मज़दूर मोर्चा ब्यूरो बिहार चुनाव को लेकर वर्कर्स सोशलिस्ट पार्टी द्वारा चुनाव पूर्व की गई अपनी भविष्यवाणी के सत्य होने पर उन्होंने कहा कि जो हमने कहा था वही हुआ। (जो हमने कहा था वही हुआ झूठे लेफ़्ट नेताओं की हुआं-हुआं के बीच, भाजपा-जदयू गहठबंधन और भी भारी मतों के साथ वापस सत्ता में आ गया राजद-कांग्रेस गठजोड़ और उसकी दुम पर बैठे फर्जी लेफ़्ट का इस चुनाव में सफ़ाया हो गया बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए हुए इस चुनाव में, भाजपा-जदयू के गठजोड़ वाले हृष्ठ्र की 202 सीटों के मुकाबले, राजद, कांग्रेस और स्तालिनवादी पार्टियों का कथित महागठबंधन कुल 35 सीटें ही हासिल कर पाया हृष्ठ्र के 64त्न वोटों के मुकाबले, उसका वोट प्रतिशत भी आधे से कम- 31त्न पर सिमट गया) पिछली विधानसभा में, 16 सीटें जीतने वाली स्तालिनवादी वाम पार्टियां- सीपीआई, सीपीआई एम और सीपीआई एम एल- राजद-कांग्रेस से मिलकर भी, इस चुनाव में, बड़ी मुश्किल से तीन सीटें ही जीत पाईं। और 4त्न वोट भी हासिल नहीं कर पाईं।
पिछली विधानसभा में, 16 सीटें होने के बावजूद, इन पार्टियों के विधायकों ने बिहार विधानसभा के भीतर या बाहर कोई कारगर भूमिका अदा नहीं की। भाजपा-जदयू सरकार की नीतियों के खि़लाफ़ कोई प्रोटेस्ट नहीं किए मगर चुनाव आते ही उन्होंने फ़ासीवाद के खि़लाफ़ राग अलापना शुरू कर दिया और इसे राजद-कांग्रेस के साथ चुनावी गठजोड़ बनाने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया इस चुनाव में, स्तालिनवादी लेफ़्ट के इन नेताओं ने सारी लोकरंजक तिकड़में भी लगाईं। सीपीआई एम एल के एक उम्मीदवार अमरजीत कुशवाहा की तो चुनाव के दौरान एक धार्मिक अनुष्ठान में दूध से नहाते वीडियो वायरल हुई। भाजपा-जदयू की इस जीत के लिए, ये फज़ऱ्ी लेफ़्ट नेता और उनकी झूठी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। इन नेताओं और उनकी नीतियों ने, चुनाव में, लेफ़्ट को राइट के पीछे बांधकर, लेफ़्ट-राइट की सीमारेखा ही मिटा दी और चुनाव को वर्ग-संघर्ष का अखाड़ा बनने से रोक दिया। इसकी जगह उन्होंने लेफ़्ट को राइट के पीछे बांधने वाली वर्ग-समन्वयवादी नीति को आगे बढ़ाया। इसके चलते, चुनाव के बाद लेफ़्ट के वोट शेयर की गणना तक असंभव हो गई है। सभी सीटों पर लेफ़्ट वोट, राजद-कांग्रेस वोट के साथ गड्डमड्ड हो गया है।
स्वतंत्र लेफ़्ट के न होने से, चुनाव, पहले ही दो पूंजीवादी-दक्षिणपंथी शिविरों के बीच सिमट गया था। एक तरफ़ भाजपा-जदयू के नेतृत्व वाला हृष्ठ्र शिविर था तो दूसरी तरफ़ राजद-कांग्रेस का आईएनडीआईए शिविर, जिसकी पूंछ पर सीपीआई-सीपीएम-सीपीआई एम एल जैसी फर्जी वाम पार्टियां भी बैठी थीं। जनता के सामने कोई स्वतंत्र लेफ़्ट विकल्प था ही नहीं। उसे सांपनाथ-नागनाथ के बीच चुनाव के लिए बाध्य किया गया। चुनाव, वर्ग की जगह, जाति-समीकरणों के कुचक्र में फंसकर रह गया। समाजवादी कार्यक्रम, चुनाव से नदारद था सांझे, न्यूनतम कार्यक्रम के नाम पर जो कचरा बिखेरा गया, वह राजद और कांग्रेस का पूंजीवादी कार्यक्रम था, जिसे बस वाम लफ्फ़़ाज़ी से सजाया, छिपाया गया था, मेहनतकश जनता का इस कार्यक्रम से कुछ लेना-देना नहीं था। लंबे समय तक केंद्र और राज्यों में शासन चलाने वाली कांग्रेस और उसकी सहयोगी रही राजद के नेतृत्व को, मेहनतकश जनता बारम्बार आजमा चुकी है और उन्हें शासक पूंजीवादी इलीट की प्रतिनिधि पार्टियों के तौर पर देखती है। इस सबके चलते, मेहनतकश जनता के सामने कोई जनपक्षीय विकल्प मौजूद नहीं था।
दो पूंजीवादी-दक्षिणपंथी विकल्पों के बीच चुनाव के चलते, स्वाभाविक रूप से जाति-धर्म के संकीर्ण और प्रतिक्रियावादी समीकरण ही शेष रह गए थे ,चुनाव इन्हीं समीकरणों पर लड़ा गया। चुनाव में जहां राजद हमेशा की तरह यादवों का प्रतिनिधित्व कर रही थी, वहीं जदयू बाकी बची जातियों को समेट रही थी कभी बिहार में ब्राह्मणों की प्रतिनिधि पार्टी समझी जाने वाली कांग्रेस का प्रभाव काफी कम बचा था। स्थानीय स्तर पर जाति समीकरणों से भी तालमेल बिठा रही भाजपा ने सांप्रदायिकता, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को अपना हथियार बनाया था। राष्ट्रवाद की इस विषबेल को सीचने में, दक्षिणपंथी विपक्ष और सीपीआई-सीपीआई एम जैसी मध्यमार्गी पार्टियों ने, दशकों-दशक बड़े मनोयोग से हिस्सा लिया है। लुटे-पिटे विपक्ष के पास अब चुनाव प्रक्रिया को कोसने के सिवा कोई चारा नहीं है। अपनी इस पराजय के वास्तविक कारणों का विश्लेषण करने के बजाय, पराजित विपक्ष के नेता, चुनाव में धांधली को इस हार के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
तेजस्वी का कहना है कि विपक्ष इस चुनाव परिणाम को स्वीकार नहीं करेगा और उसके सभी विधायक एक साथ इस्तीफ़ा देंगे। यह दावा और कुछ नहीं, चुनाव में हार की झेंप मिटाने का रास्ता है। इस झूठ के सहारे ये नेता खुद को धोखा देने और अपने घाव सहलाने की हास्यास्पद कवायद कर रहे हैं। धांधली का मामला यदि वास्तव में इतना ही विकट था, तो चुनाव में हिस्सेदारी ही क्यों की? सच यह है कि जाति, धर्म और राष्ट्रवाद की जिस डाल पर विपक्ष के ये नेता आसरा लिए हुए थे, भाजपा और उसके नेतृत्व में संगठित पार्टियों ने उस पर अपना बसेरा बना लिया है और इन नेताओं को उनसे बेदखल कर दिया है। जिस भाजपा-विरोधी पूंजीवादी-विपक्ष को शक्तिशाली और लेफ़्ट की शक्तियों को कमज़ोर बताते हुए, सीपीआई-सीपीआई एम-सीपीआई एम एल के सेंट्रिस्ट नेता, अपने काडरों को बेवकूफ़ बना रहे थे, चुनाव में अपने घाव सहलाते हुए, वह पानी मांग रहा है। चुनाव में, दक्षिणपंथी विपक्ष के साथ ही उसकी दुम पर बैठी सीपीआई-सीपीआई एम और सीपीआई एम एल जैसी सेंट्रिस्ट पार्टियां भी किनारे जा लगीं।
भाजपा-जदयू की इस चुनावी जीत का श्रेय, उनको नहीं, बल्कि दक्षिणपंथी विपक्ष और उसके इन सेंट्रिस्ट सहयोगियों और उनकी झूठी और कुत्सित नीतियों को जाता है। इन सेंट्रिस्ट नेताओं ने, पूंजीवादी-दक्षिणपंथी शिविर के हिस्सों के साथ निरंतर और मजबूत गठजोड़ बनाए रखे हैं अपने नेतृत्व वाली पार्टियों और अनुयायियों को, इन झूठे नेताओं ने, लंबे समय से पूंजीवादी दक्षिणपंथी पार्टियों-मोर्चों के मातहत किए रखा है और इस छलछद्म के सहारे, एक स्वतंत्र वाम-विपक्ष के उभार को रोके रखा है। इन झूठे वाम नेताओं की नीतियों ने, राइट और लेफ़्ट के बीच, पूंजी और श्रम की परस्पर विरोधी पार्टियों के बीच, वोटों के ध्रुवीकरण को रोके रखा है। खुद को लेफ़्ट बताने वाले इन सेंट्रिस्ट नेताओं और पार्टियों का अवसान, निश्चित रूप से लेफ़्ट के लिए नई राह खोलेगा। वर्किंग क्लास और युवाओं के अग्रणी हिस्से, निश्चित रूप से इन चुनाव परिणामों से निष्कर्ष निकालेंगे।
वे स्पष्ट रूप से देख सकेंगे कि पूंजीवादी-दक्षिणपंथी भाजपा-विरोधी विपक्षी खेमे के साथ सांझे मोर्चे बनाकर, फ़ासीवाद को चुनौती देने का स्तालिनवादी ढोंग, कितना लचर और फर्जी है।वे देख सकेंगे कि इन झूठे नेताओं का उद्देश्य संघ-भाजपा या फ़ासीवाद-पूंजीवाद को हराना नहीं, बल्कि विधानसभा में अपने लिए कुछ सीटें झटकना था, जिसमें वे बुरी तरह पिटे हैं वे न सिफऱ् पूंजीवादी विपक्ष की मरीचिका को, बल्कि झूठे वाम और उसकी नीतियों को भी खारिज करते हुए, पूंजीवाद और फ़ासीवाद के खि़लाफ़ संघर्ष को अक्टूबर क्रान्ति के अनिवार्य निष्कर्षों से लैस करेंगे। ‘मज़दूर मोर्चा’ के अनुसार ये चुनाव परिणाम जनता की भावना अथवा उनकी इच्छा को प्रकट करने वाले कतई नहीं है। इन्हें स्पष्ट रूप से चुनाव आयोग ने मैनेज किया है। इसके सबूत में विस्तृत आंकड़े भी प्रकाशित हो चुके हैं। लेकिन यहां एक बड़ा प्रश्न यह पैदा होता है कि जब दिन के उजाले की भंाति साफ दिखाई दे रहा था कि चुनाव आयोग को गठित ही वोट चोरी करने को किया गया था तो तथाकथित विपक्षी दलों ने उसे स्वीकार ही क्यों किया? क्यों नहीं ऐसे चुनाव आयोग का बहिष्कार करते हुए सड़कों पर उतरे? आज भी यदि हिम्मत होती तो इसके बहिष्कार स्वरूप तमाम विपक्षी विधायक अपनी विधायकी से त्यागपत्र दे देते। लेकिन मलाई खाने वाले विधायकों के हिस्से में अधिक नहीं तो जूठन तो आ ही जाती है; उसे भी कैसे छोड़ दें?