फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) आज-कल हरियाणा काडर के सेवानिवृत्त 89 वर्षीय आईपीएस अधिकारी करतार सिंह तोमर का एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है। वीडियो में भगवा वेशधारी तोमर अपना मौजूदा पता मानसम रेजिडेंसी बंगलुरू न केवल बता रहे हैं बल्कि एक कमरे का वह लग्जरी फ्लैट भी दिखा रहे हैं जिसमें वे तमाम आधुनिक सुख-सुविधाओं के साथ-साथ रह रहे हैं। वैसे उनकी एक आलीशान कोठी पंचकूला के सेक्टर सात में भी है। जानकारों के मुताबिक, जायदाद व अन्य पारिवारिक झगड़ों से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अपना यह नया ठिकाना बनाया है। जानकार बताते हैं कि 2013 में अपनी पुत्रवधु से पिटने के बाद यह साहब पंचकूला केे तत्कालीन पुलिस कमिश्रर की सिफारिश ढूंढते घूम रहे थे! तब किसी सयाने अफसर ने इन्हें समझाया था कि इन झगड़ों को छोड़ कर कहीं दूर दराज जा बसो तो सुखी रहोगे, वरना अभी बहू से पिटे हो, वह बलात्कार का मुकदमा भी दर्ज करा सकती है जो बहुत भारी पड़ेगा।
बहुत कम लोग जानते होंगे कि फरीदाबाद की गुडईयर टायर कम्पनी की मज़दूर यूनियन के संस्थापक भी यही करतार सिंह तोमर रह चुके हैं। बात 1961 की है जब करतार सिंह थाना बल्लबगढ़ में बतौर एएसआई भर्ती होकर आए थे। नई-नई थानेदारी व नया-नया जवानी का जोश तो जरूर उनमें था लेकिन काम-काज करने में उनकी कोई रुचि नहीं होती थी। ऐसे में उनकी गिनती थाने के अमले में तो जरूर थी लेकिन उनकी उपयोगिता कुछ नहीं समझी जाती थी। अपनी इस उपेक्षा से दुखी करतार सिंह ने तत्कालीन एसएचओ से सिफारिश लगवाई कि तफ्तीश का काम तो वे एएसआई भाटिया को देते हैं और गश्त करे करतार सिंह, जाट होने का क्या फायदा हुआ। जाट एसएचओ ने जवाब दिया कि वह तो गश्त के भी लायक नहीं है, जाट होने के नाते ही उसे झेल रहा हूँ।
शायद इसी जुमले से आहत एएसआई करतार सिंह ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और गुडईयर कम्पनी में बतौर मज़दूर भर्ती हो गए। इसके बाद उन्होंने, मौजूूदा थाना शहर वाली जगह पर खाली पड़े मैदान में वॉलीबॉल खेलने के लिए दो खंभे डालकर नेट लगा दिया। हर शाम ड्यूटी के बाद करतार सिंह यहां कुछ अन्य लड़कों के साथ वॉलीबॉल खेलने लगे। इन खिलाडिय़ों में यदा-कदा थाने के कुछ सिपाही भी खेलने आ जाते थे। करतार सिंह उन्हें कहते कि क्या रखा है पुलिस की नौकरी में, 60 रुपल्ली के लिए 24 घंटे की गुलामी करते हो, आओ तुम्हें भी गुडईयर में भर्ती करा दूं। उस वक्त पुलिस के सिपाही को जहां 60 रुपए मासिक मिलते थे वहीं गुडईयर में आठ घंटे की ड्यूटी करने पर मासिक 150-175 रुपये तक मिल जाया करते थे। इसके बावजूद कोई भी सिपाही करतार सिंह की बातों में नहीं आया, वे जवाब में कहते कि हम तो 60 रुपए में ही गुजारा कर लेंगे।
उधर करतार सिंह को भी आकाश से धरती पर उतरने जैसा अनुभव होने लगा। जब वह थानेदार की वर्दी पहन कर कभी किसी काम से गुडईयर में आता था तो सभी सिक्योरिटी गार्ड उनके लिए बड़ा गेट खोल कर सलाम करते थे और अब मज़दूर बने करतार सिंह को छोटे गेट से साइकिल लेकर गुजरना पड़ता था, सलाम की तो बात ही गई। लगभग यही स्थिति फैक्टरी के भीतर काम करते वक्त सामने आई, जो सुपरवपाइजर व मैनेजर आदि कभी थानेदार करतार सिंह को सलाम किया करते थे अब उसको न केवल काम बताने लगे थे बल्कि जरूरत पडऩे पर धमकाते भी थे। हाल में आए इस भयंकर परिवर्तन ने करतार सिंह के दिलो-दिमाग पर भारी असर किया, उनके मन में हालात के प्रति विद्रोह की आग प्रज्वलित हो उठी। इसके चलते उन्होंने एक दिन अपने कार्यस्थल पर ही एक मेज पर खड़े होकर आसपास के तमाम मज़दूरों को एकत्र करके कम्पनी के विरुद्ध अच्छी-खासी नारेबाजी करते हुए गुडईयर इम्पलाई यूनियन गठित करने की घोषणा कर दी। जाहिर है इसके बाद कम्पनी ने उन्हें गेट बाहर कर दिया और यूनियन अभी इतनी सबल हुई नहीं थी कि कम्पनी से लड़ सकती।
गुडईयर से निकाले गए करतार सिंह के सामने बेरोजगारी का बड़ा संकट आ खड़ा हुआ। ऐसे में काम आए उनके ससुर चौधरी पीरू सिंह, जो रोहतक के एक बड़े ट्रांसपोर्टर होने के साथ-साथ बा-रसूख राजनैतिक व्यक्ति थे। उनका रसूख तत्कालीन मुख्यमंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरों से बहुत बढिय़ा था। इसी रसूख के बलबूते करतार सिंह को पुन: उसी पुलिस महकमे में बहाली मिल गई जिसको वे वॉलीबॉल खेलते वक्त गालियां दिया करते थे और सिपाहियों को भी 60 रुपये की एवज में गुलामी करने से मुक्ति दिलाने की बात किया करते थे।
पुन: महकमे में आने के बाद करतार सिंह ने नौकरी करनी अच्छी तरह सीख ली थी। उन्होंने यह भी समझ लिया था कि अच्छी नौकरी के लिए सही काम करना कोई जरुरी नहीं होता, इसके लिए जरुरी होता है अपने आकाओं को खुश रखना, चाहे वे महकमे के हों अथवा राजनेता। अपनी इसी समझ के बलबूते वे पदोन्नतियां पाते चले गए। चौटालों के राज में तो वे पूर्णतया चौटालामयी हो गए थे। उनके परिवार का तो कुत्ता- पिल्ला भी करतार सिंह के लिए भगवान से कम नहीं होता था। बताने की जरूरत नहीं है कि चौटालों द्वारा किस कदर पुलिस का दुरुपयोग करके जनता का उत्पीडऩ किया जाता था। फरवरी 1990 में हुए महम कांड के दौरान करतार सिंह एसपी भिवानी होते हुए भी वहां की कमान सम्भाले हुए थे। इसके फलस्वरुप वहां जो खून बहा वह इतिहास के काले पन्ने में दर्ज है।
करतार सिंह से इस संवाददाता की आखिरी मुलाकात 2010 के आसपास हुई थी। उस वक्त वे पंचकूला से फरीदाबाद एक साहूकार से कुछ सौदेबाजी करने आए थे। दरअसल उन्होंने दिल्ली की एक महिला को 70-80 लाख रुपये ब्याज पर देकर कागजों में उसका कुछ साजो-सामान गिरवी रख लिया था। उस महिला ने वही साजो-सामान यहां के साहूकार के पास गिरवी रख कर 70-80 लाख रुपये उधार ले लिए थे। यह एक इत्तेफाक था कि जब करतार सिंह उस साहूकार से मिलने आए तो यह संवाददाता भी मौके पर मौजूद था। करतार सिंह ने साहूकार को धमकाया कि जो सामान उन्होंने गिरवी रखा हुआ है उसे वे कैसे गिरवी रख सकते हैं? इस मामले में साहूकार को जेल जाना पड़ सकता है। लेकिन साहूकार ने इसकी कोई परवाह न करते हुए कहा कि जो भी होगा देखा जाएगा। इसके बाद उन्होंने इस संवाददाता को अलग से ले जाकर साहूकार को समझाने की ताकीद की। इस तरह तौमर का यह वसूली अभियान टांय-टांय फिस्स हो गया।