मज़दूर मोर्चा ब्यूरो लोकसभा चुनावों में बहुमत न मिलने के बावजूद नरेन्द्र मोदी ने येन-केन-प्रकारेण प्रधानमंत्री का पद हथिया लिया है। प्रारंभिक दौर में चर्चा यह थी कि यदि भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो एनडीए के घटक दल तभी भाजपा को समर्थन देंगे जब वह मोदी के बदले किसी अन्य को अपने संसदीय दल का नेता चुनें। लेकिन शातिर दिमाग मोदी ने भाजपा संसदीय दल की बैठक बुला कर नेता चुने जाने की कवायद को खत्म करते हुए सीधे एनडीए की बैठक में अपना चुनाव करा लिया। घटक दलों की दूसरी मांग थी कि गृह मंत्रालय तथा वित्त मंत्रालय के अलावा लोकसभा अध्यक्ष का पद उन्हें दिया जाए।
थोड़ा नरम पड़ते हुए घटक दलों ने यहां तक भी स्वीकार कर लिया कि गृह मंत्रालय उन्हें नहीं तो कम से कम अमितशाह को न दिया जाए। शपथग्रहण से पूर्व की तस्वीरों में अमितशाह को मोदी के बगल में न बैठा कर तीसरे-चौथे नम्बर पर बैठाया गया था। लेकिन शपथग्रहण होते ही अमितशाह न केवल मोदी के बगल में बैठने लगे बल्कि गृह मंत्रालय भी उन्हें मिल गया। इसी तरह दूसरा बड़ा वित्त मंत्रालय भी घटक दलों को मिलने के बजाय निर्मला सीतारमण को मिला। इसके अलावा तमाम बड़े मंत्रालय पूर्व मंत्रियों के पास ज्यों के त्यों रहने दिये गये। रही बात लोकसभा अध्यक्ष की तो वह भी मोदी जी अपने हाथ से जाने नहीं दे रहे।
सर्वविदित है कि मोदी विरोधियों, चाहे वे विधायक हों, सांसद हों अथवा किसी राज्य के मुख्यमंत्री हों, उन्हें अनिश्चतकाल के लिये जेल में बंद करने के लिये अमितशाह व निर्मला सीतारमण द्वारा जिस सीबीआई, एनआईए, ईडी व इनकम टैक्स विभाग का इस्तेमाल किया जाता है वे दोनों मंत्रालय मोदी ने अपने कब्जे में रख लिये हैं। जिस ‘ऑपरेशन कमल’ के द्वारा विरोधी राजनीतिक दलों को तोड़ा जाता है वह लोकसभा अध्यक्ष की मिलीभगत के बगैर सम्भव नहीं। सुधी पाठक समझ गए होंगे कि घटक दलों द्वारा गृह तथा वित्त मंत्रालय के साथ-साथ लोकसभा अध्यक्ष पद की मांग क्यों रखी गई थी। यह भी जरूर समझ गये होंगे कि मोदी ने ये तीनों पद क्यों अपने हाथ में रखे हैं। नीयत का खोट तो साफ नज़र आ रहा है। गुजराती रंगा-बिल्ला की जोड़ी अपने जाल में फंसे घटक दलों का जिस दक्षता से सफाया करेगी, कोई सोच भी नहीं सकता। सबसे बड़े घटक दल टीडीपी (तेलगु देशम पार्टी) के नेता चन्द्र बाबू नायडू के साथ शह-मात का खेल खेलते हुए लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए उनके सामने उनकी साली डी. पुरंदेश्वरी जो कि भाजपा सांसद हैं, को खड़ा करने की योजना बना ली है। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि चन्द्र बाबू नायडू पहले भी बतौर एनडीए घटक मोदी के साथ रह चुके हैं लेकिन मतभेदों के चलते वे अलग हो गये थे। इतना ही नहीं 9 सितम्बर 2023 को मोदी ने इन्हें परिवार सहित जेल यात्रा भी करा दी थी। उस समय नायडू आंसुओं से रोए थे। इसके बावजूद वे फिर से मोदी के जाल में जा फंसे।
शपथ लेने से कई दिन पूर्व ही मोदी ने अपनी सरकार का आगामी 100 दिन का कार्यक्रम घोषित कर दिया था, अजब-गजब बात है कि सरकार बनने से पहले ही आगामी 100 दिन के प्रोग्राम घोषित कर दिए गए। मंत्रालय बांटते वक्त भी मोदी ने कहा कि उनकी सरकार द्वारा शुरू किये गये अधूरे कामों को 100 दिन में पूरा करने के लिये जरूरी है कि मंत्रालयों में वही पुराने मंत्री रहें। समझने वाली बात यह है कि यदि उनके द्वारा किये जा रहे काम इतने ही बढिय़ा थे तो जनता ने उन्हें बहुमत क्यों नहीं दिया? जनता का संदेश सा$फ है कि उनके तमाम जनविरोधी कामों को न केवल रोक दिया जाए बल्कि पलट भी दिया जाए, लेकिन इस मुद्दे पर घटक दलों के मुंह में दही जमी रही।
संविधान में विश्वास रखने वाले आम नागरिकों की धारणा है कि जब लोकसभा में मोदी को बहुमत ही नहीं मिलेगा तो वे कैसे अपनी सरकार को चला पाएंगे? ऐसे लोगों का मानना है कि सरकार तुरन्त गिर जाएगी। लेकिन मोदी-शाह इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं जो एक बार हाथ आई सत्ता को 30-40 सांसदों के पलट जाने पर गिरने दें।
भूलना नहीं चाहिये कि सन 2001 में रसातल में जा चुकी गुजरात भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाने के लिये जो लोग हज़ारों निर्दोष नागरिकों का खून बहा सकते हैं; सन 2019 में सत्ता हाथ से फिसलती देख पुलवामा काण्ड करवा सकते हैं तो अब आवश्यकता पडऩे पर कुछ भी करने से उन्हें कौन रोक सकता है? ‘देशहित’ के नाम पर एमरजेंसी लगाने का उदाहरण इस देश में पहले से ही मौजूद है।