फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मेड इन इंडिया का ढिंढोरा पीटने वाले मोदी-खट्टर की चहेती चाइनीज इकोग्रीन कंपनी ने कूड़े से बिजली बनाने के नाम पर फरीदाबाद और गुडग़ांव नगर निगमों को खूब लूटा और अब अनुबंध समाप्त होने के बाद भी सरकारी संसाधनों को कबाड़ में बेच कर मोटी कमाई कर रही है। सत्ता की जी हुजूरी में लगीं निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ईकोग्रीन की इस लूट की जानकारी होने के बावजूद अनजान बनने का नाटक कर रही हैं। जिस कंपनी से रिकवरी होनी थी, अनुबंध समाप्त होने के महीनों बाद भी उसको निगम की अचल संपत्ति के इस्तेमाल और संसाधनों को कबाड़ में बेचने की छूट दी गई है। इसका फायदा उठा कर कंपनी करोड़ों की मशीन, हाइवा आदि गैस कटर से काट कर कबाड़ में बेचने में जुटी है।
देश को आजादी दिलाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की अहमियत घटाने के लिए उनकी जयंती पर किसी अभियान का ढिंढोरा पीटने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में गांधी जयंती पर स्वच्छ भारत मिशन खूब जोर शोर से शुरू किया था। अतिउत्साहित प्रधानमंत्री ने चाइनीज कंपनी ईकोग्रीन को फरीदाबाद और गुडग़ांव नगर निगम क्षेत्र में कचरा प्रबंधन का जिम्मा सौंपा था। खूब शोर मचाया गया कि कंपनी शहरों से निकलने वाले कचरे से बिजली और खाद बनाएगी। 2017 से पहले नागरिकों को जिस कचरे के लिए कोई शुल्क नहीं देना होता था लेकिन मोदी-खट्टर की ईकोग्रीन कंपनी हर घर से कचरा उठाने की फीस वसूल करने लगी। यही नहीं नगर निगमोंं की ओर से कंपनी को खत्तों से बंधवाड़ी तक कचरा पहुंचाने के लिए एक हजार रुपये प्रति टन की दर से भुगतान करना शुरू कर दिया था। कचरे से बिजली बनाने की सरकार द्वारा तय की गई डेड लाइन बार बार समाप्त होतीं रहीं लेकिन कंपनी का प्लांट नहीं लग सका, बावजूद इसके कंपनी को लंबे समय तक पूरा भुगतान होता रहा।
क्योंकि कंपनी का प्रबंधन खट्टर के संघी साथी अग्रवाल परिवार के हाथ था तो निगम अधिकारियों ने भी उस पर खूब मेहरबानी की। कूड़ा कलेक्शन से लेकर खत्तों और बंधवाड़ी तक पहुंचाने के लिए माल वाहक वाहन, मशीन, डंपर, हाईवा आदि कंपनी को ही लगाना था लेकिन निगम अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर ट्रैक्टर-ट्राली, डंपर, जेसीबी, हाइवा, मिनी ट्रक आदि कंपनी को दिए। हालांकि विरोध होने पर बहुत से छोटे वाहन तो वापस लिए गए लेकिन अधिकारियों की मेहरबानी से डंपर, हाईवा, जेसीबी कंपनी से नहीं लिए गए। निगम के संसाधन कंपनी को दिए जाने के प्रश्न पर अधिकारियों का बहाना होता कि शहर में गंदगी के ढेर न लगें इसलिए कंपनी का सहयोग किया जाता है।
निवर्तमान शहरी स्थानीय निकाय मंत्री सुभाष सुधा ने जून 2024 को ईकोग्रीन कंपनी का अनुबंध समाप्त कर दिया। अनुबंध समाप्त हुए लगभग ढाई महीने हो चुके हैं लेकिन नगर निगम के अधिकारियों ने ईकोग्रीन कंपनी को दिए गए उपकरण, सामान का हिसाब कर वापस मांगा है और न ही डबुआ कॉलोनी में निगम की बेशकीमती जमीन पर कंपनी को मुफ़्त में दिया गया यार्ड ही खाली करवाया गया है। अब कंपनी जाने से पहले यार्ड में पड़ा सामान, धातुएं आदि कबाड़ में बेचने की तैयारी कर रही है, इस सामान में नगर निगम के निकम्मे अधिकारियों द्वारा कंपनी की सेवा में दिए गए डंपर, कंटेनर, ट्रॉली, हाइवा आदि करोड़ों रुपये कीमत के उपकरण व मशीनें भी शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार कंपनी प्रबंधन ने कई गैस कटर किट मंगा ली हैं। निगम की मिल्कियत वाले इन उपकरणों को काट कर कबाड़ में बेच कर कंपनी जाते जाते भी निगम को करोड़ों का फटका लगाने जा रही है।
क्योंकि कंपनी का प्रबंधन खट्टर के चहेते अग्रवाल परिवार के हाथ में था तो निगम के अधिकारी भी आंख बंद कर कंपनी को भुगतान कर रहे थे। अनुबंध समाप्त होने के बाद जब हिसाब लगाया गया तो ईकोग्रीन पर निगम की कई करोड़ रुपयों की रिकवरी निकली। सुधी पाठकों को बताते चलें कि अक्तूबर 2023 में जब प्रदूषण चरम स्तर पर था और शहर में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान ग्रेप लागू था तब ईकोग्रीन कंपनी के कर्मचारियों ने कचरा उठाना बंद कर दिया था। इस पर एनजीटी ने नगर निगम पर 3 करोड़ 24 लाख 34 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था, तब नगर निगम ने जवाब दिया था कि यह रकम ईकोग्रीन से वसूली जानी चाहिए, लेकिन इसका भुगतान खट्टर-सैनी की सरकार को करना पड़ा। नियमानुसार सरकार को इसकी रिकवरी ईकोग्रीन से ही करनी चाहिए, लेकिन इसके उलट सैनी सरकार कंपनी को अभी तक लूट कमाई करने की छूट दे रही है।
घोटाला छिपाने के लिए खत्म किया अनुबंध जानकारों के अनुसार मंत्री सुभाष सुधा ने ईकोग्रीन कंपनी का अनुबंध सात साल में कूड़ा-कचरा प्रबंधन के नाम पर की गई लूट को छिपाने के लिए किया है न कि उसके द्वारा बिजली नहीं बनाने के लिए। कंपनी को अनुबंध के दो साल के भीतर यानी 2018-19 में कूड़े से बिजली बनानी थी, यदि ऐसा होता तो उसका अनुबंध तब ही समाप्त कर दिया जाता। सच्चाई ये है कि खट्टर अपने करीबी अग्रवाल परिवार को कूड़ा प्रबंधन के नाम पर लूट कमाई की खुली छूट दिए हुए थे। कंपनी घरों से तो मोटी कमाई कर ही रही थी, लंबे समय तक निगमों से बिजली बनाए बिना ही पूरा भुगतान वसूलती रही, निगमों के संसाधनों का भी खूब जमकर इस्तेमाल किया, जिनका किराया अब तक लाखों रुपये हो चुका होता। दस साल में भाजपा सरकार ने दिखावे और ढिंढोरेबाजी के अलावा प्रदेश के विकास का कोई काम नहीं किया। भाजपा को चलाने वाली संघ को भी इसका अहसास हो गया था कि जनता खट्टर को बिलकुल पसंद नहीं कर रही। इसके मद्देनजर खट्टर से छीन कर सीएम की गद्दी नायब सैनी को दी गई, लेकिन वो भी खट्टर के ही चेले साबित हुए और प्रदेश में कुछ खास नहीं कर सके। संघ-भाजपा को लग गया कि इस विधानसभा चुनाव में उनका बोरिया-बिस्तरा सिमट सकता है तो अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कवायद शुरू कर दी। इसी के तहत ईकोग्रीन का अनुबंध समाप्त कराया गया, खट्टर और संघियों को डर था कि दूसरी सरकार आने पर कहीं वो ईकोग्रीन के सात वर्षों का हिसाब लेकर रिकवरी न कर दे, इसलिए उसका पुलिंदा बांध दिया गया।