सिद्धार्थ रामू बहुजन-दलित चेतना का जातिवादी चेतना में बदलना, भाजपा की राजनीतिक सफलता की सबसे बड़ी वजह है-संदर्भ हिंदी पट्टी जब हम हिंदी पट्टी की बहुजन राजनीति की बात करते हैं, तो इसका सीधा-सरल निहितार्थ अन्य पिछड़े वर्गों और दलितों की राजनीति है। हिंदी पट्टी में भाजपा धीरे-धीरे बहुजनों की राजनीति के आधार को निगलती जा रही है और यह कार्य बहुत ही सुनियोजित रणनीति और कार्यनीति के साथ कर रही है, जिसकी बागडोर मुख्यत: आरएसएस के हाथ में है। बहुजनों के राजनीतिक आधार को निगलने के लिए आरएसएस-भाजपा तीन काम कर रहे हैं।
पहला बहुजनों का हिंदुत्वीकरण, दूसरा उनकी जातीय चेतना और जातीय अस्मिता बोध का तुष्टीकरण और तीसरा बहुजनों के गरीब हिस्सों को आर्थिक लाभार्थी समूह के रूप में उनसे अलगाकर। आरएसएस-भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही है, हिंदुओं के बीच के वर्णों-जातियों के विभाजन की खाई को सवर्ण वर्चस्व को तोड़े बिना पाटना। आरएसएस-भाजपा वर्ण-जातियों के बीच की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक खाई को न तो पाट सकते हैं, न ही उनकी कोई योजना दिखाई देती है, लेकिन वर्ण-जाति के चलते हिंदुत्व की राजनीति के सामने उपस्थित चुनौती के मुकाबले का तरीका फिलहाल भाजपा ने निकाल लिया है और उसमें उसे काफी सफलता भी मिल चुकी है, मिल रही है और भविष्य में मिलने की संभावना भी दिख रही है। हिंदू समाज का वर्ण-जाति आधारित जो विभाजन हिंदुत्व की राजनीति की असफलता की कभी मुख्य वजह थी, उसे ही भाजपा ने अपनी सफलता का बुनियाद आधार बना लिया।
राम जन्मभूमि आंदोलन और अन्य तरीकों से बहुजनों के हिंदुत्वीकरण की कोशिशों में भाजपा को आंशिक सफलता ही मिली। उसे यह असहास हो गया कि जब तक बहुजनों की राजनीतिक आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं की जाएगी, तब तक उन्हें बड़े पैमाने पर अपने साथ नहीं किया जा सकता है। इसके लिए बहुजन राजनीति के सबसे लोकप्रिय और व्यापक मांगों की पूर्ति जरूरी है, चाहे यह जितना भी प्रतीकात्मक क्यों न हो। बहुजन राजनीति की सबसे लोकप्रिय और व्यापक मांग रही है, बहुजन समाज के हाथ में राजनीतिक सत्ता। बहुजन विचारकों की नजर में बहुजनों की राजनीतिक सत्ता का चाहे जो अर्थ रहा हो, लेकिन ज्यादातर बहुजनों के लिए इसका अर्थ सीमित होकर इतना ही हो गया कि हमारे सामाज और हमारी जाति का व्यक्ति सत्ता के शीर्ष पद पर विराजमान हो। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री, सांसद विधायक बने और अन्य राजनीतिक पद प्राप्त करे।
आरएसएस-भाजपा को इस तथ्य का गहरे तौर पर अहसास हो गया था कि बहुजनों की इस सबसे लोकप्रिय और व्यापक मांग को पूरा किए बिना अब हिंदुत्व की राजनीति को और आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था और न ही भारत को हिंदू राष्ट्र बनाया जा सकता है। यह भाजपा की मजबूरी भी थी और उसकी जरूरत भी। बस उसे सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि बहुजन समाज से आए व्यक्तियों के हाथ में राजनीतिक सत्ता तो जाए, लेकिन वह हिंदुत्व की राजनीति का वाहक बने, न कि बहुजनों के लिए सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक न्याय का वाहक और वर्ण-जाति व्यवस्था के विनाश की वजह। बहुजनों की सबसे लोकप्रिय और व्यापक मांग को पूरा करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाते हुए भाजपा ने 2014 में अन्य पिछड़े वर्ग के नरेंद्र मोदी शीर्ष राजनीतिक पद ( प्रधानमंत्री) का दावेदार बनाकर और बाद में प्रधानमंत्री पद सौंपकर खुले तौर यह संकेत दिया कि वह ऐसी पार्टी है, जो बहुजनों के बीच किसी व्यक्ति को शीर्ष राजनीतिक पद सौंप सकती है।
दलित समाज के राम नाथ कोविंद को 2017 में राष्ट्रपति पद पर बैठाकर उसने यही संकेत दुहराया, विशेषकर बहुजनों के दलित हिस्से के संदर्भ में। बाद में यही काम मुर्मू राष्ट्रपति बनाकर किया। केंद्र में भाजपा के पूर्ण बहुमत के काल में ही भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे दोनों शीर्ष पद पर बहुजन समाज में पैदा हुए व्यक्ति बैठे। भाजपा इतिहास के अपने लंबे अनुभव से समझ गई थी कि अपरकॉस्ट के किसी व्यक्ति को सेनापति बनाकर हिंदुत्व की राजनीति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है और न ही हिंदू राष्ट्र की स्थापना की जा सकती है। हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए राजनीतिक बहुमत हासिल करना जरूरी है और यह काम बहुजनों को साथ लिए बिना नहीं किया सकता है।भाजपा ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पद के अलावा धीरे-धीरे केंद्रीय मंत्रिमंडल में बहुजनों को बड़ी संख्या में प्रतिनिधित्व दिया। इस समय केंद्रीय मंत्रिमंडल में 27 मंत्री ओबीसी समुदाय के हैं, उसमें भी 19 अति पिछड़ा से। 12 मंत्री अनुसूचित जाति (दलित समुदाय) और 8 मंत्री अनुसूचित जनजाति ( आदिवासी समुदाय)। पिछड़े-दलितों की अलग-अलग जातियों का भी विशेष तौर पर प्रतिनिधित्व दिया गया।
भारत के राजनीतिक इतिहास में शायद ही कभी बहुजनों को इतना राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला हो। अन्य राजनीतिक नियुक्तियों-मनोनयन में बहुजन समाज के लोगों के प्रतिनिधित्व का ध्यान रखा जाता है। भाजपा ने मान्यवर कांशीराम के बहुजन राजनीति की रणनीति और कार्यनीति के एक सूत्र को बखूबी अपने लिए इस्तेमाल किया। जिसका मूल सूत्र था कि बहुजन समाज की प्रतिनिधित्व से वंचित जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर बहुजन राजनीति को बहुमत में तब्दील करना। यह काम भाजपा ने दो तरह से किया। बहुजन समाज की प्रतिनिधित्व से वंचित या कम प्रतिनिधित्व प्राप्त जातियों के बीच के नेताओं को भाजपा में शामिल करके और दूसरा बहुजन समाज की विभिन्न जाति आधारित पार्टियों के साथ गठजोड़ करके। भाजपा ने बड़े पैमाने पर बहुजन समाज के नेताओं को अपनी पार्टी में जगह दी और उन्हें उनकी जातियों के राजनीतिक चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया। बहुजन समाज की पार्टियों से गठजोड़ करके उनके राजनीतिक आधार को इस्तेमाल करने का सबसे बेहतरीन उदाहरण भाजपा ने बिहार में प्रस्तुत किया।
जहां बहुजन राजनीति के बहुत सारे चेहरे (नीतिश कुमार, उपेंद्र कुशवाह, जीतन राम मांझी, मुकेश साहनी, जिन्हें अभी हाल में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था और पूर्व में रामविलास पासवान) आज बिहार में भाजपा के साथ सत्ता में हिस्सेदार हैं। कभी बहुजन राजनीति के बड़े चेहरे माने जाने वाले शरद यादव लंबे समय तक न केवल भाजपा के सहयोगी रहे, बल्कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के संयोजक भी थे। उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनावों में भाजपा अपनी उपरोक्त तीन रणनीतियों का इस्तेमाल किया। बहुजनों का हिंदुत्ववीकरण, बहुजनों की विभिन्न जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और बहुजनों के गरीब हिस्सों को लाभार्थी के रूप में उनसे अलग करना। मुसलमानों को प्रतिनिधित्व से बाहर रखा गया और यादवों को बहुत कम प्रतिनिधित्व दिया गया। हिंदी पट्टी में सवर्ण पूरी मजबूती के साथ भाजपा के साथ खड़ा है। बहुजनों (पिछड़े-दलितों) का हिंदुत्वीकरण करके, उनके बीच की विभिन्न जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर और उनके गरीब हिस्सों को लाभार्थी समूहों में बदलकर भाजपा हिंदी पट्टी में बहुमत का ऐसा गणित खड़ा कर रही है और काफी हद तक कर चुकी है, जिसे चुनौती देना नामुमकिन तो नहीं, लेकिन बहुत ही कठिन कार्य हो जाए, खासकर केंद्रीय सत्ता से मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को हटाने के संदर्भ में। ‘