मज़दूर मोर्चा ब्यूरो जो लोग गोहाना से निर्वाचित एवं सैनी कैबिनेट में मंत्री बने डा. अरविंद शर्मा की कहानी नहीं जानते उनके लिए शायद धनेश अदलखा बहुत बड़ा लुटेरा, अपराधी, फ्रॉडी हो सकता है, लेकिन सैनी कैबिनेट के पर्यटन, सहकारिता एवं जेल मंत्री डॉ. अरविंद शर्मा का इतिहास जानने के बाद धनेश अदलखा अवश्य कुछ राहत की सांस ले सकता है, क्योंकि डॉ. शर्मा के महान कारनामों के सामने अदलखा बेचारा तो कहीं नहीं ठहरता।
मज़दूर मोर्चा द्वारा खोजबीन करने पर पाया गया कि झज्जर के निकट एक छोटे से गांव का अरविंद शर्मा पढ़ाई में औसत छात्र था। सन् 1982 में रोहतक मेडिकल कॉलेज परिसर में डेंटल कॉलेज की स्थापना हुई। उस वक्त इसमें कुल 40 सीटें थी। इनमें से 8 सीटें मुख्यमंत्री द्वारा नामित की जाती थीं। अरविंद का नम्बर 32 सीटों में नहीं पड़ा लेकिन जुगाड़बाज़ी करके तत्कालीन मुख्यमंत्री भजन लाल से अपना नाम नामित करा कर दाखिला पा लिया। दाखिला तो ले लिया लेकिन इसकी रुचि पढ़ाई में कम और गुंडागर्दी और लफड़ेबाज़ी में ज़्यादा रहती थी। मेडिकल लाइन के छात्रों में एक अनकही प्रथा है जिसके अनुसार एमबीबीएस वाले छात्र अपने आपको सबसे सुपीरियर व डेंटल तथा वेट्रिनरी वालों को इन्फीरियर मानते हैं। इसे लेकर डेंटल तथा वेट्रिनरी वालों के मन में एक हल्के-फुल्के द्वेष की भावना रहती है। इसी द्वेष की भावना से ग्रसित अरविंद मेडिकल कॉलेज के छात्रों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के इरादे से उनके होस्टलों में अपने 4-6 बाहरी गुंडों को लेकर अक्सर धमा चौकड़ी मचाता था। हॉस्टल में किसी डॉक्टर की हिम्मत नहीं होती थी जो इसका विरोध करे। एक दिन शराब के नशे में ये लोग जब कुछ ज़्यादा ही शोर करने लगे तो एक छात्र ने कमरे से बाहर निकलकर इन्हें शोर मचाने से मना किया तो अरविंद व उसके गुंडों ने उसे पीटा और फिर एक बाहरी गुंडे ने एक छात्र से मिलने आए उसके दोस्त को ऐसा चाकू मारा कि उसकी मौत हो गयी। हत्या के मुकदमे में अरविंद सहित सभी गुंडे गिरफ्तार हो गये। कुछ दिन बाद अरविंद पुलिस हिरासत में परीक्षा देने कॉलेज आया तो मेडिकल कॉलेज छात्रों ने जबरदस्त प्रदर्शन कर उसके रेस्टीकेशन यानी उसे कॉलेज से बहिष्कृत करने की मांग की ।
जैसा कि इस देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में होता है, सबूतों, गवाहों व पुलिस की मिलीभगत से अरविंद तो साफ बरी हो गया क्योंकि वह चाकू मारने वाला नहीं था। जिसके चाकू मारने से मौत हुई थी वह भी थोड़े-बहुत दिन बाद छूट गया।
विदित है कि हत्यारा जब कानून के शिकंजे से छूट जाता है तो वह पूरे समाज के लिये एक बड़ा खौफ बन जाता है। लिहाजा अरविंद ने उस हत्यारे के साथ मिल कर अच्छा-खासा गैंग बना लिया। यह गैंग शहर भर में गुंडागर्र्दी के दम पर रंगदारी वसूलता था लेकिन अरविंद इस गैंग का इस्तेमाल केवल डॉक्टरों का ‘शिकार’ करने के लिये ही करता था। इसके लिये उसका जब जी चाहता था वह डॉक्टरों का शिकार करने पहुंच जाता था। इस शिकारी से तंग आये डॉक्टरों ने विचार-विमर्श करके अपने को संगठित किया और योजना बनाई कि अगली बार जब यह गिरोह आये तो घेर लो और मुकाबला करो। अगली बार दिसम्बर 1986 में, ऐसा ही हुआ, जब सामने से कड़ी चुनौती मिली, अरविंद तो तुरंत भाग खड़ा हुआ, अन्य गैंगस्टर भी पिट-छित कर जैसे-तैसे भाग निकलने में कामयाब हो गये।
परन्तु वह हत्यारा फंस गया जिसने एक डॉक्टर के दोस्त की हत्या कर रखी थी और मुकदमे से बरी हो गया था। उस को डॉक्टरों ने खूब जम कर पीटने के बाद उसके दोनों हाथ व पैर कई जगह से तोड़ दिये और उसे अपनी ही अस्पताल में भर्ती कर लिया। पुलिस को दिये अपने बयान में उसने कहा कि वह सामने आने पर हमलावरों को पहचान सकता है। लेकिन इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था कि वह डॉक्टरों के होस्टल में करने क्या आया था? खैर, 11 दिन बाद, बोन मैरो के खून की धमनियो में जमने से उसकी मृत्यु हो गयी। बेशक, कुछ डॉक्टरों की गिरफ्तारी तो हुई लेकिन इस बार डॉक्टरों का केस काफी मजबूत था, लिहाज़ा सभी डॉक्टर भी बरी हो गये।
अरविंद की खासियत यह थी कि वह गुंडागर्दी के साथ-साथ जेब में रखे पिस्टल से भी डॉक्टरों को डराता था, लेकिन जब कोई सामने से टकराने वाला मिल जाये तो हाथ जोडऩे में भी देर नहीं लगाता था। डरपोक इतना था कि अपने साथी के मारे जाने के बाद यह रोहतक छोड़ कर ऐसा भागा जैसे गधे के सिर से सींग और बम्बई जाकर ठिकाना बनाया। बेशक यह बदमाश था लेकिन दिमागदार भी खूब था। बदमाशी के दम पर यह बम्बई के काले धंधों की दुनिया में घुस गया जहां इसने अपने शातिर दिमाग का पूरा इस्तेमाल करते हुए सैंकड़ों करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया और मौका मिलते ही अपने दो पार्टनरों का भी सफाया कर दिया। अथाह धन का मालिक बन कर वह 1995 में रोहतक उस वक्त आया जब शहर में बाढ़ आई हुई थी। उस वक्त इसने शहर व आसपास कुछ समाजसेवा करके भलाई लेने का प्रयास किया था। लेकिन असली काम इसने सोनीपत हल्के में किया। वहां के सैकड़ों गांवों में इसने लाख, डेढ़ लाख रुपये प्रति गांव खर्च करके तथा सोनीपत शहर में एम्बुलेंस व शव वाहन सेवा तथा पानी वितरण की सेवा दी।
करीब पंद्रह -सोलह करोड़ रुपये खर्च करके इसने लोगों को एक प्रकार से खरीद लिया। इसके अहसानों तले दबे लोगों ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि उसके द्वारा लुटाया जा रहा यह पैसा आया कहां से है और अपना सांसद चुन लिया। विदित है कि आनंद पर्वत दिल्ली में शराब व लड़कियों का धंधा करने वाले देवराज दिवान ने भी इसी तरह पैसा खर्च करके लोगों के दिलों में जगह बना ली थी और निर्दलीय चुनाव लड़ कर सोनीपत से विधायक बन गया था।
इसी देवराज दीवान से प्रेरित होकर अरविंद ने भी सोनीपत वालों को खूब बेवकू$फ बनाया। किसी पार्टी का टिकट न मिलने पर यह 1996 में सोनीपत से निर्दलीय चुनाव लड़ गया और मुकाबले में खड़े तत्कालीन कांग्रेस राज्य प्रधान धर्मपाल मलिक को बुरी तरह से हराया। इसी आधार पर कहा जाता है कि मूर्खों को ठगने के लिए धूर्त भी इसी समाज से निकलते हैं। बस फिर क्या था, इसकी राजनीतिक हल्कों में पूरी धाक जम गयी। राजनीति के जो धुरंधर जनता को बेवकूफ बनाने में माहिर समझते थे, उन्हें अरविंद ने बता दिया कि वह उनसे भी बड़ा धुरंधर है। अगला चुनाव इसने शिव सेना के टिकट पर सोनीपत से लड़ा और हार गया। परन्तु इसने हिम्मत नहीं हारी। 2004 व 2009 के संसदीय चुनाव इसने कांग्रेस के टिकट पर करनाल से लड़े व जीत दर्ज कराई। यहां कांग्रेस का चरित्र भी देखने लायक है। जिसने इसके राज्य प्रधान को सोनीपत में हराया, फिर शिव सेना के टिकट पर चुनाव लड़ा, उसे ही करनाल से अपना प्रत्याशी बनाया। यही तो है कांग्रेस का बिकाऊ चरित्र। कांग्रेस ने 2014 में भी करनाल से इस पर दांव लगाया था, लेकिन मोदी लहर में यह हार गया।
इसके बाद अरविंद ने 2014 में ही विधानसभा चुनाव बसपा यानी मायावती के टिकट पर करनाल जि़ले से ही लड़ा। उस वक्त इसे बसपा की ओर से भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया गया था, परन्तु चुनाव हारने के बाद इसने बसपा भी छोड़ दी। अब 2019 के चुनाव में यह काफी देर तक इन्तज़ार करता रहा कि कांग्रेस इसे करनाल से टिकट दे या भाजपा। जब दोनों ने ही इसे करनाल से टिकट नहीं दिया तो भाजपा ने इसे रोहतक का टिकट पेश किया क्योंकि इस तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी के पास रोहतक से कोई उम्मीदवार नहीं था जो पार्टी को मोटा चंदा दे सके व चुनाव पर भी अंधाधुंध पैसा बहा सके। अरविंद ने भी समय की नजाकत समझते हुए एवं सत्तारूढ़ दल में घुसने को ही बेहतर मानते हुए रोहतक से भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ा और येन केन प्रकारेण जीत हासिल कर ली।
अपनी संसदीय सीट को पुन: जीतने के लिए इसने 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर दीपेंद्र हुड्डा के सामने खम ठोंका लेकिन इस बार पटखनी खा गया। पटखनी भले ही खा गया लेकिन पांच महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए मिट्टी झाड़ कर फिर से खड़ा हो गया। इस बार इसके शातिर दिमाग ने कांग्रेस की कमज़ोर कड़ी गोहाना पर निगाह गड़ाई। वहां की जनता जिस लोकप्रिय नेता हर्ष छिकारा के लिए कांग्रेस का टिकट मांग रही थी उसे न देकर पार्टी ने जगबीर मलिक को टिकट दिया लेकिन आम जनता उसके खिलाफ थी। इन हालात को अरविंद ने भली भांति भांप लिया था। इसके साथ साथ अपने खर्चे पर उसने कुछ निर्दलीय वोट कटवों को भी खड़ा किया था। इसी के चलते ब्राह्मण होते हुए भी अरविंद ने जाटों की बताई जाने वाली ये सीट जीत ली।
गुणों की इतनी बड़ी ‘खान’ को भला सैनी एवं भाजपा कैबिनेट से बाहर कैसे रख सकते थे लिहाजा अच्छे खासे महकमे सहकारिकता, पर्यटन तो दिया ही साथ ही अति महत्वपूर्ण जेल महकमा भी दिया, जिसे वह हत्या के मामले में काट कर आया था, अब ये डॉक्टर साहब अपना पूरा खर्चा जहां से फीस सहित वसूल कर पाएंगे। उक्त कहानी से तमाम राजनीतिक दलों व उनके नेताओं के चरित्र को समझा जा सकता है तथा इसी से यह भी समझा जा सकता है कि ये नेता लोग जो पैसा खर्च करते हैं वह आता कहां से है और उसे खर्च करने के पीछे मंशा क्या है?
अरविंद और चन्द्रास्वामी राजनीतिक गलियारों में किसी वक्त खूब धूम मचाने वाले चन्द्रास्वामी उर्फ नेमिचंद से भी अरविंद की घनिष्ठता उस समय बढ़ गयी थी जब 8 साल (1986 से 1995) बम्बई में भूमिगत रहा था। समझा जाता है कि इसी दौर में इसने जो काली कमाई की थी उसमें चन्द्रास्वामी का भी पूरा हाथ था। चन्द्रास्वामी ने ही अरविंद को योजना बना कर दी थी कि 200-300 करोड़ में हरियाणा जैसे राज्य की राजनीति पर पूरा कब्ज़ा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त तीन से चार हज़ार करोड़ खर्च करके केन्द्रीय सत्ता कब्ज़ाने लायक सांसद जिता लायेंगे। उसके बाद पूरे देश पर कब्ज़ा हो जायेगा।
लेकिन किन्हीं कारणों से उक्त योजना सिरे नहीं चढ़ पाई। उधर बम्बई में अपने जिन साझेदारों का सफाया करके अरविंद वापस हरियाणा आया था, उनके आदमियों ने 1997 में इस पर तीन गोलियां उस वक्त दागीं, जब यह सोनीपत में मंच पर भाषण दे रहा था। यह तो बच गया लेकिन इसके 2 साथी मारे गये थे। कितना ‘बढिय़ा’ राजनेता चुन कर लाई है भाजपा, गोहाना वालों का प्रतिनिधित्व करने के लिये।