39 वेंटिलेटर बेकार : शर्म करो डबल इंजन सरकार कविता फऱीदाबाद। पांच लाख वाली आयुष्मान भारत और चिरायु योजना का शोर मचाने वाली मोदी-सैनी की डबल इंजन सरकारों में खांसी-जुकाम के कारण सांस लेने में दिक्कत महसूस कर रही गर्भवती महिला का इलाज भी नहीं किया गया। बीके अस्पताल में चल रही कमीशन के लिए रेफर करने वाली व्यवस्था के कारण गर्भवती की जान चली गई। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के गुणगान करने वाले केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर, विधायक धनेश अदलखा बीके की अव्यवस्थाओं का सुधारने के बजाय निर्लज्जता के साथ चुप्पी साधे हुए हैं।
शहर के समाजसेवी सतीश चोपड़ा और अनशनकारी बाबा रामकेवल बीते 53 दिनों से रेफर मुक्त फरीदाबाद मुहिम के तहत बीके अस्पताल के सामने धरने पर बैठे हैं। धरने में बीके अस्पताल से रेफर किए जाने के भुक्तभोगी भी शामिल हो रहे हैं। ऐसे ही भुक्तभोगी भाकरी गांव निवासी भरत लाल है जिनकी गर्भवती बहू सोनिया और गर्भस्थ शिशु की बीके अस्पताल में पर्याप्त इलाज नहीं मिलने से मौत हो गई थी। भरत लाल ने बताया कि सोनिया करीब आठ माह की गर्भवती थी। 16 दिसंबर 2024 को बीके अस्पताल में जांच और अल्ट्रासाउंड कराया जिसमें गर्भस्थ शिशु का स्वस्थ होना बताया गया था। दिसंबर के अंतिम दिनों में सोनिया को खांसी आने लगी, जिसकी दवा चल रही थी। 2 जनवरी 2025 को सोनिया की खांसी बहुत ज्यादा बढ़ गई और सांस लेने में दिक्कत हुई तो उसे लेकर वह और बेटा संदीप बीके अस्पताल पहुंचे।
आरोप है कि ओपीडी में मौजूद डॉक्टर ने जांच करने के बाद एक इंजेक्शन लगाया और सोनिया को दिल्ली रेफर कर दिया। उन्होंने सफदरजंग दिल्ली ले जाने में असमर्थता जताई और बीके में भर्ती कर इलाज करने की गुहार लगाई लेकिन डॉक्टर ने एक न सुनी। उन्होंने विरोध किया तो डॉक्टर ने बीेके स्थित पुलिस चौकी पर फोन कर पुलिस बुला ली। पुलिसवालों ने भी डॉक्टर का पक्ष लेकर उन्हें जबरन अस्पताल से जाने को मजबूर किया। मज़दूरी करने वाले भरत लाल ने किसी तरह उधार आदि लेकर बहू सोनिया को चिमनीबाई धर्मशाला के पास स्थित प्राची नर्सिंग होम में देर शाम भर्ती कराया। वहां डॉक्टरों ने सोनिया को वेंटिलेटर पर लिटा दिया और रात में कुछ खास इलाज नहीं किया। सुबह जांच के बाद बताया कि गर्भस्थ शिशु की मृत्यु होने के कारण सोनिया के शरीर में इन्फेक्शन फैल गया है। इलाज के लिए बहुत मोटी रकम की मांग की गई, वह पैसों का इंतजाम करते इससे पहले ही सोनिया की सांसें थम गईं।
सोनिया की जान बीके अस्पताल की खराब व्यवस्था और लापरवाह डॉक्टर के निकम्मेपन के कारण गई। बीके अस्पताल में हाई रिस्क प्रेग्नेंसी यूनिट (एचआरपीयू) होने का ढिंढोरा पीटा जाता है, और डिलीवरी वार्ड में पर्याप्त चिकित्सक होने का भी दावा किया जाता है। यदि ऐसा है तो सोनिया को भर्ती किया जाता और ऑपरेशन कर मृत गर्भस्थ शिशु को बाहर कर जच्चा की जान बचाई जा सकती थी, लेकिन कौन इस पचड़े में पड़े, दिल्ली रेफर करो और छुटकारा पाओ। बाकी काम तो 108 एंबुलेंस वाले कमीशनखोर चालक-ईएमटी मरीज को निजी अस्पताल पहुुंचा कर कर ही लेंगे। सवाल यह उठता है कि इस तरह के मामूली मामलोंं में जो इलाज दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल हो सकता है वह बीके में क्यों नहीं दिया जा सकता।
कबाड़ हो गए घटिया वेंटिलेटर, मरीजों को कभी नहीं मिला फायदा कोरोना महामारी के समय बीके अस्पताल को सीएसआर के तहत 39 वेंटिलेटर मिले थे। गुजराती कंपनी द्वारा निर्मित ये वेंटिलेटर भी मोदी-खट्टर के जुमलों की तरह एक दिन भी नहीं चल पाए और आज कबाड़ खाने की शोभा बढ़ा रहे हैं। सफलताओं का श्रेय लेने को हमेशा आतुर रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अक्तूबर 2021 को वर्चुअल माध्यम से बीके अस्पताल में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का उद्घाटन किया था, इसके बाद न तो प्रधानमंत्री, न सीएम और न ही स्वास्थ्य मंत्री ने इसकी सुध ली। चालू होने के कुछ दिन बाद तक रोता-पीटता चला फिर उसके बाद बंद हो गया जो आज तक नहीं चलाया गया।
यदि ये वेंटिलेटर सही होते तो सोनिया ही नहीं उसके जैसे सैकड़ों अन्य मरीजों को बीके में ही यह सुविधा हासिल होती, कंसंट्रेटर के सही होने पर अस्पताल की बाहर से खरीदी जाने वाली ऑक्सीजन पर निर्भरता भी काफी कम होती लेकिन इन्हें चलाने के लिए स्टाफ की जरूरत है जो खट्टर-सैनी सरकार उपलब्ध नहीं करा पाई। कमीशनखोर डॉक्टरों, 108 एंबुलेंस चालकों को संरक्षण देने वाले पीएमओ-सीएमओ भी शायद यही चाहते हैं कि वेंटिलेटर और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर नहीं चलाए जाएं, यदि ये चलेंगे तो निकम्मे डॉक्टरों को काम करना पड़ेगा और मरीजों को रेफर नहीं कर पाने से मोटा कमीशन भी मारा जाएगा।
मंत्री-विधायकों की आंखों पर चढ़ा है झूठ का चश्मा देखा जाए तो डॉक्टर भी पूरी तरह से दोषी नहीं हैं, बीके अस्पताल जिसकी रोजाना की ओपीडी ही दो हजार के आसपास है, जानकारोंं के अनुसार यहां कम से कम 80-100 डॉक्टर होने चाहिए लेकिन सरकार ने अभी तक पद नहीं बढ़ाए हैं। दो दशक पहले जो 55 पद स्वीकृत थे वह भी आज तक पूरे नहीं भरे गए हैं। वर्तमान में 42 डॉक्टर ही हैं जिनमें से 5 प्रशासनिक कार्य में लगे हैं, मरीज की जांच-इलाज में कोई सहयोग नहीं करते। यानी 55 डॉक्टरों का काम 37 डॉक्टरों को करना पड़ रहा है। इनमें भी साइकियाट्रिस्ट, पेट रोग, हृदय रोग के डॉक्टर नहीं हैं जनरल फिजिशियन की भी भारी कमी है। सिर्फ डॉक्टर ही नहीं कम हैं करीब दस प्रतिशत नर्सें के पद खाली हैं तो सोनोग्राफर के पद खाली होने के कारण सप्ताह में तीन दिन ही अल्ट्रासाउंड होता है। पैरा मेडिकल सपोर्ट न होने के कारण डॉक्टर मरीज को रेफर करने को मजबूर होते हैं।
केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर हों या विधायक धनेश अदलखा, स्वास्थ्य मंत्री आरती राव, या सीएम नायब सैनी सब स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की अनदेखी कर जनता को सरकार की उपलब्धियों की झूठी गाथाएं सुना कर वरगलाते रहे हैं। विधायक धनेश अदलखा कहते हैं कि रेफर मुक्त फरीदाबाद अभियान चलाने वाले उन्हें बीस मिनट का समय दे दें तो वह बीके को इस समस्या से मुक्त करा देंगे। ये लोग बीते 53 दिनों से बीके के पास आसमान के नीचे बैठे हैं, यदि अदलखा इतने ही सच्चे हैं तो खुद जाकर बीस मिनट नहीं दो-तीन घंटे उनके साथ बैठें और समस्या का समाधान कराएं, लेकिन समाधान कराने से कहीं आसान गोदी और चाटुकार मीडिया में बयान जारी कर वाहवाही लूटना होता है जो अदलखा ही नहीं सारे भाजपाई कर रहे हैं। कृष्णपाल गूजर 2014 से पहले बीके की दुर्दशा की बात करते हैं उनके साढ़े दस साल के कार्यकाल में भी तो बीके की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ है। जनता ने इसीलिए तो कांग्रेस को हटा कर आपकी डबल इंजन सरकारों को चुना था, आपने भी सुधार नहीं किया तो जनता आपको भी गद्दी से उतार देगी।
संदर्भवश बताते चलें कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 में हरियाणा के प्रत्येक जिला अस्पताल को अपग्रेड करने की योजना लाई थी। इसके तहत केंद्र सरकार अस्पताल में 35 करोड़ खर्च कर इमारत व सभी आवश्यक आधुनिक उपकरणों की स्थापना करती और स्टाफ तैनात करती। आधुनिक चिकित्सा सेवाओं से लैस ऐसे अस्पतालों के संचालन, स्टाफ आदि का खर्च तीन साल तक केंद्र सरकार उठाती और इसके बाद राज्य सरकार को हवाले कर दिए जाते। राज्य के 11 जिला अस्पतालों ने केंद्र सरकार की स्कीम का लाभ उठाया लेकिन इस दौरान समय-समय पर तैनात रहे फरीदाबाद के निकम्मे सीएमओ और बीके के पीएमओ ने कोई रुचि नहीं ली, इन्होंने इस संबंध में कोई प्रस्ताव नहीं भेजा नतीजतन जिले की जनता कुछ बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह गई। इसके विपरीत जिन 11 जिलों ने प्रस्ताव भेजे थे उनको मंजूरी मिल गई। केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर, विधायक सीमा त्रिखा और ने भी इस स्कीम में कोई रुचि नहीं ली । बीके अस्पताल से रोजाना सैकड़ों मरीज रेफर किए जाएं या इलाज के अभाव में मरीज मरते रहें, नेताओं की सेहत पर कोई असर नहीं पडऩे वाला।