डॉ. रामवीर अगर बेचने पर आता तो मैं भी बेच सकता था गीता वेद और शास्त्रों की दुकान सजा सकता था।
देवी और देवताओं के सुन्दर चित्र लगा कर श्रद्धालु भक्तों को मंच पर यथायोग्य बैठा कर
अवसर के अनुसार इष्ट के जयकारे बुलवा कर किसी बडे नेता से गले में मालाएं डलवा कर
करना क्या था दाढ़ी बढ़ा कर माथा रंग लेना था कुछ मन्त्रों और श्लोकों को पक्का रट लेना था।
अपनी प्रसिद्धि करवाने का कभी रहा न शौक झूठे धार्मिक आडम्बर लख मन में होता शोक।
जिनसे थी उद्धार की आशा वे ही निकले निकम्मे लोग दुखी हैं समझ न पाते देश है किन के जिम्मे।
नवभारत में नवज्योति की अब न कोई आस रूढिवादियों ने कर दिया है पूरी तरह निराश।