अश्वनी कुमार सुकरात AQI हज़ार सही, साँसों पे भार सही, इस शहर की गिरफ्त में जो राही, क्या निकल पाएगा?
हवा ज़हर, साँस कजऱ्—जि़ंदगी एक इल्तिज़ा, अब हुई इस शहर-ए-धुएँ से भला कौन, अब निजात पाएगा?
आब-ओ-हवा समूम हुई, जीना भी इम्तिहान हुआ, लबादा बदल भी ले तो क्या—ज़हर कैसे हल पाएगा?
इस शहर ने कैद किया मुझ रहगुज़र को यूँ, अपने ही कदमों के घेरे को भला कौन खोल पाएगा?
इस शहर-ए-जेल में थम-सा गया हर काफिला-नशीं, चाहकर कौन भला, अब इस शहर से भाग पाएगा?
ये धुआँ जो शहर की नस-नस में ज़हर-सा भर गया, इस ज़हर की आँच में जलकर भला, क्या जिस्म बच पाएगा?
इस शहर की कैद में फंसे, हम सब काफिला -ए-मआश, इस $कैदख़ाने का नक्शा भला कौन, अब बदल पाएगा?
‘सुकरात’ कहता है—बस साँस बचा लेना काफी नहीं, जड़ में जो ज़ुल्म का निज़ाम है, तो क्या वह बदल पाएगा?