फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) दिनांक 5 दिसंबर 2024 से शहर के जाने-माने समाजसेवी सतीश चौपड़ा बीके अस्पताल के बाहर अपने साथियों सहित धरने पर बैठे हैं। बीच में कुछ दिन उन्होंने भूख हड़ताल भी की थी जिसे सरकारी आश्वासन मिलने पर तोड़ दिया था। चोपड़ा जी सरकार से कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं मांग रहे हैं, वे केवल इतना चाहते हैं कि जि़ले के इस मुख्य अस्पताल को रेफर मुक्त किया जाए। सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट के लिए रे$फर किया जाना तो किसी हद तक समझ आ सकता है लेकिन साधारण डिलीवरी, ट्रामा केसेज व अन्य सेकेंडरी व प्राइमरी किस्म के मामलों को भी रेफर किया जाना समझ से बाहर है। विदित है कि इस जि़ला अस्पताल से आए दिन दर्जनों साधारण केस दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल को रेफर कर दिए जाते हैं। इसका लाभ उठाते हुए एम्बुलेंस ड्राइवर गरीब मरीजों को बहका-फुसला एवं डरा कर स्थानीय निजी व्यापारिक अस्पतालों में झोंक देते हैं। जाहिर है कि इससे जहां गरीब मरीजों का शोषण हो रहा है वहीं एम्बुलेंस चालक व अन्य दल्ले-दलाल अच्छी-खासी लूट कमाई कर रहे हैं। इसके पीछे मिलीभगत का आरोप तो बीके अस्पताल के ही कुछ डॉक्टरों व अन्य स्टा$फ पर भी लगाया जाता है।
जिला अस्पताल के डॉक्टरों व अधिकारियों से बात करने पर वे अपना बही-खाता पेश करते हुए गिनवा देते हैं कि दिन भर में उन्होंने इतना काम किया। ले-दे कर बात अस्पताल की अपर्याप्त बिल्डिंग व स्टाफ की भारी कमी पर आ कर ठहरती है। दरअसल शहर की बढ़ती जरूरतों के अनुसार न तो इस अस्पताल की बिल्डिंग का विस्तार किया गया और न ही डॉक्टरों व अन्य स्टा$फ के स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाई गई। पदों की संख्या बढ़ाना तो दूर, स्वीकृत पद ही आधे से अधिक खाली पड़े रहते हैं। जि़ले भर में जो प्राइमरी व सामुदायिक स्वास्थ केन्द्र तथा डिलीवरी हट इत्यादि खड़े कर रखे हैं उनमें भी स्टा$फ नाम मात्र का ही रहता है। इसके चलते इस जिला अस्पताल का कार्य-भार कई गुणा बढ़ जाता है।
नि:संदेह पीएमओ व सीएमओ भी अपने काम में भयंकर लापरवाहियां एवं मरीज विरोधी कार्यशैली अपनाते हैं, फिर भी इसके पीछे असल दोषी तो राज्य सरकार ही है। बीते 11 वर्षों से चल रही ट्रिपल इंजन की सरकार ने आश्वासनों के अलावा इस अस्पताल को कुछ नहीं दिया है। हां, बतौर स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने कई बार छापेमारी का नाटक जरूर इस अस्पताल में खेला। अस्पताल की जरूरतें पूरी करने की अपेक्षा वे समय-समय पर छापेमारी का नाटक जरूर करते रहे। इस नौटंकी में स्थानीय सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर, पूर्व विधायक सीमा त्रिखा, मौजूदा विधायक धनेश अदलखा, स्थानीय विधायक एवं कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल आदि सभी सत्तारूढ़ नेता समय-समय पर अस्पताल का दौरा करके सब कुछ ठीक-ठाक होने की बात कह कर निकल लेते हैं। सबसे अधिक बेशर्मी का प्रदर्शन करते हुए कृष्णपाल गूजर अस्पताल की मौजूदा स्थिति को 2014 से पहले की स्थिति से बहुत बेहतर बताते हैं।
सतीश चोपड़ा अपने किसी निजी स्वार्थ के लिए धरने पर नहीं बैठे हैं, वे जिस जनता के लिए यह बीड़ा उठाए खड़े हैं उसका व्यवहार भी मुर्दों सरीखा नजर आता है। बीके अस्पताल में प्रतिदिन लगभग 3500 लोगों का आना-जाना होता है। ये सभी लोग धरना-स्थल के सामने से होकर ही निकलते हैं। अस्पताल द्वारा अपनी हर तरह की ऐसी-तैसी कराने के बावजूद किसी के खून में भी उबाला नहीं आता। खून में उबाला तो जिंदा लोगों के ही आता है, मुर्दों का खून तो सूख चुका होता है। यही कारण है कि न तो स्थानीय प्रशासन इस धरने को गम्भीरता से ले रहा है और न ही राजनेता। उन्हें पूरा विश्वास है कि मुर्दों के इस शहर में कोई कितना ही जोर लगा ले पत्ता भी हिलने वाला नहीं है।