आनन्द स्वरूप वर्मा, पत्रकारिता का अंधा युग-19 सामंतवाद का सबसे ज्यादा प्रभाव हिंदी क्षेत्र में दिखता है और सांस्कृतिक दरिद्रता भी नजर आती है। जिसे हम हिंदी पट्टी कहते हैं उसकी उस तरह से कोई सांस्कृतिक राजधानी नहीं है जैसे तमिल की मद्रास एवं बांग्ला की कोलकाता है, फिर भी 1947 के बाद से भारतीय राजनीति में हिंदी पट्टी का जो वर्चस्व रहा उसकी वजह से भी यहाँ की राजनीति में एक खास तरह की उद्दंडता आ गयी, जिसके कारण अन्य क्षेत्र के राजनीतिज्ञों को कमतर करके आँकने की प्रवृत्ति पैदा हुई। आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के नाते हिंदी ने अन्य भाषाओं के ऊपर जब स्वयं को थोपने की कोशिश की तो उसकी वजह से भी बहुत सारी समस्याएँ पैदा हुईं। जब मैं सांस्कृतिक दरिद्रता की बात करता हूँ तो उसमें दो चीजें निहित हैं। एक तो इस क्षेत्र के लोगों का औपनिवेशिक मानसिकता से सबसे ज्यादा ग्रस्त होना और इसी मानसिकता के कारण अन्य भाषा भाषियों को अपना उपनिवेश मानना। राजनीतिक शुचिता तो दूर की बात है, इस मानसिकता ने देश को तोडऩे का भी काम किया है। जिस विविधता में एकता की बात को लेकर हम लोग गर्व करते थे उसे इस मानसिकता से काफी चोट पहुँची। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हिंदी पट्टी में उस तरह का सामाजिक सुधार आंदोलन नहीं शुरू हुआ जो लोगों को गहराई तक प्रभावित कर सके। बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र अथवा महाराष्ट्र में इस तरह के आंदोलन देखने में आए। बंगाल में राजा राममोहन राय हों या तमिल में रामास्वामी हों या महाराष्ट्र के महात्मा फुले, इनके आंदोलनों ने सामाजिक विषमता के प्रति कम से कम लोगों को सचेत करने में बड़ी भूमिका निभायी। हिंदी पट्टी में कबीर के बाद ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं दिखायी देता जिसने सामंती मूल्यों पर चोट पहुँचाने में सांस्कृतिक धरातल पर काम किया हो।
यही वजह है कि इस पट्टी में अनेक मौकों पर सामंतवाद विरोधी किसान संघर्ष हुए लेकिन सांस्कृतिक धरातल पर कुछ न होने की वजह से ये बहुत दूर तक नहीं चल सके। सत्ता के शिखर पर हिंदी पट्टी के वर्चस्व ने यहाँ के राजनीतिज्ञों को (बड़े से लेकर छुटभैये तक) लाभकारी स्थिति में रखा। इधर पिछले 20-30 वर्षों में जो सामाजिक अध:पतन की स्थिति देखने में आयी, वह अन्य क्षेत्रों की तुलना में हिंदी पट्टी में कई गुना ज्यादा थी। विभिन्न राज्यों के मुकाबले इस बेल्ट में सांप्रदायिकता, दलित उत्पीडऩ, महिलाओं के प्रति शर्मनाक रवैया और राजनीति में माफिया तत्त्वों का प्रवेश अपेक्षाकृत कई गुना ज्यादा देखने को मिलता है। जाहिर है ऐसी स्थिति में राजनीतिक शुचिता सबसे ज्यादा गायब मिली। इन स्थितियों को और ज्यादा भयावह बनाने में हिंदी क्षेत्र के अखबारों की भूमिका बड़ी घातक रही है। अन्य क्षेत्रों की तुलना में अगर हिंदी क्षेत्र ज्यादा बदहाली और दरिद्रता की स्थिति में दिखायी देता है तो उसके मूल में भी यहाँ सामंती व्यवस्था का मजबूत आधार रहा है। भूमि सुधार कार्यक्रम लागू न होने से जो दुष्परिणाम अन्य राज्यों में दिखायी देते हैं उसके मुकाबले हिंदी पट्टी में इसका कई गुना ज्यादा घातक रूप मौजूद है। यह सवाल सीधे सीधे देश की राजनीतिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। मौजूदा स्थिति में हम जिस तरह लगातार अपनी आर्थिक नीति में विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भुलावे में लग गये, उसी का नतीजा है कि आज भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ध्यान रहे कि किसानों के आत्महत्या की घटनाएँ आंध्र प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भी हुई हैं जो समृद्धि के मामले में हिंदी पट्टी के मुकाबले काफी आगे थे। इसलिए आर्थिक विकास का मामला सीधे-सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व की नीतियों से जुड़ा हुआ है। सरकार द्वारा शुरू की गयी जनहितकारी योजनाओं का असर अगर आम जनता तक नहीं पहुंच पाता है तो इसके लिए भी तंत्र जिम्मेदार है जिसके माध्यम से उस लाभ को जनता
तक पहुँचाना है। ऊपर बताये गये कारणों से हिंदी पट्टी में यह तंत्र और राज्यों के मुकाबले ज्यादा मजबूत तथा माफिया तत्त्वों की गिरफ्त में है। इसलिए यहाँ यह समस्या काफी गंभीर है पर कुल मिला कर यह सवाल सीधे तौर पर देश के नेतृत्व से जुड़ा है- खास कर भारत जैसे देश में, जहाँ राज्य एक संघ के अधीन है। सबसे पहले इस सामाजिक पिछडेपन से निजात पाना होगा। यहाँ संस्कृति की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि साम्राज्यवाद अथवा उपनिवेशवाद अपने को स्थापित करने के लिए संस्कृति को प्रमुख हथियार बनाता है। वह सबसे पहले गुलाम देश की संस्कृति पर प्रहार करता है। गुलाम देश की जनता के अंदर एक ऐसा भाव पैदा करता है जिसमें उसे महसूस हो कि शासकों की संस्कृति उनकी संस्कृति से ज्यादा श्रेष्ठ है। इसके फलस्वरूप शासकों की भाषा, उनका साहित्य उनके रीति-रिवाज अपनाने में शासित देश के लोग गर्व का अनुभव करने लगते हैं। इन्हीं स्थितियों को देख कर गिनी बिसाऊ (अफ्रीका) के प्रमुख बुद्धिजीवी अमिल्कर कबराल ने कहा था कि मुक्तियुद्ध एक सांस्कृतिक कर्म है। इसलिए मैं कहता हूँ कि सामाजिक पिछड़ेपन से निजात दिलाने की मुख्य जिम्मेदारी संस्कृतिकर्मियों की है जो जनसंस्कृति को विकसित करने के लिए वैसे ही काम करें जैसे कोई मुक्तियोद्धा करता है। अयोध्या का मामला हो या सांप्रदायिकता का सवाल, ये सारे प्रश्न मूलत: संस्कृति से जुड़े हुए हैं। अगर सांस्कृतिक धरातल पर हम चीजों को ठीक कर लें तो जनपक्षीय राजनीति से जुड़े लोगों का काम आसान हो जाएगा और पूँजीवादी तथा जनविरोधी राजनीति पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
हमारे यहाँ संस्कृति को साहित्यिक सर्जनात्मक लेखन यानी कविता, कहानी, उपन्यास आदि तक सीमित कर दिया गया है। आमतौर पर हमारे यहाँ के साहित्यकारों ने समाजशास्त्र में कोई रुचि नहीं ली जबकि जर्मन भाषा के प्रमुख कवि बर्तोल्त ब्रेख्त अथवा स्पेनी भाषा के कवि पाब्लो नेरूदा जैसे साहित्यकारों की मान्यता थी कि एक साहित्यकार को समाजशास्त्र का अध्येता होना चाहिए। हमारे यहाँ कवि नागार्जुन ने 1974-75 में खुद को बिहार के जनआंदोलन से पूरी तरह जोड़ कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया लेकिन हिंदी में ऐसे साहित्यकार कितने हैं? बांग्ला, तेलुगु या मराठी में ऐसे बहुत सारे साहित्यकार मिल जाएँगे जिन्होंने खुद को उन मुद्दों से घनिष्ठ रूप से जोड़ा जिनसे सामाजिक तनाव पैदा होते हैं। पिछले दस वर्षों के अखबार देख जाइए। हिंदीभाषी क्षेत्र में सबसे ज्यादा दलित हत्याएँ हुई हैं, महिलाओं पर उत्पीडऩ बढ़ा है, डायन के नाम पर महिलाओं की हत्याएँ हुई हैं, उन्हें सरेआम नंगा करके घुमाया गया है, लेकिन ये सवाल हमारे कितने साहित्यकारों के सरोकार बन सके। आप पिछले एक वर्ष की साहित्यिक पत्रिकाएँ उठा लीजिए- ‘हंस’ हो, ‘वर्तमान साहित्य’ या ‘कथादेश’ – इन पत्रिकाओं ने पूरे साल उन मुद्दों पर बहस चलाने में बिताया जिनका सरोकार सामाजिक विसंगतियों से बिल्कुल नहीं था। इनके संपादक चटखारे ले-लेकर एक दूसरे की टाँग खींचने में लगे रहे। ‘वर्तमान साहित्य’ में ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव ने महिलाओं पर एक लेख लिखा और उस लेख पर पूरे साल इन पत्रिकाओं में जो प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं उनमें स्वस्थ बहस की बजाय व्यक्तिगत आग्रहों-दुराग्रहों का ही बोलबाला था। इस दृष्टि से देखें तो हिंदी का साहित्यिक परिदृश्य बहुत बेचैन करने वाला है। यही वजह है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े बुद्धिजीवियों के लिए हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएँ एक वर्जित क्षेत्र बन गयी हैं।
हिंदी प्रदेशों को आमतौर पर काऊबेल्ट कहते हैं, जिसे प्रभाष जोशी ने प्राय: ‘गोबर पट्टी’ कहा है। यहाँ के बुद्धिजीवियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे एक बहुत बड़ी भाषा से संबद्ध होने के कारण आत्ममुग्धता के शिकार हैं। यहाँ साहित्यकार अथवा पत्रकार दोनों के अंदर एक खास तरह की अकर्मण्यता एवं उद्दंडता दोनों दिखायी देती है, उनको लगता है कि वे शासक वर्ग के अंग हैं और इसलिए वे सरकार के संरक्षण की भी अपेक्षा करते हैं। सामाजिक आंदोलनों के साथ जुडऩा उन्हें अपमानजनक लगता है। वे समझते हैं कि यह उनका काम नहीं है। यही वजह है कि उनकी रचनाएँ भी न तो समाज को उद्वेलित कर पाती हैं और न किसी सामाजिक आंदोलन को बढ़ाने में योगदान कर पाती हैं। वे यदा-कदा अपनी इस स्थिति पर कोफ्त भी करते हैं लेकिन इससे बाहर निकलने का कोई सचेत प्रयास नहीं करते। उन्हें इस बात का एहसास भी नहीं है कि एक विशाल भाषा के बुद्धिजीवी होने के नाते उन पर औरों के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदारी है। हिंदी के साहित्यिक क्षेत्र में जो बहसें चलती हैं वे भी साहित्य के दायरे के बाहर नहीं निकल पातीं। वे आम आदमी की बातें भी करेंगे लेकिन आम आदमी से जुड़े आंदोलनों से एक दूरी भी बनाये रखेंगे। अगर यह स्थिति अधिक समय तक बनी रही तो न तो हिंदी साहित्य का कोई स्थान रहेगा और न हिंदी के बुद्धिजीवियों का। इस संदर्भ में साहित्य अकादमी पुरस्कार वितरण के अवसर पर दिया गया मंगलेश डबराल का वक्तव्य उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने हिंदी के कवि होने के नाते उन स्थितियों पर शर्मिंदगी महसूस की थी जिनमें सामाजिक सरोकार सिरे से गायब होते जा रहे हैं।
हिंदी में अब से कुछ वर्ष पूर्व तक जो पुस्तकें छपती थीं उनमें आमतौर पर एक संस्करण ग्यारह सौ प्रतियों का होता था। इसे प्रकाशक एक साल अथवा दो साल में बेच पाता था। अब यह संख्या घट कर छह सौ हो गयी है। यह साहित्यिक कृतियों की स्थिति है। दस करोड़ से भी ज्यादा लोगों के बीच प्रचलित भाषा के प्रकाशन की दुर्दशा का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है। बांग्ला, तेलुगु, तमिल या मराठी में यह स्थिति नहीं है। इन भाषाओं में अभी भी पहला संस्करण पाँच हजार के आसपास छपता है और बिक जाता है। यहाँ तक कि नेपाल में जहाँ साक्षरता दर बहुत कम है, मोदनाथ प्रश्रित अथवा अपराजिता के काव्य संकलन दस-दस हजार बिकते हैं। इन सभी भाषाओं में हिंदी के विपरीत गैर साहित्यिक अर्थात् सामाजिक विषयों से संबंधित पुस्तकें खूब छपती हैं और बिकती हैं। बांग्ला में तो पूजा के अवसर पर विभिन्न पत्रिकाओं के जो विशेषांक प्रकाशित होते हैं, उनके विज्ञापन होर्डिंग के रूप में सड़कों पर देखे जा सकते हैं और पाठकों को महीनों पहले से अपने लिए प्रतियाँ सुरक्षित करानी पडती हैं। हिंदी में किसी भी पत्रिका के साथ ऐसी स्थिति नहीं है।
हिंदी का प्रकाशन भी मुख्य रूप से कहानियों, कविताओं, उपन्यास आदि तक सीमित है। पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक विषयों पर लिखी गयी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और पाठकों तक पहुँची भी हैं, पर अन्य भाषाओं की तुलना में इनकी संख्या और इनका प्रसार नगण्य है। आज भी हिंदी का लेखक लेखन के बल पर अपनी जीविका नहीं चला सकता। हिंदी में सबसे पहले समाजशास्त्र से जुड़े विषयों पर मैकमिलन ने योजनाबद्ध ढंग से प्रकाशन शुरू किया। इन पुस्तकों की बिक्री काफी उत्साहजनक रही लेकिन वह प्रकाशन संस्थान मूलत: अँग्रेजी से जुड़ा था और वहाँ ऊँचे पदों पर बैठे लोगों को महसूस हुआ कि इससे अँग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती मिल रही है लिहाजा हिंदी प्रकाशन बंद कर दिया गया। मैकमिलन में इसकी शुरुआत के पीछे डॉ. श्याम बिहारी राय थे जिन्होंने मैकमिलन बंद होने के लगभग 20 वर्षों बाद अपने इस प्रयोग को ग्रंथ शिल्पी के माध्यम से शुरू किया। हिंदी में ऐसे प्रतिबद्ध प्रकाशन दुर्लभ हैं।
हिंदी के संचार माध्यमों में मुख्य रूप से दो माध्यम हैं- प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। जहाँ तक प्रिंट मीडिया की बात है 1977 के बाद से हिंदी की पत्रकारिता में जबर्दस्त बदलाव आया है। 1977 में इमरजेंसी समाप्त हुई थी और सेंसरशिप से मुक्त होकर पत्र पत्रिकाएँ निकलनी शुरू हुईं। समूचे राजनीतिक माहौल में गुणात्मक परिवर्तन आ गया था। लोग इसे दूसरी आजादी समझने लगे थे। 1977 में ही ‘रविवार’ का पहला अंक निकला और इसने पत्रकारिता को एक नयी दिशा दी। ‘माया’ जैसी पत्रिकाओं ने भी खुद को समाचार, विचार की पत्रिका का रूप दिया। इसी दौर में खोजपूर्ण पत्रकारिता को प्रतिष्ठा मिली। आपातकाल की ज्यादतियों से संबंधित अच्छी रपटें सामने आयीं। उन दिनों जस्टिस शाह के नेतृत्व में गठित आयोग इमरजेंसी की ज्यादतियों की जाँच कर रहा था और इसकी कार्यवाही का विवरण हर रोज अखबारों में छपता था। इन सारी चीजों की वजह पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 1977 से 1980 तक पत्रकारिता का बहुत अच्छा युग देखने को मिला। 1980 में श्रीमती इंदिरा गाँधी दुबारा सत्ता में आईं और सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने सांप्रदायिकता की बैसाखी का सहारा लिया। यही वह दौर था जब राजनीति में अपराधियों और माफिया तत्त्वों को जगह मिलने लगी। जिस प्रक्रिया की शुरुआत श्रीमती गाँधी ने की थी उसका चरम रूप आज देखा जा सकता है। आज स्थिति यह है कि वामपंथी दलों को छोड़ कर कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसी नहीं है जिसमें माफिया न हों। इस राजनीतिक अध:पतन का असर बड़ी तेजी से पत्रकारिता पर भी पड़ा और 1983-84 आते-आते हाजी मस्तान जैसे तस्कर और सूर्यदेव सिंह जैसे कोयला माफिया ‘रविवार’ जैसी पत्रिका तक के आवरण पृष्ठ पर स्थान पाने लगे। खोजपूर्ण पत्रकारिता के नाम पर राजनीतिज्ञों की बेडरूम स्टोरी और माफिया गिरोहों के पराक्रम की गाथाएँ छपने लगीं।
इस बीच एक और बात देखने में आयी। पाठकों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि होने के कारण अँग्रेजी के मुकाबले उपेक्षित पड़ी हिंदी पत्रकारिता के महत्त्व को राजनेताओं ने बड़ी गहराई से महसूस किया और उन्हें लगा कि जनमत बनाने में अखबारों की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। हिंदी पत्रकारिता को अब ग्लैमर मिल गया था और इस ग्लैमर की तलाश में युवा पत्रकारों की एक बहुत बड़ी भीड़ ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। इन स्थितियों ने सामाजिक सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता और जनपक्षीय पत्रकारों को हाशिये पर डाल दिया। प्रसंगवश बता दूँ कि 1977 में लालकृष्ण आडवाणी सूचना मंत्री बने थे और उनके प्रयास से तमाम अखबारों तथा समाचार एजेंसियों में संघ की विचारधारा से जुड़े लोगों की घुसपैठ करायी गयी।
जो लोग उस समय एप्रेंटिस के रूप में भर्ती हुए थे वे 1990 तक काफी मजबूत स्थिति में पहुँच गये थे। 1990 में अयोध्या में कारसेवा के दौरान हिंदी अखबारों ने जो घृणित भूमिका निभायी थी उसमें इन तत्त्वों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। एक तरफ तो जनपक्षीय पत्रकारिता संकट में पड़ गयी और दूसरी तरफ प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के विकास का रूप बदल दिया। इनकी पृष्ठ संख्या बढ़ गयी, रंगीन छपाई होने लगी और एक-एक अखबार के दस-पंद्रह संस्करण निकलने लगे। इससे एक नयी समस्या खबरों के स्थानीयकरण की पैदा हुई। अब बरेली का पाठक मुरादाबाद की खबरों से और कानपुर का पाठक लखनऊ की खबरों से वंचित हो गया। लोगों को खबरों से काटने की यह एक सुनियोजित साजिश थी। जनसंघर्षों की खबरें अव्वल तो छपती ही नहीं थी और अगर छप भी जाती थीं तो स्थानीय पृष्ठों तक ही सीमित रहती थीं। यह स्थिति आज भी है। हमने प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के विकास को पत्रकारिता के विकास के रूप में प्रचारित किया जबकि स्थिति यह थी कि पहले के मुकाबले लोग खबरों से वंचित होते गये। ऐसी स्थिति में वैकल्पिक मीडिया का अर्थ एक वैकल्पिक सूचना व्यवस्था विकसित करना रह गया है।
हम देख रहे हैं कि सत्ताधारी वर्ग एक हथियार के रूप में सूचना का इस्तेमाल कर रहा है। लोगों को सूचनाओं से वंचित रख कर मिसइन्फार्मेशन के हथियार का इस्तेमाल करता है। उसकी इस साजिश को हम जनता को ज्यादा से ज्यादा सूचनाओं से लैस करके विफल कर सकते हैं। वैकल्पिक मीडिया विकसित करने में बेशक मीडियाकर्मियों की प्रमुख भूमिका होगी पर इसमें उन सभी लोगों को शामिल करना जरूरी होगा जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा विभिन्न क्षेत्रों में किसी विकल्प के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ‘रमण कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित ‘