सुशोभित यह बात कहने का क्या अर्थ है कि “इन लोगों के लिए राष्ट्र से बढ़कर धर्म है?” क्या अमेरिका में बसे हिन्दुओं के लिए अमेरिका हिन्दू धर्म से बढ़कर होता है? क्या वो अमरीकी-संविधान को गीता-पुराण से ऊपर रखते हैं? और राष्ट्र को धर्म से बढ़कर क्यों होना चाहिए? राष्ट्र अपनी सम्प्रभुता से परिभाषित होता है। यह एक आधुनिक अवधारणा है। सौ साल पहले तक दुनिया का नक़्शा बहुत भिन्न था और यहाँ राष्ट्र-राज्यों के बजाय साम्राज्यों और रियासतों का प्रसार था। राष्ट्र की तुलना में धर्म, सम्प्रदाय, कम्युनिटी मनुष्य के अवचेतन में कहीं गहरे धँसी होती हैं। इनका सदियों का, कभी-कभी तो सहस्राब्दियों का इतिहास होता है। आप किसी आधुनिक राष्ट्र-राज्य के नागरिक से यह अपेक्षा तो कर सकते हैं कि वह जिस देश में रहता है, उसके नियमों का पालन करेगा और उसे कोई नुक़सान नहीं पहुँचाएगा, लेकिन उससे यह अपेक्षा करना ज़्यादती है कि वह उसे अपने धर्म से ऊपर रखेगा। सामुदायिक पहचानें, राष्ट्रीय पहचानों की तुलना में कहीं गहरी होती हैं।
इस मौक़े पर यह सवाल पूछने का भी क्या अर्थ है कि जिन्होंने पहलगाम हमले के बाद सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन नहीं किया, वे ख़ामेनेई की मृत्यु पर क्यों विलाप करते हैं? हिन्दुओं में भी करोड़ों लोगों ने पहलगाम हमले के बाद सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन नहीं किया था, इससे क्या यह प्रमाणित होता है कि उनकी सहानुभूति आतंकवादियों के साथ थी? और क्या पहलगाम हमले के लिए शिया जिम्मेदार थे? शियाओं से यह प्रश्न पूछने कि “आपने पहलगाम पर प्रदर्शन क्यों नहीं किया” के बजाय क्या स्वयं हिन्दुओं से ही यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि “आप गिरते पुलों, ढहती सड़कों, दूषित हवा-पानी, भ्रष्ट तंत्र से जान गँवाने वाले अपने देशवासियों के लिए वैसे उद्वेलित क्यों नहीं होते, जैसे पहलगाम या बांग्लादेश में मारे जाने वाले हिन्दुओं के लिए होते हैं?” क्या एक हिन्दू की जान का मूल्य तभी होगा, जब वह किसी मुसलमान के हाथों मारा जाएगा? क्या हिन्दू की जान राजनैतिक ध्रुवीकरण का उपकरण है? एजेंडा चलाने का औज़ार है?
इस तरह की बेकार की बातों में पडऩे के बजाय शियाओं की मनोस्थिति को समझना बेहतर होगा। उनका यह शोक-प्रदर्शन बहुत स्वाभाविक और अपेक्षित भी था। भारत में शिया अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक हैं। सुन्नी बहुसंख्यकों के द्वारा बहुधा सताये जाते हैं। उन्हें राफज़़ी कहकर चिढ़ाया जाता है। ग़ुस्ताख़े-सहाबा कहकर उन पर लानतें दी जाती हैं। हाल ही में पाकिस्तान में शियाओं को निशाना बनाकर बड़ा धमाका किया गया। ख़ामेनेई की मृत्यु के बाद भी बहुसंख्य सुन्नी चुप्पी साधे हुए हैं। कुछ ने तो दबी आवाज़ में ख़ुशी भी जताई है। ऐसे में जब कोई लखनऊ, हैदराबाद, कश्मीर में हुए प्रदर्शनों को मुसलमानों का प्रदर्शन बताता है, तो उसके अज्ञान पर आश्चर्य ही जताया जा सकता है। यह मुसलमानों का नहीं, शियाओं का प्रदर्शन था। सभी शिया मुसलमान हैं, लेकिन सभी मुसलमान शिया नहीं हैं।
दुनिया में जहाँ सुन्नी-बहुल मुल्कों की तादाद दर्जनों में है, वहीं शिया-बहुल मुल्क इने-गिने ही हैं। इनमें भी ईरान सबसे प्रमुख है, जहाँ 90 से 95 फ़ीसदी शिया आबादी है। जैसे इजऱाइल इकलौता यहूदी-राष्ट्र है, उसी तरह से ईरान को इकलौता शिया-राष्ट्र कहा जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से शिया क़ौम स्वयं को अन्याय का शिकार मानती रही है। अली, हसन और हुसैन की शहादत को वो सीने से लगाये रखते हैं। अली असगऱ की दूधमुँही शहादत पर विलाप करते हैं। फ़ातमा ज़ेहरा के साथ हुए अन्याय पर रोते हैं। छाती पीटकर मातम मनाना उनकी मुहर्रमी-परम्परा का हिस्सा है। ऐसी मनोदशा वाली क़ौम के सबसे बड़े लीडर, रहबर और मरजअ (धर्मगुरु) को जब इस तरह से क़त्ल कर दिया जाएगा तो मातम स्वाभाविक है। उन्हें अपना सोग़ मनाने दीजिये, इसके लिए उन्हें जज नहीं कीजिये। हर वाकय़े को साम्प्रदायिक चश्मे से देखने और कटुता प्रदर्शित करने की आदत भली नहीं।