आनन्द स्वरूप वर्मा
29 अगस्त, 2004 को उत्तराखंड में ऊधमसिंह नगर जिले के एसएसपी की देखरेख में पाँच लोगों को माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार किया है। पुलिस ने दावा किया कि गहन पूछताछ के दौरान इन लोगों ने स्वीकार किया कि वे माओवादी हैं और हथियारों का प्रशिक्षण देने के लिए वे काम कर रहे थे। अगले दिन 30 अगस्त, 2004 को नानकमत्ता पुलिस स्टेशन में इनके खिलाफ मामला दर्ज कर दिया गया। 20 सितंबर, 2004 को पुलिस ने ईश्वरचंद उर्फ जूनियर को इस आधार पर गिरफ्तार किया कि उसके पास ‘साहित्यबोध’, ‘लाल पताका’, ‘फाँसी का फंदा’ जैसी कुछ प्रतिबंधित पुस्तकें बरामद हुई। 20 फरवरी, 2006 को पुलिस ने गोपाल भट्ट नाम के युवक को और फिर बाद में अनिल चौड़ाकोटी को माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार किया। इन सभी लोगों को 7-8 साल तक जेल में रखने के बाद अदालत ने इसलिए रिहा कर दिया क्योंकि इनके खिलाफ पुलिस के पास कोई सबूत नहीं था।
2 जनवरी, 2011 को महाराष्ट्र पुलिस ने सुधीर ढवले को उस समय महाराष्ट्र के वर्धा रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया जब वह ‘युवा अंबेडकरी साहित्य सम्मेलन’ में भाग लेने जा रहे थे। नागपुर की पुलिस ने दावा किया कि 26 दिसंबर, 2010 को एक दलित कार्यकर्ता भीमराव भावटे के बयान के आधार पर सुधीर को गिरफ्तार किया गया। सुधीर ढवले एक जाने-माने लेखक हैं और मराठी में एक सांस्कृतिक पत्रिका ‘विद्रोही’ के संपादक हैं। इनकी गिरफ्तारी के लोगों ने महाराष्ट्र बाद प्रकाश अंबेडकर, एन.पी. पाटिल, आनंद पटवर्द्धन, जे.वी. पवार, उर्मिला पवार जैसे अनेक राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय के तत्कालीन गृहमंत्री आर.आर. पाटिल से मिल कर अपना विरोध जताया और सुधीर की रिहाई की माँग की। पुलिस ने उन्हें नागपुर जेल में भेज दिया। दरअसल सितंबर 2006 में खैरलांजी में दलितों के सामूहिक हत्याकांड के बाद सुधीर ढवले काफी सक्रिय हो गये थे और 2007 के अंतिम दिनों में उन्होंने सत्ता के दमन का प्रतिरोध करने के लिए ‘रिपब्लिकन पैंथर’ नामक एक राजनीतिक मोर्चे का गठन किया था। मराठी रंगमंच के क्षेत्र में भी सुधर ढवले काफी चर्चित थे।
पूरे 40 महीने तक उन्हें जेल में रखने और शारीरिक तथा मानसिक यातना देने के बाद मई 2014 में गोंडिया के सेशन कोर्ट ने उन्हें रिहा कर दिया क्योंकि उनके माओवादी होने का पुलिस के पास कोई भी प्रमाण मौजूद नहीं था।
इससे पहले 2007 में महाराष्ट्र के 40 वर्षीय बुद्धिजीवी अरुण फरेरा को नागपुर में पुलिस ने गिरफ्तार किया। उन पर आरोप था कि वह माओवादियों के साथ मिल कर सरकार विरोधी साजिश की योजना बना रहे थे। उनकी गिरफ्तारी पर भी महाराष्ट्र के बौद्धिक समुदाय में काफी हंगामा हुआ था लेकिन सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ। चार वर्ष से भी अधिक समय तक जेल में रखने के बाद 23 सितंबर, 2011 को उन्हें रिहा कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ पुलिस के पास कोई सबूत नहीं था। जिन दिनों वह नागपुर जेल में थे उन्होंने मानव अधिकार में दो वर्ष के ‘डिस्टेंस लर्निंग पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम’ के अंतर्गत भारत में राजनीतिक बंदियों की स्थिति पर एक थीसिस लिखी थी जिसमें उन्होंने लिखा कि ‘हाल के इतिहास में और खासतौर पर 9/11 की घटनाओं के बाद हमारे यहाँ देशभर में अनेक जनतांत्रिक और संघर्षशील लोगों को राज्य के दमन का मुकाबला करना पड़ा है। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने ‘आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध’ की घोषणा की और इसका अर्थ हमारे देश में जनआंदोलनों के खिलाफ युद्ध के रूप में लिया गया। सैकड़ों हजारों की संख्या में जनआंदोलनों से जुड़े लोगों को जेलों में डाल दिया गया, उन्हें तरह-तरह की यातनाएँ दी गयीं और फर्जी मुठभेड़ों में उनका सफाया कर दिया गया…राज्य ने अपने दमनकारी रवैये से असहमति की जनतांत्रिक गुँजाइश का दायरा लगातार संकुचित कर दिया।’
जनवरी 2008 में वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल झा को छत्तीसगढ़ की पुलिस देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया। पुलिस का मानना था कि शहरी क्षेत्र में माओवाद के विस्तार में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। उन्हें सात साल की सजा सुनायी गयी और इस वर्ष सितंबर 2014 में उनकी रिहाई हुई।
1990 के दशक में प्रफुल्ल झा रायपुर के ‘दैनिक भास्कर’ के संपादकीय विभाग में काम करते थे। उन्हें एक गाँधीवादी पत्रकार के रूप में जाना जाता था। इसमें कोई संदेह नहीं कि इलाके के कुछ वरिष्ठ माओवादी नेताओं से उनकी बातचीत होती रहती थी और माओवाद पर झा ने कुछ लेख भी लिखे थे। अदालत के पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वह किसी माओवादी संगठन से संबद्ध हैं। बावजूद इसके माओवाद के नाम पर सजा पाने वाले वे पहले पत्रकार हैं।
डॉ. विनायक सेन, प्रशांत राही और ‘दस्तक’ की संपादक पत्रकार सीमा आजाद के मामले से भी लोग भी परिचित हैं जिन्हें माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और कुछ समय तक जेल में रखने के बाद रिहा कर दिया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जी.एन. साईबाबा अभी भी नागपुर की जेल में पड़े हैं। वह शारीरिक रूप से अक्षम हैं और व्हील चेयर पर चलते हैं लेकिन जिन विचारों को वह मानते हैं उससे सत्ता को दहशत है।
ऊपर जिन लोगों का जिक्र किया गया है वे कुछ चर्चित मामले हैं लेकिन एक बहुत बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जो देश की विभिन्न जेलों में महज इसलिए वर्षों से पड़े हुए हैं क्योंकि उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधा की चिंता नहीं की और जनता के संघर्षों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ गये। खुद अरुण फरेरा ने 1993 में स्नातक करने के बाद बंबई के झोपड़-पट्टियों में काम करने वाले संगठन निवारा हक सुरक्षा समिति’ के साथ अपने को जोड लिया और उनके बीच सक्रिय तौर पर काम करने लगे। सुधीर ढवले की तरह अरुण भी 27 सितंबर, 2006 को भंडारा जिले के खैरलांजी गाँव में दलितों की हत्या से काफी क्षुब्ध थे। इन दोनों की कोशिश थी कि दलितों के बीच ऐसा नेतृत्व पैदा किया जा सके जो सत्ता के साथ किसी तरह का तालमेल न करे और दलितों को न्याय दिलाये। महाराष्ट्र के संदर्भ में देखें तो दलितों को सही अर्थों में जागरूक बनाने में जो लोग लगे हैं उन्हें सत्ता ने अपना निशाना बनाया। पुणे की सांस्कृतिक संस्था ‘कबीर कला मंच’ के कार्यकर्ताओं को अभी दो वर्ष पूर्व ही अनेक तरह की यातना के दौर से गुजरना पड़ा। इन संस्कृतिकर्मियों ने अपने कार्यक्रमों द्वारा जनता को जागरूक बनाने का काम किया लेकिन सरकार की निगाह में यह अपराध है। कबीर कलामंच की सक्रिय कार्यकर्ता शीतल साठे की गिरफ्तारी के विरोध में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता आनंद पटवर्द्धन ने महाराष्ट्र और राज्य से बाहर के प्रमुख बुद्धिजीवियों को लेकर ‘कबीर कलामंच डिफेंस कमेटी’ का गठन किया था। जेल से रिहा हुई शीतल साठे को अभी पिछले महीने मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज ने जाति व्यवस्था के अभिशाप पर बोलने के लिए आमंत्रित किया था। कॉलेज की तरफ से ‘मल्हार’ नामक एक सांस्कृतिक समारोह के अवसर पर इस सेमिनार का आयोजन किया गया था। लेकिन 14 अगस्त को जिस समय शीतल साठे उस सेमिनार में भाग लेने जा रही थीं, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और इससे जुड़े हिंदुत्ववादी संगठनों के कुछ अराजक तत्त्वों ने काफी हंगामा किया और मुंबई के पुलिस आयुक्त राकेश मारिया को लिखा कि वह सेंट जेवियर कॉलेज को कहें कि शीतल साठे को आमंत्रित न किया जाए। अंतत: शीतल साठे उस सेमिनार में नहीं जा सकीं।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र और जाने-माने युवा संस्कृतिकर्मी हेम मिश्रा ने नागपुर सेंट्रल जेल से जो पत्र भेजा है उससे जानकारी मिलती है कि गिरफ्तारी के दौरान उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने से पहले पुलिस ने काफी शारीरिक यातनाएँ दीं। उत्तराखंड के नीलकांत या अनिल चौडाकोटी या जीवन चंद को जब 2005 और 2007 में गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने भी इसी तरह का आरोप लगाया था। इन लोगों ने अपने विचारों को कभी छुपाया नहीं। जीवन चंद ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि ‘मैं और मेरा संगठन मार्क्स, लेनिन और माओ के विचार को एक सामाजिक विज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं लेकिन हथियार नहीं उठाते। जब हम शासन की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ मजदूरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों, को संगठित करने लगे तो प्रशासन ने माओवाद का हौवा खड़ा कर राजनैतिक कार्यकर्ताओं को डराया धमकाया और उनकी गिरफ्तारियाँ शुरू कीं ।’
अभी 23 मई, 2014 को रामगढ़ (उत्तराखंड) में राज्य सरकार द्वारा माओवाद के नाम पर विभिन्न प्रगतिशील व जनवादी संगठनों पर फर्जी मुकदमे लगाने के विरोध में कई प्रगतिशील जनवादी संगठनों ने ‘दमन विरोधी संघर्ष समिति’ के बैनर तले शहर में एक जुलूस निकाला और एक सभा की। जुलूस में बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल थीं। दरअसल उत्तराखंड के अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में चुनावों के दौरान माओवादियों के नाम से चुनाव बहिष्कार के पोस्टर लगे थे जिसके आरोप में पुलिस ने क्रांतिकारी जनवादी मंच (आरडीएफ) के जी.सी. आर्य तथा ‘उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी’ के कार्यकारिणी सदस्य दीवान सिंह बिष्ट तथा दो अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। आरडीएफ के जी.सी.आर्य उन दिनों रानीखेत में अपनी बहन का इलाज करा रहे थे और दीवान सिंह बिष्ट लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी पार्टी के लिए प्रचार में लगे थे। पुलिस ने उन पर मुकदमा लगा कर उन्हें जेल में डाल दिया लेकिन जेल भेजने से पूर्व इन्हें तरह-तरह की यंत्रणाएँ दीं। रामगढ़ में हुई इस सभा में वक्ताओं ने कहा कि ‘आज सरकारें पूरी तरह से अमीरों के साथ खड़े होकर गरीब जनता का उत्पीडऩ कर रही हैं। उन्हें माओवादी का आरोप लगा कर जेलों में डालने का काम कर रही हैं। मजदूर आंदोलन हो या अन्य आंदोलन, सभी में माओवादियों के सक्रिय होने के नाम पर उनको बदनाम किया जा रहा है।’ सभा में आम राय यह बनी कि राजकीय दमन के खिलाफ प्रगतिशील तथा जनवादी शक्तियों की एकता को आगे बढ़ाने का प्रयास तेज किया जाए।
इस समूचे प्रसंग में मुख्य धारा का कहे जाने वाले मीडिया की भूमिका अत्यंत घृणित है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार हो या भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार, कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में खड़े होकर इन्होंने हमेशा उन ताकतों का विरोध किया है जिनसे कॉरपोरेट हितों को खतरा दिखायी देता है। इन कॉरपोरेट घरानों ने न केवल राजनीति में बल्कि भारत के सुरक्षातंत्र में भी सेंध लगा दी है और इन्हें अपने मनमाफिक निर्देशित करना शुरू कर दिया है। देश के बड़े उद्योगपतियों की संस्था ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज’ (फिक्की) ने जब 2009 में ‘टॉस्क फोर्स रिपोर्ट ऑन नेशनल सिक्योरिटी एंड टेररिज्म’ प्रस्तुत किया और उसे आधार बना कर पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित संस्था बनाने का सुझाव दिया तो अखबारों में एक खामोशी छायी रही। फिक्की और एसोचैम जैसी उद्योगपतियों की संस्थाओं ने लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा के निजीकरण पर जोर दिया है जिसका अब बड़ी निष्ठा के साथ पालन करने में नरेंद्र मोदी की सरकार लगी हुई है। उत्तराखंड की जेलों में बंद युवकों ने 2006 में ही जेल से भेजे गये एक पत्र में पत्रकारों से अपील की थी कि वे अपने दायित्व का पालन करें। उन्होंने पत्रकारों को लिखा था कि ‘परिवर्तन की लड़ाई तब तक नहीं लड़ी जा सकती जब तक मीडिया का सहयोग व सहानुभूति हासिल न हो। आपकी मजबूरी है प्रशासन का पक्ष छापना परंतु हमारा पक्ष छापना भी तो आपका ही दायित्व है। हमारे बारे में समाचार पत्रों में न जाने क्या-क्या ऊलजलूल छापा गया है परंतु एक भी पत्रकार ने जेल में हमारी हालत के बारे में या हमारे घर वालों के बारे में नहीं छापा। ऐसा तो तब भी नहीं था जब भगत सिंह को आतंकवादी कह कर जेल में डाल दिया गया था। उन्हें अखबार व साहित्य पढऩे का अधिकार तो दिया गया था। क्या राजनैतिक कैदी का दर्जा सिर्फ शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, राजा भैया, डी.पी. यादव या मुख्तार अंसारी जैसों के लिए आरक्षित है? तराई भावर का यह हिस्सा-जहाँ हमें गिरफ्तार दिखाया गया-बड़े जमींदारों, भ्रष्ट नेताओं, भू-माफियाओं, पुलिस व नौकरशाही के गठजोड़ के लिए कुख्यात है। वह दिन बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा जब मीडिया भी इस गठजोड़ से हाथ मिला लेगा। ‘
’समकालीन तीसरी दुनिया’, नवंबर-दिसंबर 2014