अहमद फराज़ : चलो ‘फराज़’ कू ऐ यार चल के देखते हैं

अहमद फराज़ : चलो ‘फराज़’ कू ऐ यार चल के देखते हैं
June 16 13:44 2024

पंकज पराशर
सदियों से दिल ने सितम सहे हैं और सदियों से मोहब्बत ने हिज्र को भोगा है, मगर ऐसे अहमद फऱाज़ कम ही हुए हैं, जिन्होंने जब मोहब्बत को लिखा तो हर्फ गुल जैसे नाजुक थे और जब अवाम के हक में हुकूमत को ललकारा तो लफ्ज़ फौलाद में ढल जाते हैं। यही अहमद फऱाज़ की शायरी का परिचय है। वह अहमद फऱाज़ जो 25 अगस्त 2008 को इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए थे, मगर तब है और आज है, उन्हें जी भर भर याद किया जाता है। उनकी शायरी को आजमाया जाता है, उनके शेर ओ नज्मों को बहते आंसुओं के हलफनामे की तरह पढ़ा जाता है। कोई अदीब जब दुनिया से रुख़्सत कर जाता है, तो उसके लफ्जों के रूप में उसकी रूह यहीं रह जाती है, हमारे बीच। कुछ ऐसा ही हुआ है मरहूम शायर अहमद फऱाज़ के साथ। जब-जब उन्हें पढ़ते हैं, यू ट्यूब पर सुनते हैं तो महसूस होता है वे यहीं हैं, कहीं गए ही नहीं हैं। जब कोई आशिक अपने महबूब को दिल की बात कहना चाहे तो उसे अहमद फऱाज़ की शायरी याद आती है। जब अपने प्रिय की तारीफ करनी हो तो कौन होगा जिसे फऱाज़ की बात याद न आती हो और वह कह न देता हो,

सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-संवर के देखते हैं।’
गर वह कहना चाहे कि आओ मेरी नजरें तुम्हारी राह तकती हैं तो उसे फऱाज़ की शायरी के मार्फत यूं कहना होगा,
अब तक दिल-ए-खुश-फहम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएं भी बुझाने के लिए आ’।
और जो हिज्र की बात हो, जुदाई का दर्द कहना हो तो फऱाज़ की जुबां में यूं न कहेगा,
‘हुआ है तुझ से बिछडऩे के बाद ये मालूम
कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी।’

अहमद फऱाज़ पर हमेशा नौजवानों और लड़कियों के शायर होने का इल्जाम लगता रहा। अहमद फऱाज़ को चाहने वाले किस जज़्बे और किस शिद्दत से उन्हें चाहते थे इसका अंदाज़ा मशहूर पाकिस्तानी लेखक अहमद फ़ारूक़ मशहदी की यादों में महफ़ूज़ रह गए इस वाकये से लगाया जा सकता है। यादों के झुरमुट में एक उजली याद पी टीवी पर नश्र होने वाले एक मुशायरे की है, जिसमें अहमद फऱाज़ ने भी अपना कलाम पेश किया था। इस दौरान जब फऱाज़ अपनी गज़़ल पढ़ रहे थे, तभी टीवी के किसी शोख़ कैमरामैन ने अचानक कुछ लड़कियों को फ़ोकस किया, जिनकी आंखों से टप-टप आंसू गिर रहे थे। शायरी पर ऐसा खिऱाज-ए-तहसीन शायद ही किसी और शायर को नसीब हुआ हो।‘आज फऱाज़ हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी शायरी, उनकी नज्म और उनकी गज़़लों में वो आज भी जिंदा है। जब तक इश्क है, बेवफाई है, देशप्रेम है, हिजरत है…तब तक फऱाज़ जिंदा रहेंगे।

जि़ंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे

जब बात उर्दू गज़़ल की परम्परा की हो रही होती है तो हमें मीर तक़ी मीर, ग़ालिब, मोमिन, दाग़, हसरत, यागाना, फ़ानी, जिगर, असगऱ और नासिर काज़मी आदि की चर्चा जरूर करनी होती है। मगर बीसवीं शताब्दी में गज़़ल की चर्चा हो और विशेष रूप से 1947 के बाद की उर्दू गज़़ल का जि़क्र हो तो उसके गेसू संवारने वालों में जो नाम लिए जाएंगे उनमें अहमद फऱाज़ का नाम कई पहलुओं से महत्वपूर्ण है। अहमद ‘फऱाज़’ गज़़ल के ऐसे शायर हैं जिन्होंने गज़़ल को जनता में लोकप्रिय बनाने का क़ाबिले-तारीफ़ काम किया। गज़़ल यों तो अपने कई सौ सालों के इतिहास में अधिकतर जनता में रुचि का माध्यम बनी रही है, मगर अहमद फऱाज़ तक आते-आते उर्दू गज़़ल ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे और जब फऱाज़ ने अपने कलाम के साथ सामने आए, तो लोगों को उनसे उम्मीदें बढ़ीं। ख़ुशी यह कि ‘फऱाज़’ ने मायूस नहीं किया। अपनी विशेष शैली और शब्दावली के सांचे में ढालकर जो गज़़ल उन्होंने पेश की वह जनता की धडक़न बन गई और ज़माने का हाल बताने के लिए आईना बन गई। मुशायरों ने अपने कलाम और अपने संग्रहों के माध्यम से अहमद फऱाज़ ने कम समय में वह ख्याति अर्जित कर ली जो बहुत कम शायरों को नसीब होती है। बल्कि अगर मैं ये कहूं तो गलत न होगा कि इक़बाल के बाद पूरी बीसवीं शताब्दी में केवल फ़ैज और फिऱाक का नाम आता है, जिन्हें शोहरत की बुलन्दियां नसीब रहीं, बाकी कोई शायर अहमद फऱाज़ जैसी शोहरत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाया।

उनकी शायरी जितनी ख़ूबसूरत है, उनके व्यक्तित्व का रखरखाव उससे कम ख़ूबसूरत नहीं रहा। उनका जन्म पाकिस्तान के सरहदी इलाके में हुआ। उनके वालिद एक मामूली शिक्षक थे। वे अहमद फऱाज़ को प्यार तो बहुत करते थे, लेकिन यह मुमकिन नहीं था कि उनकी हर जिद वे पूरी कर पाते। बचपन का वाकय़ा है कि एक बार अहमद फऱाज़ के पिता कुछ कपड़े लाए। कपड़े अहमद फऱाज़ को पसन्द नहीं आए। उन्होंने ख़ूब शोर मचाया कि ‘हम कम्बल के बने कपड़े नहीं पहनेंगे’। बात यहाँ तक बढ़ी कि ‘फऱाज़’ घर छोडक़र फऱार हो गए। वह फऱारी तबियत में जज़्ब हो गई। ताउम्र वह फऱारी जीते रहे…कभी लन्दन, कभी न्यूयार्क, कभी रियाद तो कभी मुम्बई और हैदराबाद। अहमद फऱाज़ की शायरी के आलोचकों का यह भी मानना है कि अहमद फऱाज़ की शायरी की शोहरत आम होने की वजह उनकी शायरी की बाहरी सजावट और उनका सजीला व्यक्तित्व था। लेकिन मेरे जैसे पाठक को इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि उनकी शोहरत में उनके व्यक्तित्व का कितना हाथ है, क्योंकि मैं मानता हूं कि शायरी की दुनिया में बाहरी चमक-दमक अधिक समय तक नहीं टिकती, जबकि अहमद फऱाज़ की शायरी दशकों बाद आज भी अपनी महत्ता बरकऱार रखे हुए है। यह सही हो सकता है कि अहमद फऱाज़ को ख्याति मुशायरों से मिली, पर मुशायरों पर छाए रहने वाले कितनी ही शायर अपनी लहक और चमक खोने के बाद अतीत का हिस्सा बन गए हैं, जबकि अहमद फऱाज़ का पहले से ज़्यादा आज मौजूद होना उनकी शायरी के दमख़म का पता देता है।

अहमद फऱाज़ की शोहरत ने अब अपने गिर्द एक ऐसा प्रभामण्डल पैदा कर लिया जिसमें उनकी साम्राज्यवाद और वाज़ीवाद से जूझने वाले एक क्रान्तिकारी रुमानी शायर की छवि चस्पां हो गईं। उनका अपना निजी जीवन भी इस प्रभामण्डल के बनाने में एक कारण रहा। उन्होंने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से बाहर गुज़ारा और वे एक जिलावतन (देश निकाला) शायर के रूप में पहचाने और सराहे गए। इसके अक्स उनकी शायरी में जगह-जगह हैं। उसमें देश से दूर रहने, देश के लिए तड़पने का एहसास, हिजरत की पीड़ा और हिजरत करने वालों का दर्द जगह-जगह मिलता है। बखूबी हम इसे फऱाज़ की शायरी के विभिन्न रंगों का एक ख़ास रंग कह सकते हैं। इस तरह डेमोक्रैसी की तड़प को फऱाज़ ने महबूब की जुदाई की तड़प में तब्दील कर दिया। उनकी शायरी पर मशहूर शायर कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ की टिप्पणी यहां देना मैं मुनासिब मानता हूं। वह टिप्पणी फऱाज़ को समझने में मददगार हो सकती है। उनका कहना है, ‘फऱाज़ की शायरी ग़में दौरां और ग़में जानां का एक हसीन संगम है। उनकी गज़़लें उस तमाम पीड़ा की प्रतीक हैं, जिससे एक हस्सास (सोचने वाला) और रोमांटिक शायर को जूझना पड़ता है। उनकी नज़्में ग़में दौराँ की भरपूर तर्जुमानी करती हैं और उनकी कही हुई बात, जो सुनता है उसी की दास्तां मालूम होती है।’’ बेदी साहब के कहे के मुताबिक़, ग़ौर करें तो फऱाज़ के यहां महबूब और ज़माने के ग़म एक साथ उभरते हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो वो अपने निजी ग़म को भी सार्वजनिक बना देते हैं. …और यही उनका कमाल है। मिसाल के तौर पर ग़ौर करें :

कुछ इस तरह से गुज़ारी है जि़न्दगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंजि़ल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफर में रहा

हिजऱत, ग़में दौरां और ग़में जानां के अतिरिक्त अगर फऱाज़ ने केवल इश्क़ पर भी शेर कहे हैं, तो भी फऱाज़ ने उनमें रिवायती हुस्नो-इश्क़ से दूर, जीती-जागती दुनिया के लोगों के इश्क़, उनकी जुदाई, उनके मिलन आदि को कुछ इतने ख़ूबसूरत अन्दाज़ में ढाला है कि सुनने वाला उसमें अपने आपको ढूंढने लगता है। कभी-कभी तो लगता है, महबूब को सामने बिठाकर बात की जा रही है। उनकी तमाम गज़़लें और उनके अशआर इसकी ताईद करते नजर आएंगे। फऱाज़ की शायरी पर हिन्दुस्तान अनेक समकालीन रचनाकारों ने अपनी राय ज़ाहिर की है। मजरूह सुल्तानपुरी ने एक बार लिखा कि ‘‘फऱाज़ अपने वतन के मज़लूमों के साथी हैं। उन्हीं की तरह तड़पते हैं, मगर रोते नहीं। बल्कि उन जंजीरों को तोड़ते और बिखेरते नजर आते हैं जो उनके माशरे (समाज) के जिस्म (शरीर) को जकड़े हुए हैं। उनका कलाम न केवल ऊंचे दर्जे का है बल्कि एक शोला है, जो दिल से ज़बान तक लपकता हुआ मालूम होता है।’’ दिल से ज़बान तक लपकता हुआ यह शोला कभी-कभी उनके आलोचकों को नाक-भौं सिकोडऩे का बहाना दे देता है और वे उनकी शायरी में हुस्नो-इश्क़ को घिसा-पिटा घोषित करते पाए जाते हैं। ऐसी आलोचनाओं का जवाब देते हुए पाकिस्तान के विख्यात शायर और कथाकार अहमद नदीम क़ासिमी ने एक बार लिखा, ‘‘यदि हुस्नो-जमाल और इश्क़ो-मुहब्बत की उम्दा शायरी घटिया होती तो मीर और ग़ालिब ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के महान् शायरों के यहां घटिया शायरी के अंबारों के सिवा क्या होता। फऱाज़ की शायरी में प्रयोग होने वाला हुस्नो-इश्क़ ऐसा विषय है जो इन्सानी जि़न्दगी में से निकल जाए तो इन्सान के बातिन (अन्दर) सहराओं में बदल जाएं। फऱाज़ तो भरी-पूरी जि़न्दगी का शायर है।’’ अगर बारीक़ी से नजऱ डालें तो फऱाज़ की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी नाजुकी और ख़ूबसूरती है। अहमद फऱाज़ का मैदान वैसे तो गज़़ल है, पर फऱाज़ ने नज़्में भी लिखी हैं जो अपने अन्दर कई पहलू लिए हुए हैं। फऱाज़ यहां भी अपने प्यारे विषय ‘देश-प्रेम’ और ‘हिजरत’ से दामन छुड़ा नहीं पाए हैं। यों उनमें सारी मानवता की पीड़ा समाई मिल जाएगी-दर-बदरी की तस्वीर में वे शब्दों का रंग यूं भरते हैं :

किसी शहर बे अमां में
मैं वतन बदर अकेला
कभी मौत का सफर था
कभी जि़न्दगी से खेला।

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Mazdoor Morcha
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