अन्ध विश्वास फैला रही है सुप्रीम कोर्ट, एक सीजेआई भगवान से पूछकर फैसला लिखता था तो दूसरे को उसके आराम की चिन्ता है, जनता जाये भाड़ में
नई दिल्ली (मज़दूर मोर्चा) देश के सर्वाेच्च न्यायालय में जहां कई-कई वर्षों से लम्बित पड़े हजारों अति महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई का नम्बर नहीं आ रहा, वहां कभी कुत्तों की भलाई पर चर्चा होती है तो कभी पत्थर के निर्जीव देवताओं के आराम में पडऩे वाले खलल पर चिन्ता व्यक्त की जाती है। इन्सान तो आठ-दस-बारह घन्टे काम करने के बाद थकता देखा गया है, परन्तु अब तो मन्दिर में दर्शन देते पत्थर के देवता भी थकने लगे हैं।
मीडिया में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंन्दिर के एक मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकान्त, जॉयमाल्या बागची व विपुल पंचोली की पीठ ने उक्त विचार प्रकट करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा गठित एक कमेटी को नोटिस जारी किए।
सुनवाई के लिए प्रस्तुत याचिकाकर्ताओं ने पुजारियों पर आरोप लगाया कि वे धनाढ्य लोगों से मोटा पैसा लेकर, कपाट बंद होने के बाद भी विशेष पूजा एवं दर्शन का आयोजन करते हैं। इससे देवताओं के आराम में विध्न पड़ता है। याचिका में मांग की गई है कि सर्वोच्च न्यायालय इस प्रथा पर रोक लगा कर देवताओं को आराम करने का पूरा समय दिलाए।
जाहिर है सुप्रीम कोर्ट में आने से पहले यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी गया था। वहां से याचिकाकर्ताओं को संतोषजनक फैसला मिलने की बजाय एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन कर दिया गया। यानी कि यह कमेटी ही तय करती कि इस मामले में क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूपी सरकार व उक्त समिति को जारी नोटिसों का मतलब यह है कि अभी यह खेल तमाशा काफी लम्बा चलने वाला होगा। सर्वविदित है कि करदाता के पैसे से चलने वाली ये उच्च अदालतें, जो काम के बोझ तले दबी जा रही हैं, अत्यधिक महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक मामलों को दरकिनार करके इस तरह के वाहियात मामलों में कीमती समय बर्बाद करने में जुटी हैं। इसके पीछे उद्देश्य यही प्रतीत होता है कि मंदिरों में रखे पत्थर अथवा धातुओ के निर्जीव भगवान, जीवित इन्सानों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। श्रम कानूनों का उल्लंघन करके मज़दूरों का कार्य दिवस आठ से 12 या 16 घंटे करने पर किसी कोर्ट को कभी एतराज नहीं हुआ; बल्कि कानून में ही संशोधन करके अब कार्य दिवस का समय ही बढ़ा दिया गया है। कुछ कारखानेदार तो देश की उन्नति के नाम पर प्रति सप्ताह 70 घंटे काम करने की वकालत भी करने लगे हैं।
दरअसल मंदिर एवं ऐसे ही अनेकों धार्मिक स्थल मोटी कमाई के बड़े साधन बन चुके हैं। पुजारी तो यहां मात्र वेतनभोगी कर्मचारी ही होते हैं। करोड़ों-अरबों की कमाई एवं सम्पत्तियों के मालिक तो वे ट्रस्टी ही होते हैं जिन्होंने जैसे-तैसे इन पर कब्जा कर रखा हैं। नकी कमाई का मुख्य स्रोत वे अंधभक्त, काली कमाई करने वाले तथा मूर्ख लोग होते हैं जिनका विश्वास निर्जीव पत्थर अथवा धातु की मूर्तियों में होता है। काली कमाई करने वाले तो यह समझ कर चढ़ावा चढ़ाते हैं कि उनके पाप धूल जाएंगे तथा गरीब यह सोच कर चढ़ाते हैं कि इससे भगवान प्रसन्न होकर उनकी दरिद्रता एवं तमाम संकटों से उन्हें उबार देंगे। दूसरी ओर शासक वर्ग भी यही चाहता है कि लोग अपनी समस्याओं के लिए सरकार की बजाय भगवान को ही उत्तरदायी मानते रहे और अपनी सारी फरियादें एवं मांगें भगवान से ही करते रहें। जाहिर है कि इससे सरकार जनआक्रोश से काफी हद तक बची रह जाती है। इसी उद्देश्य से मद्देनजर अब न्यायपालिका भी मंदिरों के मामलों में अत्यधिक बढ़-चढ़ कर अपनी भूमिका निभा रही है।