहिए था।
जो चुनाव आयोग खुद धांधली कर रहा हो और पूरी न्यायपालिका उसे संरक्षण दे रही हो तो इनके पास जाकर अपना समय तथा ऊर्जा बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं। जो चुनाव आयोग कानून की उल्लंघना करके वोटर लिस्ट, वीडियो ग्राफी तथा अन्य सम्बन्धित दस्तावेज देने तक से इनकार कर दे और जरूरत पडऩे पर सरकार से कानून तक में अभय पाने का परिवर्तन करा ले तो उससे कोई क्या अपेक्षा कर सकता है?
प्रेस-वार्ता में एक सवाल के जवाब में राहुल ने कहा कि उन्हें किसी सुप्रीमकोर्ट में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, उन्होंने यह सारा भंडाफोड़ किसी कमरे में न करके चौड़े में किया है जिसे सुप्रीम कोर्ट भी देख रहा है। बेशक उन्होंने कहा नही लेकिन इसका अभिप्राय यही है कि सुप्रीम कोर्ट यदि मोदी के चरणों में लमलेट नहीं है तो वह स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकता है। वैसे न्यायपालिका की कार्रवाई का नमूना चंडीगढ़ नगर निगम के मेयर चुनाव में देखने के बाद अब ऊचाना विधानसभा चुनाव हारे हुए कांग्रेस प्रत्याशी ब्रिजेन्द्र सिंह की चुनाव याचिका की दुर्दशा से भी समझा जा सकता है। जाहिर है राहुल जनता द्वारा संज्ञान लिए जाने की अपेक्षा करते हैं और इसी के डर से भाजपा सरकार उन पर युवाओं को भड़काने का आरोप लगा रही है। इतिहास गवाह है कि जब संवैधानिक संस्थाएं जनता को न्याय देने के काबिल नहीं रह जाती तो जनता खुद न्याय पाने के लिए निकल पड़ती है।