आनन्द स्वरूप वर्मा (हिंदी पत्रकारिता : संदर्भ प्रभाष जोशी)
इसमें कोई शक नहीं कि अबसे लगभग चार वर्ष पूर्व ‘जनसत्ता’ के प्रकाशन ने हिंदी पत्रकारिता में एक क्रांति का सूत्रपात किया। लंबी प्रतीक्षा के बाद 17 नवंबर, 1983 को प्रभाष जोशी के संपादन में ‘जनसत्ता’ के पहले अंक के बाजार में आते ही पाठकों ने इसे हाथों-हाथ लिया। इमरजेंसी के दिनों में ही ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने सरकार विरोधी अखबार के रूप में जनता के बीच अपना सिक्का जमा लिया था और हिंदी का प्रबुद्ध पाठक यह सोच कर मन मसोस लेता था कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के टक्कर का कोई हिंदी अखबार नहीं है। हिंदी पाठकों के लिए प्रभाष जोशी का नाम बहुत परिचित नहीं था-वह कुछ समय तक प्रकाशित ‘प्रजानीति’ साप्ताहिक के संपादक रह चुके थे-पर ‘जनसत्ता’ एक्सप्रेस समूह से निकल रहा है, इतना ही लोगों के लिए काफी था।
प्रभाष जोशी ने उप संपादकों और रिपोर्टरों की टीम में एकदम युवा पत्रकारों को शामिल किया और वरिष्ठ पदों पर बनवारी, मंगलेश डबराल, सतीश झा आदि को लिया। प्रभाष जोशी के मुकाबले बनवारी और मंगलेश डबराल के नामों से हिंदी पाठक ज्यादा परिचित थे। रघुवीर सहाय के संपादन काल में ‘दिनमान’ से जुड़े बनवारी ने वर्षों तक गंभीर और विचारोत्तेजक लेखों और टिप्पणियों से पाठकों के बीच अपनी साख बना ली थी। मंगलेश डबराल हिंदी के प्रगतिशील वामपंथी कवि होने के साथ कई अखबारों और पत्रिकाओं के जरिये अपनी संपादन प्रतिभा दिखा चुके थे और इन्हें भी पाठकों का भरपूर विश्वास प्राप्त था। बेशक, हिंदी की अखबारी दुनिया के लिए सतीश झा का नाम बिल्कुल नया था पर अँग्रेजी के ‘फाइनेन्सियल एक्सप्रेस’ को छोड़ कर हिंदी पत्रकारिता में पदार्पण करने की खबर ने उन्हें अनायास ही पाठकों के लिए स्वीकार्य बना दिया था। बाद के दिनों में आर्थिक मामलों पर लिखे उनके लेखों को पढ़ कर सबने महसूस किया कि जोशी जी का चुनाव सही ही था। यहाँ यह याद दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा कि 1980 के दशक की शुरुआत जनता पार्टी की सरकार के प्रति आम जनता के मोहभंग तथा सत्ता में श्रीमती इंदिरा गाँधी की पुनर्वापसी से हुई थी। 1977 में अपनी पराजय के बाद संन्यास लेने के लिए आतुर इंदिरा गाँधी को नयी जिंदगी मिली थी जिसने सत्ता से लिपटे रहने की उनकी लालसा को अत्यंत पाशविक रूप दे दिया था। वह अपने छोटे पुत्र संजय गाँधी के लंपट दोस्तों को अपने इर्द-गिर्द तरजीह देने लगी थीं और दक्षिण भारत के अनेक राज्यों, उत्तर पूर्व तथा पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा एवं पंजाब में अपनी पार्टी के पिट जाने का दर्द भूलने के लिए उत्तर भारत पर समूचा ध्यान केंद्रित कर रहीं थीं। यहाँ अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी को निरस्त करने के लिए उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद के जिहादी के रूप में अपनी छवि बनानी शुरू कर दी थी। इंदिरा गाँधी मीडिया की ताकत को बखूबी पहचानती थीं। हिंदी पत्रकारिता में किस हद तक गैरकांग्रेसवाद के सिद्धांतकार लोहिया के अनुयायी घुसे हुए हैं, इसे उन्होंने इमरजेंसी से पूर्व जे.पी. आंदोलन के दौरान ही ताड़ लिया था। उन्हें यह भी पता था कि जनता पार्टी की सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्रालय भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के पास होने से 1977 से 1980 के बीच मीडिया में पुराने जनसंघियों ने भी अच्छी खासी घुसपैठ बना ली थी। मनचाही राजनीति करने के लिए मीडिया में प्रमुख पदों पर बैठे सरकार विरोधी तत्त्वों का सफाया जरूरी था।
आपको याद होगा कि 1980 से 1983 के बीच दिल्ली की अखबारी दुनिया में बड़े पैमाने पर संपादकों के निकालने-रखने का सिलसिला शुरू हुआ जिसने हिंदी पत्र पत्रिकाओं को भी प्रभावित किया। ‘दिनमान’ से रघुवीर सहाय को हटा कर कन्हैयालाल नंदन को संपादक बनाया गया। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ से मनोहर श्याम जोशी को हटा कर शीला अनझुनवाला को तथा ‘नवभारत टाइम्स’ से अज्ञेय को हटा कर राजेंद्र माथुर को संपादन का भार सौंपा गया। अखबार के मालिकों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव डाल कर सरकार को इस तरह का फेरबदल कराने में कामयाबी मिल गयी। इन घटनाओं से बुद्धिजीवियों और पाठकों के एक वर्ग को बड़ी हताशा और चिंता हुई। उनकी चिंता कितनी सही थी इसे आने वाले वर्षों में ‘दिनमान’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ ने लगातार गिरते स्तर के रूप में साबित कर दिया।
यहाँ इन बातों के उल्लेख का मकसद यह बताना है कि एक अच्छे अखबार के लिए, जो खासतौर से प्रतिपक्ष के विचारों को अभिव्यक्ति देता हो, वस्तुगत स्थितियाँ पूरी तरह तैयार थीं। प्रबुद्ध पाठक वर्ग से लेकर विरोधी दल के राजनीतिज्ञों तक सभी को ‘जनसत्ता’ जैसे अखबार का इंतजार था। ऐसे किसी अखबार से लोगों ने काफी अपेक्षाएँ पाल रखी थीं। प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’के पहले अंक में लिखा कि ”वह (अखबार) अपने पाठकों और दुनिया के बीच एक पुल होता है। संवाद का जरिया होता है, मंच होता है, वह पाठक की निजी आस्थाओं और उसकी सार्वजनिक निष्ठाओं को साधता है। वह अपने पाठकों की आशाओं, आकांक्षाओं और जीवन मूल्यों का आईना होता है। वह पाठकों से बनता है और पाठकों को बनाता है लेकिन यह अर्थवान प्रक्रिया बिना विश्वसनीयता के नहीं चल सकती। ‘जनसत्ता’ यह विश्वसनीयता कमाने के लिए निकल रहा है।” (पत्र, पाठकों के नाम 17 नवंबर, 1983)
इसमें कोई शक नहीं कि ‘जनसत्ता’ को पाठकों की यह विश्वसनीयता मिली। शानदार ले आउट और आधुनिक फोटो कंपोजिंग तथा खूबसूरत छपाई के साथ निकले इस अखबार की सफलता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि प्रकाशन शुरू होने के सात महीने में इसकी प्रसार संख्या एक लाख और तेरहवें महीने में दो लाख को पार कर गयी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में यह एक चमत्कारी घटना थी-कोई भी हिंदी दैनिक इतने कम समय में इतना बड़ा पाठक वर्ग तैयार नहीं कर पाया था।
सबकी खबर ले! सबको खबर दे! नारे के साथ शुरू इस अखबार ने हिंदी भाषी प्रदेशों से लेकर सुदूर दक्षिण के राज्यों तक की खबरों को प्राय: फीचर शैली में प्रकाशित किया। इन फीचरों में एक सरकार विरोधी तेवर रहता था, शाश्वत पुलिस जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद रहती थी, सरकारी नीतियों की बेलाग आलोचना मिलती थी, खास-खबर और खोज खबर जैसे स्तंभों के अंतर्गत प्रकाशित सामग्री को पढ़ते समय किसी साप्ताहिक में प्रकाशित रिपोर्ट के पढऩे का सुख मिलता था और यही वजह है कि तमाम इलाकों में एक दिन देर से पहुँचने के बावजूद ‘जनसत्ता’ का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे। प्रभाष जोशी भाग्यवादी हैं। क्रिकेट खिलाड़ी गावस्कर पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा भी था कि ‘भाग्य और अवसर के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता।’ भाग्य और अवसर ने प्रभाष जोशी को हिंदी पत्रकारिता के शिखर पर जब पहुँचा दिया और सरकार विरोधी (व्यवस्था विरोधी नहीं) तेवरों के कारण जब उन्होंने जनता का विश्वास जीत लिया तब उन्हें यह चिंता हुई कि हिंदी वालों को उनकी अस्मिता का एहसास कराया जाए। वैसे तो जून 1984 में ही पंजाब में ब्लू स्टार ऑपरेशन के बाद उन्होंने अपने उग्र हिंदूवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करके एक बहुत बड़े पाठक वर्ग को झटका दिया था, लेकिन शीघ्र ही उसका प्रतिकार भी उन्होंने कर लिया और ‘जनसत्ता’ अचानक पंजाबी सिखों में बेहद लोकप्रिय हो उठा। लेकिन वह अस्थायी था, मूलत: लोगों के दिलो दिमाग में प्रभाष जोशी जिस तरह हिंदू कट्टरता, सड़े-गले मूल्यों, पुरातनपंथी विचारों और मानव विरोधी बर्बर मान्यताओं का मीठा जहर घोल रहे थे, उसे पहचानने में भाषा की उनकी बाजीगरी बहुत बड़ी बाधा थी। लेकिन सितंबर 1987 में राजस्थान के दिवराला नामक गाँव में सती होने की घटना पर प्रकाशित संपादकीय ने लोगों को उद्वेलित कर दिया और सती प्रथा के पक्ष में लिखे इस संपादकीय के खिलाफ पाठकों और बुद्धि जीवियों का रोष उमड़ पड़ा। प्रभाष जोशी और बनवारी (जो 1 जून, 1987 से स्थानीय संपादक बना दिये गये हैं) को संभवत: पहली बार महसूस हुआ कि जिन पाठकों की प्रशंसा से वे अब तक इतरा रहे थे और अपनी सफलता की चकाचौंध से अंधे हो रहे थे, उनके प्रति उनकी जवाबदेही भी है, और वे पलट कर संपादकों को कठघरे में खड़ा भी कर सकते हैं।
सती कांड ने प्रभाष जोशी की पत्रकारिता के प्रशंसकों को अचानक सन्निपात की स्थिति में डाल दिया। अभी तीन वर्ष पूर्व तक जिस अखबार के साथ अपने को जुड़ा महसूस कर लोग गौरव का अनुभव कर रहे थे. उसके बहिष्कार की अपील पर वे हस्ताक्षर करने लगे। इस प्रकरण का सबसे दुखद पहलू यह है कि प्रभाष जोशी वा बनवारी में से किसी ने भी अपनी भूल स्वीकारते हुए 18 सितंबर के संपादकीय को वापस लेने की महानता नहीं दिखायी बल्कि एक निहायत अमानवीय मुद्दे को आत्मसम्मान का प्रश्न बना बैठे। ये दोनों संपादक इस बर्बर कृत्य के पक्ष में लिखे संपादकीय को केंद्र में रखते हुए निहायत घटिया स्तर का ध्रुवीकरण कराने में लग गये और अपने लिए सर्टिफिकेट जुटाने लगे। काफी कोशिश के बाद हिंदी कवि बाबा नागार्जुन से उन्हें अपने चरित्र का प्रमाण-पत्र भी मिल गया कि ”जनसत्ता ने जिस तरह अभिव्यक्ति की आजादी के तहत राजनीति, संस्कृति, साहित्य और समाज में जो भूमिका निभायी है, मैं उसे नहीं भूल सकता… ‘जनसत्ता’ से पहली बार सामाजिक सोच की व्याख्या करने में गलती हुई है और उसके विरोध में पूरे अखबार का बायकाट करना मूर्खता होगी। ‘जनसत्ता’ ने हमेशा अल्पसंख्यकों की बात प्रमुखता से रखी है और वैज्ञानिक सामाजिक सोच को आगे बढ़ाया है।” (नागार्जुन का इंटरव्यू, जनसत्ता, 7 अक्टूबर, 1987)
सती कांड पर ‘जनसत्ता’ के संपादकीय से व्यक्तिगत तौर पर मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ हालाँकि किसी पत्रकार के इस स्तर तक पतित हो जाने की मैंने कल्पना नहीं की थी। वैसे, जिसने भी ‘जनसत्ता’ के कांग्रेस विरोधी तेवर की आँच से दूर हट कर सामाजिक संदर्भों से जुड़े प्रश्नों पर प्रकाशित लेखों को ध्यान से पढ़ा होगा, उसने आसानी से उस प्रक्रिया को समझ लिया होगा जिसकी चरम परिणति सती प्रथा के समर्थन में लिखे संपादकीय में हुई थी।