फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) यमुना नदी के डूब क्षेत्र में बसे बसंतपुर, इस्माइलपुर, शिव एंक्लेव पार्ट-3 आदि में हाल ही में प्रशासन ने मुनादी करवा कर लोगों से मकान खाली करने को कहा। यमुना का पानी बढऩे पर दो सौ से अधिक मकान पूरी तरह डूब गए। काफी मकानों में पानी भर चुका है यानी फिलहाल उनमेंं नहीं रहा जा सकता। प्रशासन के अनुसार दो हजार से अधिक लोग यानी करीब पांच सौ परिवारों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया है। प्रशासन के राहत कार्य देख कर लोग वाहवाही कर रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इसी प्रशासन के निकम्मेपन के कारण आज ये हालात हैं। अवैध निर्माण को रोकने के लिए डिस्ट्रक्ट टाउन प्लानिंग महकमा है। राजस्व विभाग है जिसका काम ही जमीनों को रिकॉर्ड रखना है, यमुना के डूब क्षेत्र में आने वाले इलाके में कोई निर्माण नहीं होने देने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन के साथ ही इन दोनों महकमों की भी है। कहीं भी निर्माण को सूंघते हुए पहुंचने वाले डीटीपी महकमे को यमुना के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में आने वाली जमीन पर होने वाले निर्माण दिखाई ही नहीं दिए। डीटीपी की मौजूदगी के बावजूद आज भी इस इलाके में यमुना के डूब क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए धड़ल्ले से अवैध प्लॉटिंग व अवैध कॉलोनाइजिंग हो रही है।
ऐसा नहीं है कि डीटीपी को यह सब नजर नहीं आता लेकिन भू माफिया, जो अधिकतर केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर के पालतू चेले हैं, से चुग्गा पानी लेने के बाद आंख बंद कर ली जाती हैं। जानकार कहते हैं कि जब भी यहां कोई नई कॉलोनी काटी जाती है डीटीपी का अमला एक बार आकर तोडफ़ोड़ करता है, इसके बाद प्लॉटिंग और निर्माण कार्य बेधड़क और तेजी से होने लगता है। यहां तक कि चंद महीनों में ही सारे प्लॉटों में घर-दुकानें बना डाली जाती हैं, डीटीपी टीम दोबारा नहीं आती। दरअसल, तोडफ़ोड़ ही इसलिए की जाती है कि इस प्लॉटिंग का हिसाब किताब नहीं हुआ है, बिल्डर चढ़ावा चढ़ा देता है और उसे खुली छूट मिल जाती है। कई बिल्डर तो पहले ही भेंट-नजराने की औपचारिकता पूरी कर लेते हैं, तो उनके द्वारा की जा रही प्लॉटिंग में कोई आता ही नहीं। डीटीपी साहब छोटी मोटी तोडफ़ोड़ कर कार्रवाई का अपना रिकॉर्ड पक्का कर लेते हैं और निर्माण भी हो जाता है।
अवैध रूप से काटे गए इन प्लॉटों की रजिस्ट्री राजस्व विभाग को नहीं करनी चाहिए लेकिन बकौल बडख़ल विधायक धनेश अदलखा उन्हें मालूम है कि कैसे जमीनों का सीएलयू कराने वाले, सब डिवीजन कराने वाले और तहसीलों में रजिस्ट्री करवाने वाले गैंग सक्रिय हैं। खुद भाजपा का विधायक बता रहा है कि उसकी पार्टी के राज में भ्रष्टाचार किस हद तक व्याप्त है तो समझा जा सकता है कि यमुना के डूब क्षेत्र में बसाई जाने वाली बस्तियों की रजिस्ट्री कैसे हो गई। तहसीलों में भ्रष्ट पटवारियों के होते पैसा फेको तमाशा देखो की तर्ज पर कोई भी काम नामुमकिन नहीं है। खुद सैनी सरकार ने गोपनीय तरीके से प्रदेश के भ्रष्ट पटवारियों की पहचान करवाई थी।
हालांकि करीब चार सौ भ्रष्ट पटवारियों, उनके दल्लों और रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार करने के तरीकों सहित अनेक महत्वपूर्ण जानकारियों वाली यह सूची सार्वजनिक होने के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई थी लेकिन जब सरकार के पालतू रिश्वतखोरों ने आंखें तरेरीं तो सीएम सैनी ने एकदम पल्टी मारी और अपने लाडले रिश्वतखोरों की पोल खोलने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की धमकी तक दे डाली। तहसीलों में हर काम के लिए रिश्वत का लेन देन शिष्टाचार बन चुका है। जानकार बताते हैं कि क्योंकि प्रत्येक कार्य की रिश्वत के रेट और ऊपर तक पहुंचाया जाने वाला हिस्सा तय है। ऐसे में यदि कोई काम बिना रिश्वत के किया जाता है तो हिस्सा नहीं मिलने के कारण साहब फाइल पर अपनी चिडिय़ा नहीं बैठाते।
इन हालात में डूब क्षेत्र तो क्या यमुना नदी के बहाव क्षेत्र की भी रजिस्ट्री हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जानकार बताते हैं कि डूब क्षेत्र में जमीन खरीदने वाले अधिकतर गरीब दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी खींचने वाले, रिक्शा चालक आदि निम्न आय वर्ग वाले लोग होते हैं, इनमें से अधिकतर दिल्ली में काम करते हैं लेकिन सस्ता होने के लिए यहां आकर बसे हैं। भूमाफिया भी सरकारी जमीन पर कब्जा प्लॉटिंग करने के बाद मोटी कमाई कर चलते बनते हैं, समस्याएं खरीदने वाला भुगते। प्रशासनिक जानकार कहते हैं कि इस तरह की बस्तियां प्रशासन जानबूझ कर बनने देता है क्योंकि यह उसकी स्थायी कमाई का जरिया बन जाती है। यमुना में लगभग हर साल या दूसरे साल बाढ़ आती है। बाढ़ आते ही प्रशासन राहत एवं बचाव का पाखंड शुरू कर देता है। नौ की लकड़ी नब्बे खर्च की तर्ज पर राहत एवं बचाव कार्य का मोटा बिल फाड़ा जाता है जिसकी बंदरबांट ऊपर तक होती है।
रेड क्रॉस सोसायटी के एक जानकार ने बताया कि समाजसेवी संस्थाओं से भोजन सामग्री बंटवाई जाती है और खर्च प्रशासन का दिखाया जाता है। इसी तरह आटा, चावल, दाल, नमक, तेल के पैकेट में खेल होता है, पहले तो वजन का यानी रिकॉर्ड में बीस किलोग्राम का पैकेट और दो लीटर तेल दिखाया जाता है, बांटा आधा ही जाता है। दूसरा संख्या, रिकॉर्ड में पांच हजार पैकेट बांटे बताए जाते हैं जबकि वास्तव में चंद सैकड़ा या एक दो हजार ही बांटे जाते हैं। यानी यमुना नदी में बाढ़ भले ही वहां पर बसे गरीबों और उनकी बस्ती के लिए तबाही लाती है लेकिन प्रशासन के खाऊ अधिकारियों के लिए यह आपदा में अवसर होता है, भ्रष्टाचार और लूट कमाई का।