फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आयुष्मान भारत योजना प्रदेश में आठ महीने के भीतर ही दोबारा बंद होने जा रही है। कारण वही तीन साल से चला आ रहा निजी अस्पतालों को भुगतान नहीं करने का नाटक है। जनता को करों के जरिए चूसने वाली मोदी-सैनी की डबल इंजन सरकार अपने नागरिकों को स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण और आधारभूत सुविधा भी नहीं उपलब्ध करा पा रही। जनता को बुनियादी सेवाएं देने में नाकाम डबल इंजन सरकारों के लिए शायरा इरतिज़ा निशात का शेर फिट बैठता है कि कुर्सी है तुम्हारा जनाज़ा तो नहीं है, कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते। दबंगई ये है कि भुगतान करने के बजाय अस्पतालों में विजिलेंस टीमें भेजी जा रही हैं, यानी सेवाएं भी लें और मेहनताना मांगने पर जांच और जेल भेजने का डर दिखाया जाए। आईएमए की प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सुनीला सोनी और चेयरमैन डॉ. अजय महाजन के अनुसार पिछले लगभग पांच-छह महीने से प्रदेश में आयुष्मान मरीजों के इलाज का भुगतान नहीं किया जा रहा है। योजना के तहत पांच सौ करोड़ रुपये का बकाया है, भुगतान नहीं होने से अस्पताल आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, स्टाफ, उपकरण, रखरखाव आदि के खर्च का दबाव बढ़ गया है। सरकार को दस दिन पहले पत्र लिख कर भुगतान कराने की मांग की गई थी लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला है।
सरकार को चेतावनी दी गई है कि यदि सोमवार तक भुगतान नहीं किया गया तो अस्पताल योजना के लाभार्थियों को इलाज नहीं देंगे। चेतावनी का असर यह हुआ कि सरकार ने आयुष्मान योजना के पैनल में शामिल कई निजी अस्पतालों में विजिलेंस टीमें भेज कर फाइलों की जांच शुरू करवा दी है। आईएमए के सदस्य सरकार के इस रुख से हैरान और नाराज हैं उनके अनुसार जिस सरकार को भुगतान करना चाहिए वह पुलिसिया जांच की धौंस दे कर दबाना चाहती है। आईएमए के पदाधिकारियों का कहना है कि अगर किसी ने हेराफेरी की है तो उस पर कार्रवाई की जाए, न कि सबको लपेटा जाए लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं करेंगे क्योंकि कोई भी हेराफेरी सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत के बगैर संभव नहीं हो सकती है। सबूत के तौर पर पलवल में एक सरकारी अधिकारी (सीएमओ) डॉक्टर जय भगवान रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़ा गया था जो अभी भी निलंबित ही चल रहा है, सरकार की नीयत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें अभी भी इन्क्वायरी इन्क्वायरी का खेल चल रहा है।
सरकारी अस्पतालों की हालत तो सरकार ने पहले ही खराब कर रखी है, इनमें न पर्याप्त मेडिकल स्टाफ है न नर्सिंग और न ही पैरा मेडिकल स्टाफ। दवाओं का अभाव बना रहता है यानी सरकारी अस्पतालों मेंं सर्दी जुखाम, बुखार, पेट की छोटी मोटी समस्या, प्राथमिक उपचार जैसी सेवाएं ही मिल पाती हैं। जिला अस्पतालों की हालत भी रेफरल सेंटर से ज्यादा कुछ नहीं रह गई है। ऐसे में कम से कम गरीब परिवारों को निजी अस्पताल में बेहतर इलाज कराने की दिखावे वाली कुछ सहूलियतें इस योजना के तहत दी गई हैं, भुगतान नहीं होने के कारण यदि वहां भी इलाज नहीं मिला तो मोदी की स्वास्थ्य सेवाओं की यह गारंटी उन मरीजों की मौत की गारंटी में तब्दील होने में देर नहीं लगेगी। आयुष्मान योजना का भुगतान नहीं होने के कारण इलाज बंद किया जाना पहली बार नहीं हो रहा है। 2024 में अप्रैल में और फिर अगस्त में आईएमए ने इलाज बंद कर हड़ताल की थी। सरकार ने किसी तरह टुकड़ों में भुगतान कर इलाज शुरू करवाया था लेकिन सात-आठ महीने बाद ही फिर से भुगतान बंद कर दिया गया। महीनों बकाया नहीं मिलने से नाराज आईएमए को अगस्त 2025 में फिर हड़ताल करनी पड़ी थी। 18 दिन तक गरीब मरीज ऑपरेशन और इमरजेंसी सेवाओं से वंचित रहे थे क्योंकि सरकार के अस्पतालों में उनका इलाज नहीं हो सकता था।
पिछले साल की हड़ताल को आठ माह ही गुजरे हैं और आईएमए ने फिर हड़ताल शुरू कर दी, यानी सरकार ने पुराने भुगतान के साथ ही दो माह तक ही भुगतान किया, नवंबर-दिसंबर से फिर लटका दिया गया। लगता है कि सरकार भुगतान रोक कर निजी अस्पतालों को गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज न करने के लिए मजबूर कर रही है, बाद में निजी अस्पतालों को दोषी बता कर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेगी। आईएमए सूत्रों के अनुसार लाभार्थी परिवार को पांच लाख रुपये तक मुफ्त इलाज सुविधा सिर्फ जुमला है, सच्चाई यह है कि इस योजना में तरह तरह की बीमारियों की खर्च सीमा तय कर दी गई है, यानी किसी भी मरीज को किसी एक बीमारी के लिए साल भर में पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज नहीं मिलेगा। बताया कि यदि किसी परिवार में पांच सदस्य हैं तो एक सदस्य को उस साल अधिकतम अस्सी हजार तक का ही मुफ्त इलाज दिया जाएगा, यानी सारा धन एक ही व्यक्ति पर नहीं खर्च किया जाएगा। गंभीर बीमारी के लिए तय रकम खत्म होने के बाद मरीज को अपने खर्च पर इलाज कराना होगा या अगर मरने से बचा रह जाए तो फिर अगले साल तक इंतजार करना होगा।
आईएमए सूत्रों के अनुसार सरकार की आयुष्मान योजना की रेटलिस्ट सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (सीजीएचएस) की रेट लिस्ट से भी काफी कम है। निजी अस्पताल इस रेट पर काम करना नहीं चाहते लेकिन सरकार के दबाव के कारण मजबूरी में स्कीम लागू कर रहे हैं। एक तो सरकार ने बीमारियों के पैकेज रेट बहुत ही कम कर रखे हैं, ऊपर से अधिकतम खर्च सीमा भी बांध रखी है। इसकेे बावजूद रो पीट कर किसी तरह इलाज किया भी जाता है तो बिल भुगतान में महीनों लगा दिए जाते हैं। पैकेज फिक्स होने के बावजूद भुगतान के समय कोई न कोई बहाना बना कर कटौती कर ली जाती है, एक तरह से सरकार निजी अस्पतालों का शोषण ही कर रही है। संविधान की कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के तहत नागरिक को बिजली, पानी, सड़क, भोजन, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकारों का काम है। 2014 में केंद्र भाजपा सत्ता में आई और बड़बोले, जुमलेबाज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। सत्ता संभालने के बाद से मोदी ने योजनाओं के नाम बदलने के सिवा कुछ खास नहीं किया। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं सामान्य रूप से चल रही थीं लेकिन पूंजीवादियों की गोद में बैठे नरेंद्र मोदी अंधाधुंध निजीकरण में जुट गए। स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाएं भी निजी हाथों को सौंपने के लिए उन्होंने 2018 में आयुष्मान भारत योजना लॉंच की।
इसके तहत 2011 में हुए सर्वे के आधार पर आर्थिक रूप से कमजोर माने गए परिवारों को एक साल में पांच लाख रुपये तक मुफ्त इलाज की सुविधा दी गई। इसका लाभ उठाने के लिए लाभार्थी के पास आयुष्मान कार्ड होना आवश्यक था। जानकारों के अनुसार आठ साल बीत चुके हैं लेकिन आज तक सौ प्रतिशत लाभार्थी परिवारों के आयुष्मान कार्ड नहीं बन सके हैं। गरीब लाभार्थियों को इलाज मिले न मिले मोदी-सैनी सरकारों को इससे सरोकार नहीं है, इस योजना के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये के विज्ञापन पर लुटा कर छवि चमकाने पर ही इनका जोर है। गैर भाजपाई सरकारों पर मोदी की इस पाखंडपूर्ण स्कीम को लागू करने का दबाव बनाया गया, इसमें उन्हें भी चालीस फीसदी खर्च करने को मजबूर किया गया। इतना ही नहीं अस्पतालों को आरोग्य मंदिर बना कर उसमें मोदी की फोटो भी लगाएं।