अंशदाताओं से वसूली सौ प्रतिशत लेकिन पूरी सेवाएं नहीं दे रहा ईएसआईसी

अंशदाताओं से वसूली सौ प्रतिशत लेकिन पूरी सेवाएं नहीं दे रहा ईएसआईसी
August 25 14:46 2024

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मज़दूरों के कल्याण और उनके हित साधने के लिए चलाया जा रहा ईएसआई कॉर्पोरेशन उनसे अंशदान तो सौ प्रतिशत वसूल रहा है लेकिन सेवाओं में कटौती कर रहा है। अंशदाताओं के धन पर कुंडली मारे बैठे ईएसआईसी मुख्यालय के निकम्मे अधिकारी संस्थान को चलाने के लिए बहुत ही आवश्यक लोअर डिविजल क्लर्क, अपर डिविजनल क्लर्क, मल्टी टास्किंग स्टाफ, ज्वाइंट डायरेक्टर, डिप्टी डायरेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर ही भर्ती नहीं कर रहे हैं। हालात ये हैं कि ईएसआई कॉर्पोरेशन के 20,412 प्रशासनिक पदों में से 7437 आज तक भरे नहीं गए हैं। इनमें से करीब 52 सौ पद तो ऐसे हैं जिनके ईएसआईसी के जिला और क्षेत्रीय कार्यालयों में काम बमुश्किल चलाया जा रहा है। इन कर्मचारियों की कमी का खामियाजा सेवाएं सही समय पर नहीं मिलने से अंशदाताओं को भुगतना पड़ रहा है तो कॉर्पोरेशन को भी राजस्व की हानि उठानी पड़ रही है।

कॉरपोरेशन के प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाई लोअर डिविजन क्लर्क (एलडीसी) और अपर डिविजन क्लर्क (यूडीसी) होते हैं। कॉर्पाेरेशन में एलडीसी के 1929 पद स्वीकृत हैं इनमें से 865 पद रिक्त हैं। इसी तरह यूडीसी के 6520 स्वीकृत पद हैं लेकिन 1928 खाली पड़े हैं। एक यूडीसी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पूरे भारत में लिपिकीय कार्य बड़ी संख्या में पेंडिंग पड़े हैं। जिस कार्यालय में छह एलडीसी और दो यूडीसी की दरकार हैं वहां केवल एक यूडीसी और एक दो एलडीसी से काम लिया जा रहा है।

काम का बोझ अधिक होने के कारण अंशदाताओं के क्लेम की फाइल प्रोसेस होने में कई कई महीने लग जाते हैं, यही नहीं नियोक्ता कंपनियों का ऑडिट भी नहीं हो पा रहा है। हजारों ऐसी नियोक्ता कंपनियां हैं जिनका ऑडिट कई साल से पेंडिंग है। नियोक्ताओं के विचाराधीन केस और फाइलें भी लंबे समय से रीजनल कार्यालयों में देखी नहीं जा पा रही हैं। इधर कार्यालयों का काम पेंडिंग है उधर यूडीसी-एलडीसी को नियोक्ता कंपनियों में कार्यरत मज़दूर और उनके परिवार के आधार सीडिंग का काम दे दिया गया।
नतीजतन कार्यालयों में काम प्रभावित होता है। इन पदों से भी जरूरी मल्टी टास्किंग स्टाफ (एमटीएस) होता है। एमटीएस का काम अंशदाता-नियोक्ता की फाइलों की इंडेक्सिंग, रिकॉर्ड रखना, पत्राचार, दस्तावेज आदि का रिकॉर्ड मेनटेन करना होता है। एमटीएस के 3329 पद स्वीकृत हैं और इनमें से आधे से ज्यादा यानी 1730 खाली पड़े हैं। एमटीएए के बिना अनेक कार्यालयों में रिकॉर्ड तक मेनटेन नहीं किया जा पा रहा है।

क्षेत्रीय कार्यालय का पर्यवेक्षण संयुक्त आयुक्त जेडी स्तर का अधिकारी करता है। 80 हजार रुपये या उससे अधिक अंशदान करने वाली नियोक्ता कंपनी से संबंधित सभी कार्य जेडी के स्तर से ही किए जाते हैं, यानी कंपनी को नोटिस आदि उसके अनुमति से ही जारी किया जाएगा। 150 पद स्वीकृत हैं लेकिन केवल एक जेडी ही है बाकी 149 पद खाली पड़े हैं। समझा जा सकता है कि जेडी के न होने के कारण यूडीसी-एलडीसी गड़बड़ी करने वाली नियोक्ता कंपनियों को चाह कर भी नोटिस जारी नहीं कर पाते।
इस तरह के अनेक मामले पूरे देश में पेंडिंग हैं यदि जेडी के पद भरे होते तो इन कंपनियों पर अंशदाताओं का हक देने का दबाव बनाया जाता और जुर्माने की मोटी रकम वसूल कर खजाना भी भरा जा सकता है, लेकिन लगता है कि मूर्खालय में बैठे चालाक अधिकारी नियोक्ताओं से मिलीभगत कर मज़दूरों का हक लूटने और लुटवाने में लगे हैं। डिप्टी डायरेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद भी लगभग आधे खाली पड़े हैं। डीडी के 565 स्वीकृत पदों में से 261 खाली हैं।

इसी तरह सोशल सिक्योरिटी ऑफिसर एसएसओ के 993 पद खाली पड़े हैं, एसएसओ का काम कंपनियों का निरीक्षण करना, मज़दूरों को मिलने वाली सुविधाओं को सुनिश्चित करने के अलावा सभी पत्रावलियों का अध्ययन कर वरिष्ठ अधिकारी को रिपोर्ट देना होता है। पद खाली होने के कारण अनेक काम ब्रांच, उप क्षेत्रीय और क्षेत्रीय कार्यालयों में रुके पड़े हैं। ये सभी सामान्य प्रशासनिक पद हैं यानी ये नियोक्ता और अंशदाताओं से सीधे जुड़े होते हैं।

अंशदाताओं का बीमा क्लेम आदि के केस देखने और फैसला देने वाले एक्चुअरी, असिस्टेंट एक्चुअरी और डिप्टी डायरेक्टर एक्चुअरियल के सभी पद खाली हैं। समझा जा सकता है कि इन महत्वपूर्ण अधिकारियों के बिना अंशदाता को अपना हक पाने के लिए कितना भटकना पड़ता होगा। इनके अलावा करीब एक हजार पद आला स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों के स्तर के खाली हैं जिनके कारण कॉरर्पोरेशन के काम महीनों लंबित हो चुके हैं।

प्रशासनिक स्तर पर खाली पदों को छोड़ भी दिया जाए तो कर्मचारियों के लिए बहुत जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं भी कॉर्पाेरेशन के हरामखोर अधिकारी हजम करने पर तुले हुए हैं। नियमानुसार दस हजार अंशदाताओं पर एक डिस्पेंसरी होनी चाहिए। इसमें पांच डॉक्टर और पच्चीस पैरा मेडिकल स्टाफ होना चाहिए। अंशदाताओं की संख्या वर्तमान में चार करोड़ से भी अधिक है, इस आधार पर कम से कम चार हज़ार डिस्पेंसरियां होनी चाहिए लेकिन पुरानी 1500 डिस्पेंसरियों से ही काम चलाया जा रहा है। चार हजार डिस्पेंसरियां होने पर करीब 16 हजार डॉक्टर और 80 हजार पैरा मेडिकल स्टाफ की तैनाती होनी चाहिए।

इससे आईपी को अपने करीब ही चिकित्सा सेवा उपलब्ध होती। बताते चलें कि एक महानिदेशक ने ब्रांच ऑफिस कम डिस्पेंसरी बनाने का प्रस्ताव दिया था, इसमें होता ये कि इंश्योर्ड पर्सन आईपी को ब्रांच ऑफिस और डिस्पेंसरी के बीच चक्कर न लगाने पड़ते लेकिन मज़़दूरों के पैसे पर मोटी तनख्वाह लेने वाले लाल फीताशाहों ने इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया। जाहिर है कि कॉर्पोरेशन अंशदाताओं की सेवा में कटौती कर उनके अधिकारों पर डाका डाल रहा है।

दफ़्तरी स्टाफ की कमी का खामियाज़ा कार्पाेरेशन का स्थानीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल भी भुगत रहा है। अस्पताल में चाहे गायनी विभाग हो, मेडिसिन, आर्थेा या ऑफ्थेल्मोलॉजी, प्रत्येक विभाग में आने वाले सैकड़ों मरीजों को छोटे बड़े दर्जनों डाक्टर ओपीडी में देखते हैं, ओटी में ऑपरेशन करते हैं और वार्डों में मरीजों की देखभाल का जिम्मा निभाते हैं।

जाहिर है इसके लिए लिखा पढ़ी का दफ़्तरी काम काफी हो जाता है। तमाम अच्छे संस्थानों में इन कामों के लिए बाबुओं की व्यवस्था की जाती है। सैद्धांतिक रूप से यहां पर भी बाबुओं का प्रावधान तो किया गया है लेकिन नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं, जिसके चलते डॉक्टरों को अपना कीमती समय
व्यर्थ की बाबूगीरी में बर्बाद करना पड़ता है।

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Mazdoor Morcha
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