नेपाल की सुशीला कार्की ( ब्राह्मण) पर छाती पीटने की जगह, हमारे देश पर एक ब्राह्मण संगठन(क्रस्स्) और उसके मुखिया ( मोहन भागवत) एक ब्राह्मण ने कब्जा कर लिया इसको लेकर ज्यादा बैचैन होने चाहिए। कैसे इससे मुक्ति मिले, इसके लिए जो कुछ किया जा सके करना चाहिए। आरएसस का गठन एक ब्राह्मण ने ब्राह्मणों का इस देश पर वर्चस्व बनाए रखने, नए सिरे कायम करने और ब्राह्मणवाद की रक्षा के लिए किया था। एक बाद एक उसके मुखिया ब्राह्मण होते रहे है, वर्तमान मुखिया भी एक ब्राह्मण (मोहन भागवत) ही है। हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि अगला मुखिया कोई गैर-ब्राह्मण हो जाए, जैसे तथाकथित पिछड़े के प्रधानमंत्री बनने, दलित के राष्ट्रपति या आदिवासी के राष्ट्रपति बनने से कोई फर्क नहीं पड़ा।
ब्राह्मणों के संगठन आरएसएस और उसके मुखिया ( मोहन भागवत) ने कैसे पूरे देश पर कब्जा कर लिया है, कब्जा ज्यादा वजनी शब्द लगे तो नियंत्रण कह लीजिए- राजनीतिक सत्ता पर कब्जा किसी को शक हो, लेकिन बहुत सारे लोगों इस पर कोई शक नहीं हैं कि भाजपा आरएसएस का एक आनुषांगिक संगठन है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न केवल उसके प्रचारक रहे हैं, बल्कि उसके एक कार्यकर्ता या ज्यादा सटीक कहना हो तो एक कठपुतली हैं। हां साथ में कार्पोरेट के भी कठपुतली हैं। आरएसएस-कार्पोरेट दोनों साथ मिलकर देश पर नियंत्रण या कब्जा कायम किए हैं। भारत की कार्यपालिका पर आरएसएस का कब्जा- कैबिनेट और मंत्रिमंडल भारत की सबसे बड़ी शक्तिशाली संस्था है। प्रधानमंत्री सहित मंत्रिमंडल के ज्यादात्तर सदस्य आरएसएस के कार्यकर्ता रहे हैं या उसके चरणों में लोटे बिना मंत्री नहीं बन सकते हैं, न मंत्री रह सकते हैं।
नौकरशाही ( स्थायी कार्यपालिका) पर कब्जा- नौकरशाही आरएसएस के लोगों के पूरी तरह नियंत्रण में या कब्जे में आ चुकी है। शीर्ष पदों पर वही लोग नियुक्त होते हैं, जो आरएसएस के पसंद हैं। आरएसएस के विचारों-एजेंडों के खिलाफ काम करने वाला कोई भी व्यक्ति नौकरशाही के शीर्ष पद नहीं बैठा रह सकता है यहां तक तक डीएम और पुलिस अधिकारी भी नहीं बन सकता या रह सकता है।
भारत की विधायिका पर कब्जा- संसद पर आरएसएस का पूरा नियंत्रण है। भाजपा के अधिकांश सांसद खुद को आरएसएस का स्वयं सेवक कहते हैं। जो स्वयं सेवक नहीं रहे हैं, उन्हें मोहन भागवत का आशीर्वाद जरूर मिलना चाहिए। .यों ही धारा-370 का खात्मा नहीं हुआ और न ही आनन-फानन में द्विज-सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण मिल गया। बहुत सारे उदाहरण। विधान सभाओं और मुख्यमंत्रियों के आरएसएस के रिश्ते जगजाहिर हैं। लोकसभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति ( उपराष्ट्रपति) तक घोषित तौर पर आरएसएस के सदस्य हैं। राष्ट्रपति तो उनकी इच्छा से बने ही।
संवैधानिक संस्थाएं- निर्वाचन आयोग, हाईकोर्ट-सुप्रीमकोर्ट, मीडिया तक पर आरएसएस ने कब्जा जमा लिया है। ईडी, सीबीआई आदि की बात ही छोड़ दीजिए।
उच्च शिक्षा-संस्थानों पर आरएसएस का कब्जा- उच्च शिक्षा संस्थानों में कौन कुलपति होगा, कौन प्रोफेसर नियुक्त होगा, कौन यूजीसी का चेयरमैन बनेगा, कौन पाठक्रम समिति में रहेगा और कौन इसका अध्यक्ष बनेगा, क्या पढ़ाया जाएगा और क्या नहीं पढ़ाया जाएगा। यह सबकुछ ब्राह्मणों संगठन आरएसएस और उसका मुखिया ब्राह्मण तय करता है। छात्र संगठन के नाम पर आरएसएस के आनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उच्च शिक्षा संस्थानों के परिसरों पर भी कब्जा जमा लिया है। परिसर में क्या होगा और क्या नहीं, अब वे तय करते हैं।
भारत की विदेश नीति तक- अब तो भारत की विदेश नीति पर आरएसएस के एजेंडे के आधार निर्धारित हो रही है। इजरायल से घनिष्ठ दोस्ती यों ही नहीं हुई। बांग्लादेश को दुश्मन यों ही नहीं घोषित किया गया, बात इतने तक नहीं है। भारतीय विदेश नीति को ब्राह्मण- हिंदू विदेश नीति बना दिया गया है।
सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर कब्जा- कौन क्या खायेगा, किस दिन खायेगा, किस शहर में क्या नहीं खाया जाएगा? जीवन की इस सबसे बुनियादी बात को भी आरएसएस और आनुषांगिक संगठन तय कर रहे हैं। कौन किससे शादी करेगा, कौन किससे प्रेम करेगा, इसके लिए बकायदा ब्राह्मण राष्ट्र के कानून मोदी युग में बन चुके हैं। कैसे पांच ब्राह्मण ब्राह्मणों के हिंदू राष्ट्र (द्विज राष्ट्) के स्वप्न को किसने पूरा किया? पाचं ब्राह्मण-सावरकर, मुजे, हेडगेवार, गोलवरकर, मोहन भागवत और गोड़से (छठां) हिंदू राष्ट्र के पिता चितपावन ब्राह्मण विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी किताब ‘हिंदुत्वÓ में हिंदू राष्ट्र के स्वप्न को परिभाषित किया और उसे पूरा करने के हिंदू महासभा ( सन् 1915) की स्थापना की।
सावरकर के स्वप्न को साकार रूप देने लिए बालकृष्ण शिवराम मुंजे (ब्राह्मण) के शिष्य केशव राव बलीराम हेडगेवार (ब्राह्मण) ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना ( 1925) की। हेडगेवार के स्वप्न को उसके शिष्य माधवराव सदाशिवराव गोलवरकर (ब्राह्मण) ने बुलंदियों पर पहुंचाया और अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉटÓ में हिंदू राष्ट्र के स्वप्न की सैद्धांतिकी प्रस्तुत करने के साथ व्यापक रणनीति एवं कार्यनीति भी प्रस्तुत किया। उसकी किताब हिंदू राष्ट्र के पैरोकारों की वेद, कुरान और बाईबिल बन गई। धीरे-धीरे ब्राह्मण संगठन आरएसएस देश धमनियों एवं शिराओं पर नियंत्रण करता गया 2014 में इतिहास को वह क्षण आया जब संघ ने कार्पोरेट जगत के साथ समझौता करके अपने आनुषांगिक संगठन भाजपा के माध्यम से लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया के तहत देश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ नियंत्रण कर लिया। इस बार भी बागडोर एक अन्य ब्राह्मण मोहनभागत के हाथ में रही,लेकिन पहली बार उसने अपना सेनापति किसी ब्राह्मण को बनाने की जगह पिछड़ी ( शास्त्रसम्मत तौर पर शूद्र) जाति के नरेंद्र मोदी को बनाया।
मोदी जी ने भारत को ब्राह्मण राष्ट्र- हिंदू राष्ट्र बनाने के चितपावन ब्राह्मणों के उस स्वप्न को पूरा कर दिखाया, जिसका सपना उन्होंने आज से करीब करीब 110 वर्ष पूर्व हिंदू महासभा ( 1915) के गठन के समय देखा था और जिसे साकार रूप देने के लिए करीब 100 वर्ष पूर्व आरएसएस का गठन किया गया था। इतिहास का दुर्योग देखिए ब्राह्मण राष्ट्र- हिंदू राष्ट्र के इस स्वप्न को जहां एक ओर व्यवहारिक रूप देने की जिम्मेदारी चितपावन ब्राह्मणों ने एक पिछड़ी जाति के व्यक्ति को सौंपी, वहीं उसे औपचारिक स्वीकृतियां ( राष्ट्रपति के रूप में) दलित ( ‘अछूतÓ) रामनाथ कोविंद और आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से दिलवाया।
शायद ही किसी को भ्रम हो कि हिंदू राष्ट्र का मतलब ब्राह्मण राष्ट्र है- 1- बहुजनों ( पिछड़ों-दलितों-आदिवासियों) पर ब्राह्मणों-द्विजों का वर्चस्व और नियंत्रण 2- महिलाओं पर पुरूषों का वर्चस्व और नियंत्रण 3- धार्मिक अल्पसंख्यकों ( मुसलमानों-ईसाईयों-पूर्व के दलित-पिछड़े अधिकांश) पर हिंदुओं का वर्चस्व और नियंत्रण 4- श्रम करने वालों पर परजीवीयों का वर्चस्व और नियंत्रण 5- उत्तर भारतीय आर्य-द्विज बर्बर संस्कृति का देश के अन्य हिस्सों पर वर्चस्व और नियंत्रण आरएसएस के जन्म, विकास और विस्तार का विश्लेषण करने वालों ने एक बुनियादी भूल जाने या अजनाने रूप में की। 1-पहली यह कि ब्राह्मणों द्वारा गठित, ब्राह्मणों द्वारा संचालित इस संगठन को हिंदू संगठन का नाम दिया या हिंदू संगठन कहा। 2-दूसरी भूल यह है कि आरएसएस के मुस्लिम-ईसाई विरोधी चरित्र को तो खूब उजागर किया, लेकिन उसके ब्राह्मणवादी और दलित-पिछड़े-आदिवासि और स्त्री विरोधी चरित्र को छोड़ दिया या बहुत कम रेखांकित किया। 3- तीसरी यह कि आरएसएस के मुख्य निशाने के रूप में सिर्फ मुस्लिम को देखा, जबकि उसका मुस्लिम से ज्यादा बड़ा निशाना ब्राह्मणवाद की रक्षा करना, वर्ण-व्यवस्था की बनाए रखकर ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को बनाए रखना था। हमें सुशीला कार्की-ब्राह्मण ( नेपाल की केयर टेकर प्रधानमंत्री) से ज्यादा ब्राह्मण संगठन आरएसएस और उसके आनुषांगिक संगठनों बारे में सोचना चाहिए। इनके वर्चस्व को कैसे तोड़ें इस पर विचार और काम करना चाहिए। नेपाली कार्की से निपट लेंगे। -साइबर नजर