डॉ. रामवीर अन्धे हो इसलिए भक्त हो अथवा भक्ति से हुए अन्धे अन्धेपन से बढती भक्ति भक्ति से बढते हैं अन्धे ।
अन्धेपन एवं भक्ति में अन्योन्याश्रय का सम्बन्ध अन्धा है भक्ति के सहारे भक्ति से बढता अन्धत्व ।
अन्धभक्ति है रोग पुराना उपनिषदों में है उल्लेख ‘अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा’ पंक्ति का तात्पर्य भी देख।
जब अन्धे अन्धों को दिखाने लगते हैं जीवन की राह तब समाज में चलने लगता अन्धभक्ति का तीव्र प्रवाह।
ज्ञान कर्म औ भक्ति तीनों का है अपना अपना महत्त्व किस अनुपात में इनका सेवन करें जानने का भी महत्त्व।
बिन देखे ही भक्ति करना स्व औ पर को युगपत् छलना ज्ञान बिना कर्म करना है जैसे अविदित पथ पर चलना।