प्रभात पटनायक की कलम से वि श्व बैंक ने पिछले ही दिनों 61 देशों के लिए गिनी गुणांक या कोइफीशिएन्ट की एक सूची जारी की है, जो कुछ मामलों में आय वितरण के संबंध में हैं और अन्य मामलों में उपभोग व्यय के वितरण के संबंध में। इस सूची में 2022 में भारत का गिनी गुणांक चौथे सबसे निचले स्थान पर था, जिसके आधार पर मोदी सरकार ने दुनिया भर में इसका शोर मचा दिया कि भारत, दुनिया का चौथा सबसे ज्यादा समतापूर्ण देश है। इस दावे की हास्यास्पदता को पहले ही अनेक शोधकर्ता बेनकाब कर चुके हैं। इसलिए, इस पर और ज्यादा समय खर्च करना तो, मरे हुए घोड़े पर चाबुक बरसाने जैसा ही होगा। फिर भी, एक-दो नुक्ते हैं जिन्हें अब भी उभारा जाना जरूरी है और ये नुक्ते उक्त दावे के बेतुकेपन के संबंध में उतने नहीं हैं, जितने कि देश की अर्थव्यवस्था में वास्तव में जो कुछ होता रहा है, उसके संबंध में हैं। असमानों की तुलना फिर भी आइए हम संक्षेप में उक्त दावे के बेतुकेपन को उजागर करते हुए, पहले ही पेश किए जा चुके तर्कों में से कुछ का सार रख देते हैं। इस स्वत: स्पष्ट तर्क के अलावा कि 61 देशों से दुनिया पूरी नहीं हो जाती है, तीन मुख्य तर्क हैं जो सरकार के उक्त सतही तर्क के खिलाफ दिए गए हैं और जिनमें से हरेक पूरी तरह से वैध है। पहला यह कि आय वितरण की असमानता, उपभोग खर्च वितरण की असमानता की तुलना में बहुत ज्यादा होती है। इसकी वजह यह है कि जैसे-जैसे हम आय की सीढिय़ों पर ऊपर चढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे आय का उपभोग पर खर्च किये जाने वाले हिस्से का अनुपात घटता जाता है, जबकि “बचतों” में लगाए जाने वाले हिस्से का अनुपात बढ़ता जाता है। इसका अर्थ कि किसी भी देश के मामले में, उपभोग यह हुआ आय का खर्च हमेशा ही, आय की तुलना में कम असमानतापूर्ण होता है। इसलिए, देशों के बीच ऐसे गिनी गुणांकों की तुलना करना, जिनकी गणना कुछ देशों के लिए आय वितरण के डॉटा के आधार पर की गयी है और अन्य देशों के लिए उपभोग व्यय के आंकड़ों के आधार पर, जिसमें से बाद वाली श्रेणी में भारत भी आता है।
तुलना को अवैध बना देता है। इस तरह के खिचड़ी डॉटा के आधार पर, इस संबंध में कोई वैध नतीजे नहीं निकाले जा सकते हैं कि किन देशों में आय का वितरण ज्यादा असमानतापूर्ण है और किन देशों में कम। एक नुक्ता जो इस संदर्भ में रखा नहीं गया है, लेकिन कुछ महत्व रखता है, यह है आय वितरण की सीढ़ी के निचले छोर पर, बचतें न सिर्फ शून्य होती हैं, बल्कि वास्तव में बचतें नकारात्मक या ऋण में होती हैं। यानी यह कि उपने उपभोग खर्च को बनाए रखने के लिए, जो उनकी आय से ऊपर निकल जाता है, लोगों को ऋण लेने पड़ते हैं। यह स्वास्थ्य संबंधी आपत आवश्यकताओं. से पैदा होने वाले आवश्यक उपभोग खर्चों के मामले में खासतौर पर लागू होता है। यह एक अतिरिक्त कारण है कि उपभोग खर्च की असमानता, आय असमानता से काफी कम होती है। और इसकी वजह से खिचड़ी या मिश्रित डॉटा पर आधारित गिनी गुणांकों की तुलना कर निष्कर्ष निकालना, और भी ज्यादा त्रुटिपूर्ण हो जाता है।
गिनी गुणांक की अनुपयुक्तता आय वितरण के निचले छोर पर ऋणात्मक बचत होना, एक बहुत ही सुस्थापित तथ्य है। वास्तव में 2006 में जब केरल में एलडीएफ सरकार एक खेतिहर ऋण राहत विधेयक लायी थी, यह पता चला था कि संकटग्रस्त किसानों के ऋण का खासा बड़ा हिस्सा, उपचार संबंधी जरूरतों का नतीजा था। (कुछ लोगों ने तो इस दलील का उक्त विधेयक के खिलाफ इस आधार पर इस्तेमाल भी किया था कि राहत तो सिर्फ उन्हीं किसानों को दी जानी चाहिए, जिन पर उत्पादन के कारण ऋण चढ़ा था, न कि उन्हें जिन पर उपभोग के चलते ऋण चढ़ा था।
दूसरी ओर, वितरण से संबंधित किसी भी नमूना सर्वेक्षण में, वह चाहे आय के वितरण से संबंध में हो या उपभोग के वितरण के संबध में, सबसे ऊपर का सिरा अनिवार्यत: कम प्रतिनिधित्ववाला ही रहता है, क्योंकि अपने महत्व के बावजूद, यह हिस्सा संख्या में बहुत छोटा होता है। इसलिए, इस त्रुटि को दूर करने के लिए शोधकर्ता भांति-भांति के तरीके आजमाते हैं। लेकिन, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा पेश किए गए आंकड़ों में, जिनके आधार पर विश्व बैंक ने भारत के लिए गिनी गुणांक की गणना की है, उक्त त्रुटि के लिए कोई दुरुस्ती नहीं की गयी थी। और यही बात कुछ अन्य देशों के मामले में भी सच है। तीसरी आपत्ति गिनी गुणांक के ही उपयोग पर है। इस गुणांक का संबंध समग्रता में वितरण से होता है। मिसाल के तौर पर अगर कुल आय में शीर्ष 1 फीसद का हिस्सा बढ़ जाता है, लेकिन उसी समय नीचे से पांचवे दशमांश से सबसे नीचे से तीसरे दशमांश की ओर आय वितरण में कुछ बदलाव होता है, तो गिनी गुणांक गिरावट ही दिखा रहा होगा, जबकि शीर्ष 1 फीसद, शेष आबादी की कीमत पर और संपन्न हो गया होगा। इस तरह की स्थिति को ज्यादातर लोग तो आय असमानता में बढ़ोतरी का ही मने मामला मानेंगे, लेकिन गिनी गुणांक आय असमानता में गिरावट ही दिखा रहा होगा।
आय असमानता सौ साल के शिखर पर असमानता के माप के रूप में गिनी गुणांक को लिए जाने का बेतुकापन, एक सरल विचार से स्वत: स्पष्ट हो जाता है। अगर गिनी गुणांक असमानता का संतोषजनक माप होता और अगर भारत में आय की असमानता वाकई घटकर बहुत निचले स्तर पर आ गई होती, तो देश में भूख तथा कुपोषण के सर्वव्यापी होने तथा बढ़ तक होने की व्याख्या करना मुश्किल होगा। चूंकि सरकार जीडीपी की वृद्धि दर ऊंची बने रहने का और सभी प्रमुख बड़े देशों में यह दर अधिकतम बनी रहने का दावा करती है, तब भारत में असमानता घटने के साथ, आबादी के सबसे निचले तबकों की भी आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई होनी चाहिए। और चूंकि आय बढऩे के साथ प्रत्यक्ष रूप से तथा पशु उत्पादों के लिए पशु आहार आदि के रूप में भी, खाद्यान्न का उपभोग बढ़ता है (और यह बात भारत में विभिन्न आय श्रेणियों के बीच भी लागू होती है), तो न तो भारत विश्व खाद्य सूचकांक में भारत 125 देशों में 107वें स्थान पर होता और न ही भारतीय महिलाओं के बीच रक्ताल्पता के मामले बढ़ रहे होते। और कैलोरी आहार के मानक के नीचे आबादी का अनुपात भी, जिसे पहले के योजना आयोगों द्वारा गरीबी को परिभाषित करने के लिए पैमाना माना था, बढ़ नहीं रहा होता। जीडीपी की वृद्धि के दावों की, इन बिगड़ते हुए स्वास्थ्य संबंधी संकेतकों के साथ, जो खुद सरकारी आंकड़ों से निकलते हैं, एक ही तरह से संगति बैठ सकती है, कि यह माना जाए कि आय और अगर गिनी गुणांक की दिशा इसे वितरण की स्थिति बदतर हो रही है। नहीं दर्शाती है, जैसी की विश्व बैंक ने दलील दी है, तो गिनी गुणांक असमानता की स्थिति के माप के लिए एक अनुपयुक्त सूचक है।
थॉमस पिकेट्टी तथा अन्य द्वारा संचालित , विश्व असमानता के आंकडे भी ठीक यही इशारा करते हैं। ये आंकड़े तेजी से बढ़ती आय असमानता को दिखाते हैं, जिसका माप राष्ट्रीय आय में सबसे संपन्न तबकों के हिस्से में होता है। वास्तव में उनके आंकड़ों के अनुसार तो 2023-24 में देश की राष्ट्रीय आय में शीर्ष 1 फीसद आबादी का हिस्सा 23 फीसद था, जो कि पिछले सौ साल में इससे पहले कभी भी इस स्तर पर नहीं रहा था।
आवश्यक सेवाओं के निजीकरण की मार बहरहाल, सरकार के दावों की इन आलोचनाओं में, एक अतिरिक्त महत्वपूर्ण नुक्ता अनदेखा रह गया है। नव-उदारवाद की एक प्रमुख विशेषता है, सार्वजनिक उद्यमों का निजीकरण, जिसमें शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सेवाओं के मुहैया कराने की व्यवस्थाओं का सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र की ओर तबादला भी शामिल है। इस बदलाव के आय वितरण के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं, जिन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है।
हम कोई दो तिथियां ले लेते हैं, जिनके बीच आय का वितरण, हम चाहे किसी भी पैमाने का उपयोग क्यों न करें, पूरी तरह से अपरिवर्तित रहा हो। लेकिन, आबादी के विभिन्न हिस्सों के लिए, यह आय पहले वाले वर्ष में अलग-अलग मालों पर खर्च हो रही होगी: उच्च आय वर्ग के मामले में कहीं महंगी निजी स्वास्थ्य देखभाल पर (क्योंकि संपन्नों को लाइनों में लगना मंजूर नहीं होता है) और गरीबों के मामले में अपेक्षाकृत सस्ती सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल पर। अब अगर पहले समय और बाद वाले समय के बीच सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल सूख जाती है और पहले की तुलना में कहीं बहुत ज्यादा लोगों को निजी स्वास्थ्य देखभाल का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो इन दो तिथियों के बीच वास्तविक आय वितरण बदतर हो गया होगा। यहां तक कि निचले छोर पर वास्तविक आमदनियां पहले से घट भी गयी होंगी, जबकि इन दो समय बिंदुओं के बीच रुपया आय का वितरण, जिसके लिए ही हमारे पास डॉटा है, जस का तस बना रहा होगा और तमाम कीमतें भी जहां की तहां बनी रही होंगी।
बढ़ती वास्तविक आय असमानता आवश्यक सेवाओं के निजीकरण के चलते गरीबों की वास्तविक आय में कोई भी गिरावट इन दो रूपों में से किसी एक में या दोनों में दिखाई देगी-खाद्य आहार में कटौती, जिससे निजी स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा हाथ में रहे या कहीं महंगी स्वास्थ्य देखभाल के लिए पैसा जुटाने के लिए ज्यादा कर्ज लेना या फिर, जिसकी कि संभावना ज्यादा है, उक्त दोनों ही उपायों का योग। लेकिन, बाद वाले मामले में उपभोग खर्च का वितरण तो असमानता में कमी ही दिखा रहा होगा। इसकी वजह यह है कि चूंकि हम उक्त दोनों तिथियों के बीच रुपया आय का वितरण अपरिवर्तित रहा मानकर चल रहे हैं, बाद वाले समय में गरीबों को अपनी स्वास्थ्य देखभाल की जरूरतों के लिए जो ज्यादा कर्ज लेना पड़ेगा, वह खर्च में असमानता में कमी के रूप में दिखाई देगा। इस तरह उपभोग खर्च असमानता में जो कमी नजर आ रही होगी, जिसके लिए सरकार अपनी पीठ ठोक सकती है और जिसे वह आय असमानता में कमी का सूचक मान सकती है, वास्तव में इससे ठीक उल्टी ही सचाई को दिखा रही होगी और यह सचाई है वास्तविक आय असमानता में बढ़ोतरी होना।
यह सिर्फ एक सैद्धांतिक संभावना की बात नहीं है। यह समकालीन नव-उदारवादी भारत में वास्तविक जीवन की एक महत्वपूर्ण परिघटना का मामला है। अखबार इसकी हृदय विदारक खबरों से पटे रहते हैं कि किस तरह उत्तरी भारत के किसान, अपने बच्चों की गंभीर बीमारियों के लिए इलाज कराने के लिए दिल्ली पहुंचते हैं, जहां के बहुत ही भीड़-भाड़ भरे सरकारी अस्पतालों में वे अपनी बारी के लिए इंतजार करते-करते थक जाते हैं और अंतत: निजी अस्पतालों की शरण लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इन निजी अस्पतालों के बिल भरने के लिए उन्हें कर्जे लेने पड़ते हैं या अपनी जमीन बेचनी पड़ती है। और बहुत बार तो सब कुछ कर के भी वे अपने बच्चे की जान भी नहीं बचा पाते हैं और बच्चे तथा जमीन, दोनों से हाथ धो बैठते हैं। इसलिए, सरकार का निजी खर्च की असमानताओं में कमी पर अपनी पीठ ठोकना, जबकि वास्तविकता में, अगर इस तरह की कमी सच भी हो तब भी, इसके पीछे आम जनता की और ज्यादा बदहाली ही छुपी होती है, जिसे निजीकरण के चलते, आवश्यक सेवाओं की अनुचित रूप से बढ़ी हुई कीमतों के जरिए और भी ज्यादा निचोड़ा जा रहा है, निष्ठठुरता की पराकाष्ठा है।