ऐसा वोटर समूह जो भविष्य बदलने नहीं बल्कि अतीत बदलने के लिए वोट देता है

ऐसा वोटर समूह जो भविष्य बदलने नहीं बल्कि अतीत बदलने के लिए वोट देता है
April 05 16:14 2025

राकेश कायस्थ
दुनिया हंस रही है कि अतीत किस तरह बदला जा सकता है? राजनीतिक असहमति के बावजूद मेरा ये मानना है कि मौजूदा निजाम ने यह काम बहुत हद तक कर दिखाया है। इस बात को कुछ उदाहरणों से समझते हैं—
1. नेता विशिष्ट का 1978 में जाकर एक विश्वविद्यालय में एक ऐसा विभाग खुलवाना जो, पूरी दुनिया में कहीं और नहीं है। इस विभाग से नेता विशिष्ट ने एमए की डिग्री हासिल करना। व्यंग्य कवि संपत सरल ने इस पर कहा था—यह जानना सुखद है कि हमारे नेता एमए पास ही नहीं बल्कि बीए पास भी हैं और जब बीए किया है तो मैट्रिक पास भी जरूर किया होगा।
2. आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने वाले सरदार पटेल का मृत्यु के बाद पार्टी बदलवाकर अपने पाले में लाना। जिन लालबहादुर शास्त्री के ताशकंद से लौटने पर उनके खिलाफ संघ ने दिल्ली में ऐतिहासिक प्रदर्शन की तैयारी की थी, दिवगंत होने के बाद उनकी भक्ति में लीन होना। अटल बिहारी वाजपेयी के दोस्त, ब्रीफकेस में एक करोड़ कहानी के नायक और सांसद खरीदकर सरकार बचाने वाले पी.वी.नरसिंह राव को मौत के बाद अपने पाले में लाकर भारत रत्न देना।
3. राजनीतिक सोच के स्तर पर पूरी तरह दूसरी छोर पर खड़े विवेकानंद, भगत सिंह और आधुनिक युग में कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं तक के बारे में मनगढंत कहानियां बनाकर उन्हें आरएएस की विचारधारा के करीब साबित करना।
4. अंबेडकर के विचारों का पलीता लगाकर आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें देवता बनाना और इस बात की कोशिश करना कि हर कोई उन्हें पूजे लेकिन पढ़े कोई नहीं।
5. गाँधी के सत्य-अहिंसा के आदर्शों को चालाकी से गायब करना और उन्हें स्वच्छता के देवता के रूप में स्थापित करना। स्वयंभू संत, महंतों और अपनी पार्टी के गुर्गों द्वारा रोजाना गांधी की चरित्र हत्या करवाने की नाकाम कोशिश करना और हत्या आरोपी माफीवीर सावरकर को नये राष्ट्र नायक के रूप में स्थापित करने का प्रयास।
6. सत्ता में आने के बाद हिंदू समाज में एक नई तरह हीनता ग्रंथि को उभारना। प्रोपेगैंडा फिल्में बनवाना और हारे हुए राजा-महाराजोँ का महिमामंडन और कई मामलों में उन्हें जिताना।
7. इतिहास बिल्कुल बदल सकता है। इतिहास बदल रहा है। बैक डेट में जाकर जब जाली डिग्री बनाई जा सकती है तो फिर कहानियां क्यों नहीं बनाई जा सकती हैं।
बेहतर समाज वही होता है जो अपने अतीत को लेकर कुंठाग्रस्त ना हो और भविष्य की तरफ देखे। अगर दिल्ली में कोई तुगलक लेन है या कोई औरंगजेव रोड था, तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो इसलिए था कि वो समाज के आदर्श पुरुष हैं। गुजरे हुए वक्त में जो भी हुआ हो अच्छा या बुरा, आप चाहकर भी उसके अस्तित्व को नकार नहीं सकते। गुजरे जमाने में ऐसा भी कोई था, ये स्वीकार करना सच का सामना है और बिना नैतिक बल के कोई समाज ऐसा नहीं कर सकता है।

दुनिया के बहुत से हिस्सों में वॉर मेमोरियल हैं और वहां युद्ध में क्षतिग्रस्त हुई इमारतों को सहेजा गया है। क्या वे समाज अपनी हार को सेलिब्रेट करते हैं? मूर्खों को कौन समझाये कि वो समाज इसलिए बेहतर है क्योंकि उन्हें इतिहास की आंखों में आंख डालकर देखने में डर नहीं लगता। आपको डर लगता है और इस डर को आप अपना गौरव बनाने निकले हैं। वोटर कुंठा का इंजेक्शन लेने के लिए लगातार एक पार्टी को वोट दे रहे हों तो फिर बेहतर भविष्य की उम्मीद रखना बेमानी है। मूर्खता के सशक्तीकरण अभियान को अभी बहुत दूर जाना और भारतीय समाज को बहुत पीछे लौटना है।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles