फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बिना प्रायोगिक शिक्षा के फर्जी डॉक्टर तैयार करने वाले (बिना मरीजों को देखे बनने वाले डॉक्टरों का फर्जी ही कहा जाता है) छांयसा अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज में पचास बेड का क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल खोलने की कवायद की जा रही है।
लोक निर्माण विभाग के कार्यकारी अभियंता प्रकाश लाल के मुताबिक 11 करोड़ 58 लाख रुपये लागत वाले क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक के निर्माण के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की गई है। यह ब्लॉक 21 महीने में बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। समझने वाली बात यह है कि इस मेडिकल कॉलेज में तो पर्याप्त इमारतें हैं जो बिना इस्तेमाल के खंडहर हो रही हैं, इनका इस्तेमाल भी क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल के लिए किया जा सकता है। ऐसे में नई बिल्डिंग बनाने पर साढ़े ग्यारह करोड़ रुपये खर्च करने की बात गले नहीं उतरती। बिल्डिंग बनाने के नाम पर यह रकम कौने से खाते में जाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।
स्वास्थ्य बजट में लगातार कटौती करने वाली डबल इंजन सरकार की हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा जुमला ही साबित होगी। रही बात छांयसा मेडिकल कॉलेज की तो यहां फैकल्टी, पैरा मेडिकल स्टाफ, चिकित्सा और चिकित्सा उपकरण की कमी के कारण ओपीडी में ही बमुश्किल सौ-सवा सौ मरीज आते हैं। अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब यहां से कुत्ते और सांप काटे के मरीजों को बीके रेफर कर दिया जाता था, हालात अब भी बदले नहीं हैं, तो समझा जा सकता है कि इमरजेंसी चिकित्सा सेवाएं कैसी होंगी। ऑपरेशन थियेटर तक बेकार पड़े हैं, प्रसव तक की व्यवस्था नहीं है, किसी तरह आईपीडी चलाई जा रही है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में शायद ही कोई मरीज भरती होने आता हो। अस्पताल की केवल इमारत है, सभी विषय पढ़ाने के लिए जरूरी 74 फैकल्टी की जगह 15-20 से काम चलाया जा रहा है। कई महत्वपूर्ण विषय पढ़ाने की विशेषज्ञ फैकल्टी ही नहीं है।
सबसे बड़ी बात यहां पढ़ रहे छात्रों को एनॉटामी यानी शरीर रचना विज्ञान, हिस्टोलॉजी (ऊतक विज्ञान) पढऩे समझने के लिए मृत मानव शरीर यानी कैडवर तक उपलब्ध नहीं है। यानी छात्रों को केवल किताबी ज्ञान दिया जा रहा है। इन्हीं सब कारणों से नेशनल मेडिकल कमीशन तीन बार लगातार इस मेडिकल कॉलेज की मान्यता देने से इनकार कर चुका है लेकिन डबल इंजन सरकारों का फायदा उठाते हुए कभी खट्टर तो कभी सैनी केंंद्र सरकार के बल पर अस्थायी मान्यता बढ़वा कर इस मेडिकल कॉलेज को धकेल कर चला रहे हैं। ऐसे में अगर यहां क्रिटिकल केयर अस्पताल बना भी दिया गया तो उसका भी यही हाल होने वाला है। केवल इमारत बनाने से क्रिटिकल केयर चालू नहीं हो जाएगा, उसके लिए जरूरी स्टाफ, संसाधन, उपकरण भी होने चाहिए और सबसे बढ़ कर मरीज। जिस मेडिकल कॉलेज में आईपीडी में पांच मरीज भी न भरती हों वहां कौन मरीज इलाज कराने आएगा।
क्रिटिकल केयर अस्पताल बनाने से ज्यादा जरूरी यहां पहले से बने हुए ऑपरेशन थियेटर, आईपीडी को चलाया जाना है। क्रिटिकल केयर तो बाद की बात है पहले यहां माइनर ऑपरेशन, सर्जरी, सामान्य और सीजेरियन प्रसव जैसी आधारभूत चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं, इससे आईपीडी में मरीज बढ़ेंगे। फिलहाल तो आईपीडी में पांच-छह मरीज ही रहते हैं तो फिर पचास बेड के क्रिटिकल केयर अस्पताल में कितने मरीज भरती होने आएंगे समझा जा सकता है।