राजसत्ता, माओवाद और पत्रकारिता (आनन्द स्वरूप वर्मा) जून 1998 में आडवाणी ने जब नक्सलवाद प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और पुलिस महानिरीक्षकों की बैठक बुलायी थी तो उसमें केवल चार राज्य शामिल थे। इसी मकसद से सितंबर 2005 में तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने नयी दिल्ली में जो बैठक बुलायी उसमें 13 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित किया गया था। पाटिल ने एक बार फिर जनवरी 2006 में इनकी बैठक बुलायी और अब नक्सलवाद या माओवाद प्रभावित राज्यों की संख्या 14 हो गयी थी। अब खबर मिली है कि सरकार 16 राज्यों में नक्सलवाद का प्रभाव बता रही है और चिंता जाहिर कर रही है। इस दृष्टि से देखें तो 1998 से 2008 की अवधि में अर्थात् दस वर्षों में नक्सलवाद प्रभावित राज्यों की संख्या 4 से बढ़ कर 16 हो गयी। देश में कुल 28 राज्य हैं। इनमें से उत्तर पूर्व के 7 राज्य, जिन्हें सेवन सिस्टर्स (असम, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश) कहा जाता है, कई दशकों से अशांत हैं। इनमें से मणिपुर, नगालैंड जैसे राज्य आर्म फोर्सेज स्पेशल पावर्स ऐक्ट 1950 द्वारा शासित किये जाते हैं और इन राज्यों में पिछले 59 वर्षों से एक तरह से सैनिक शासन है। इसके अलावा एक अन्य राज्य जम्मू-कश्मीर शाश्वत रूप से अशांत बना हुआ है। अब इन सभी राज्यों को जोड़ें तो यह संख्या 24 होती है। तो क्या यह माना जाए कि भारत सरकार 28 राज्यों में से केवल 4 राज्यों में आराम से शासन कर सकती है? अगर ऐसा है तो सचमुच बहुत चिंता की बात है। लेकिन क्या ऐसा है? इसका सीधा जवाब है नहीं। इस ‘नहीं’ के साथ यह बात भी ध्यान में आती है कि सरकार आने वाले दिनों में होने वाले दमन को न्यायोचित ठहराने के लिए इस तरह के आँकड़े प्रचारित करती रही है।
सरकार को पता था कि बाजार की शक्तियाँ जैसे-जैसे महानगरों से शहरों, कस्बों और गाँवों की तरफ बढ़ेंगी वैसे-वैसे आम आदमी की तबाही में भी इजाफा होगा। स्थानीय शिल्पियों, कुटीर उद्योगों, खुदरा व्यापारियों आदि के व्यवसाय पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा और इससे जो असंतोष और तनाव पैदा होगा उसके दमन के लिए सरकार को पुलिस और सेना का इस्तेमाल करना पड़ेगा। वैसी हालत में सरकार यह नहीं कहेगी कि हम अदानी और अंबानी की मदद के लिए जा रहे हैं। वह तो यही कहेगी कि हम काफी पहले से सचेत कर रहे थे कि इन इलाकों में माओवादी आंदोलन पैर फैला रहा है। इस निष्कर्ष तक पहुँचने के पीछे कुछ ठोस कारण हैं। यहाँ 2004 और 2005 में आयोजित दो तीन सम्मेलनों का उल्लेख प्रासंगिक होगा जिससे इस निष्कर्ष की तार्किकता समझी जा सकती है।
अगस्त 2004 में बंगलोर में उद्योग और विज्ञापन जगत् के दिग्गजों की भागीदारी के साथ एक सेमिनार हुआ जिसका शीर्षक था-चैलेंजेज ऑफ रूरल मार्केटिंग इन दि 21 सेंचुरी’। इसमें ग्रामीण उपभोक्ताओं की बदलती मन:स्थिति, जनसंचार साधनों की भूमिका और ग्रामीण उपभोक्ताओं तक पहुँचने के तरीकों पर विचार किया गया। इसके बाद 27-28 सितंबर, 2005 को ‘नेशनल कांफ्रेंस ऑन रूरल मार्केट्स’ का आयोजन किया गया जिसका थीम था- ‘डिकोडिंग रूरल इंडिया’। इसका आयोजन ‘कान्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज’ (सीआइआइ) ने किया था। इसके बाद 7-8 अक्टूबर, 2005 को ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज’ (फिक्की) ने नयी दिल्ली में ‘रूरल मार्केटिंग समिट 2005’ का आयोजन किया। इन आयोजनों में अनिल अंबानी (रिलायंस), आदि गोदरेज (गोदरेज ग्रुप), भास्कर भट्ट (टाइटन इंडस्ट्रीज), रमेश अय्यर (महिंद्रा ऐण्ड महिंद्रा), राजीव बख्शी (पेप्सीको), दलीप सहगल (हिंदुस्तान लीवर), दिलीप रंजेकर (अजीम प्रेमजी फाउंडेशन) जैसे उद्योग जगत् के दिग्गजों के अलावा विज्ञापन की दुनिया के चुनिंदा लोगों और भारत सरकार, योजना आयोग (आज का नीति आयोग) तथा रिजर्व बैंक के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।
इन सम्मेलनों से पहले फिक्की, सीआईआई तथा बड़ी विज्ञापन एजेंसियों ने विस्तार के साथ ग्रामीण बाजार की संभावनाओं पर शोघ कराया। ‘रूरल नेटवर्क’ की तरफ से प्रदीप कश्यप द्वारा तैयार की गयी 2004 की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण बाजार 1 लाख 23 हजार करोड़ रुपये के बराबर है जो अभी भी ‘अनटैप्पड’ है। यह भी बताया गया कि गाँवों में उपभोक्ता वस्तुओं का बाजार शहरी बाजार की तुलना में 53 प्रतिशत बढ़ा और स्थायी सामान के मामले में 59 प्रतिशत बढ़ा है। इस दौरान जो विभिन्न शोध हुए उनसे पता चलता है कि रोजमर्रा की जरूरतों मसलन टूथपेस्ट, चाय, साबुन आदि (व्यापारिक भाषा में इन्हें एफएमसीजी यानी फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स कहते हैं) का 65 हजार करोड़, स्थायी सामानों मसलन वाशिंग मशीन, मिक्सी, गैस चूल्हा आदि का 5 हजार करोड़ और ट्रैक्टरों एवं कृषि साधनों का 45 हजार करोड़ रुपये का बाजार ऐसा है जो अभी अनछुआ है।
एक आँकड़े से पता चला कि सन् 2001 में ग्रामीण क्षेत्रों में कोका कोला के आउटलेट्स की संख्या 80 हजार थी जो 2003 में बढ़ कर 1 लाख 60 हजार हो गयी। ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ वाले विज्ञापन के साथ इस कंपनी ने अपने औसत मूल्य को 10 रुपये से घटा कर 5 रुपये किया ताकि गाँवों में उपलब्ध अन्य सस्ते पेयों के मुकाबले यह टिक सके। 2002 से 2003 के बीच के आकड़ों को देखें तो गाँवों में कोका कोला की बिक्री में 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि शहरों में यह वृद्धि 24 प्रतिशत ही रही। इसके अलावा यह सर्वेक्षण कराया गया कि छोटे-छोटे कस्बों में विभिन्न पेशों में लगे लोग कितना वेतन पाते हैं और उनके खर्च का पैटर्न क्या है। इतने बड़े पैमाने पर होमवर्क करने के बाद ये सम्मेलन आयोजित हुए थे जिनका ऊपर जिक्र किया गया है।
मजे की बात यह है कि उपरोक्त तीनों सम्मेलनों की खबरें न तो अखबारों में प्रकाशित हुई और न टेलीविजन के चैनलों पर दिखायी गयीं। वजह बहुत साफ है। बाजार की जो शक्तियाँ गाँवों और कस्बों में पहुँचने की रणनीति तैयार कर रही हैं, वे नहीं चाहतीं कि अभी इसका बहुत प्रचार हो। यह आसानी से समझा जा सकता है कि इन सारे आयोजनों में उद्योग जगत् और विज्ञापन जगत् के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों की जो भागीदारी थी, उनमें ऐसे महत्त्वपूर्ण लोग थे जिनके एक इशारे पर प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया इसे प्रचारित करने के लिए कुछ भी कर सकता था। जब इन इलाकों में ‘रूरल मॉल्स’ बनने लगेंगे और इटली की कड़ाही, जर्मनी की खुरपी, बेल्जियम के बने बर्तन आदि अपेक्षाकृत सस्ते दरों पर मिलने लगेंगे तो स्थानीय कुम्हारों, लोहारों या अन्य शिल्पियों की क्या हालत होगी। चीन के खिलौनों ने वैसे भी भारत के की पीठ पर सवार होकर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ गाँवों में पहुँचेंगी तो खिलौना उद्योग को नेस्तनाबूद कर दिया है। जब भारतीय उद्योगपतियों कल्पना की जा सकती है कि क्या स्थिति होगी। ऐसे में जो असंतोष और तनाव पैदा होगा उसके दमन के लिए उसी तरह सेना और पुलिस जाएगी जैसे गुडगाँव की होंडा कंपनी में गयी थी। लेकिन यह कहा जाएगा कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ जो आंदोलन हो रहा है उसे माओवादी संचालित कर रहे हैं। सिंगूर, नंदीग्राम, कलिंगनगर, जगतसिंगपुर, काशीपुर (उड़ीसा) आदि में हमने इसका नंगा रूप देखा है। देश के कई हिस्सों में कोका कोला कंपनी द्वारा प्रदूषण फैलाने, भूगर्भ जल का दोहन करने और खेतिहर भूमि को बंजर बनाने के खिलाफ जो आंदोलन चले उन्हें सरकारी भाषा में उग्रवादी आंदोलन का नाम दिया गया। स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) की आड़ में जिस तरह उपजाऊ जमीन को हड़प कर उद्योगपतियों को दिया जा रहा है उससे पूरे देश में एक अशांति का माहौल बनता जा रहा है। छत्तीसगढ़ हो या झारखंड, उड़ीसा हो या पश्चिम बंगाल इन सारे राज्यों में माओवाद/नक्सलवाद की जो आँच महसूस हो रही है वह उस आग से पैदा हुई है जो अदानियों। अंबनियों, टाटाओं, जिंदलों, मित्तलों आदि ने लगायी है और जिसे इन राज्यों की सरकारों का भरपूर समर्थन प्राप्त है। इन इलाकों में हजारों एकड़ खेतिहर जमीन को जिस तरह लूट कर इन औद्योगिक घरानों को सरकार देने की साजिश में लगी है उसे समझने के लिए पिछले पाँच वर्षों में सरकार और इन घरानों के बीच हुए दर्जनों समझौतों (मेमो ऑफ अंडरस्टैंडिंग) को देख लेना काफी होगा।
यह जानना और भी दिलचस्प होगा कि सरकार ने पहले तो माओवाद का भूत खड़ा किया और मासूम लोगों को माओवादी कह कर प्रताडि़त किया जो तंग आकर कालांतर में सचमुच माओवादी हो गये। एक तरफ तो नक्सलवाद और माओवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में चित्रित करना और दूसरी तरफ फर्जी मुठभेड़ों का औचित्य स्थापित करना-इन दो बातों ने आम आदमी द्वारा चलायी जा रही अपने अधिकारों की लड़ाई के सामने अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया है। अब से तकरीबन पाँच साल पूर्व मार्च 2004 में एक निजी चैनल पर चल रही चर्चा के दौरान महाराष्ट्र के पूर्व गृहराज्य मंत्री कृपाशंकर सिंह ने दलील दी कि कुख्यात अपराधियों का सफाया करने के लिए अगर पुलिस ‘एनकाउंटर’ का सहारा लेती है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
यहाँ एनकाउंटर से उनका तात्पर्य फर्जी मुठभेड़ से था क्योंकि उन्होंने यह भी कहा कि अपराधियों को पकड़ कर अगर कानूनी कार्रवाई की जाती है तो लंबी और जटिल प्रक्रिया तथा पर्याप्त सबूत न मिलने का लाभ उठा कर वे छूट जाते हैं और फिर अपराधों में लिप्त हो जाते हैं। कृपाशंकर सिंह के बगल में बैठे अभिनेता नाना पाटेकर ने भी जोरदार ढंग से इस दलील का समर्थन किया। फर्जी मुठभेड़ों पर आधारित उनकी फिल्म ‘अब तक छप्पन’ अभी रिलीज नहीं हुई थी लेकिन यह चर्चा जोरों पर थी कि इस तरह की मुठभेड़ों के लिए चर्चित महाराष्ट्र पुलिस के इंस्पेक्टर दया नाइक से प्रेरणा लेकर यह फिल्म बनायी गयी है। चर्चा में गौर करने वाली बात यह थी कि कृपाशंकर सिंह और नाना पाटेकर की दलीलों से उस कार्यक्रम में उपस्थित काफी लोग सहमत नजर आ रहे थे। पत्रकार निखिल वागले और एक-दो मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के अलावा कोई भी इस दलील का विरोध नहीं कर रहा था। क्रमश: