फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीते वीरवार को, तिकोना पार्क ऑटो मार्केट से ईएसआई अस्पताल को जाने वाली सड़क पर, स्कूल की दीवार से सटी कच्ची मार्केट को नगर निगम ने तोड़ दिया था। इन दुकानों के माध्यम से फल, सब्जियों, अंडे व अन्य परचून आइटमों के अलावा पुराने फर्नीचर का भी कारोबार होता था। बीते 30-40 वर्षों से यहां बैठे अधिकांश कारोबारी छोटे तबके के गरीब पंजाबी थे। ऐसे ही एक दुकानदार किशन लाल गेरा ने इस संवाददाता को बताया कि बुधवार को यानी तोड़-फोड़ से एक दिन पहले विधायक अधलखा नगर निगम के एक जेई के साथ अपनी कार में यहां से गुजरा था।
गुजरते वक्त वह इशारे करके जेई को हिदायत दे रहा था। कुछ देर बाद जेई ने चुपके से उसको बताया कि कल इन सब दुकानों का सफाया कर दिया जाएगा। बातचीत के दौरान गेरा बताया कि वह बीते 35 साल से यहां बैठ कर फर्नीचर का छोटा-मोटा काम करके अपनी गुजर-बसर कर रहा था। हाल ही में हुए चुनाव के वक्त उसने अपनी पंजाबी बिरादरी के कुछ ठेकेदारों के दबाव में आकर अपने परिवार के 28 वोट धनेश अधलखा को देकर अपने लिए यह मुसीबत खड़ी कर ली।
इसी तरह दो नम्बर के बंगलो प्लॉट नम्बर एक के कोने पर जूस कॉर्नर चलाने वाले किशोर कुमार ने बताया कि वह बीते 44 साल से यहां खड़ा होकर फ्रूट जूस बेचता आ रहा है। हाल ही में हुए चुनाव के दौरान सरला विरमानी नामक एक तथाकथित समाजसेवी महिला ने उसे पंजाबी होने का वास्ता देकर धनेश के लिए वोट मांगे थे। उसके ज्यादा दबाव देने पर उसने अपने परिजनों के 36 वोट अधलखा को देकर अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मार ली। डबडबाई आंखों से देखते हुए उसने बताया कि अब वह पूरी तरह से बेरोजगार है, पता नहीं कब और कहां वह क्या धंधा शुरू कर पाएगा? फिलहाल उसका सारा परिवार गहरे आर्थिक संकट में पड़ चुका है।
बुजुर्ग महिला की आत्मनिर्भरता से भी बैर तिकोना पार्क की कच्ची मार्केट में तीन- चार दशक से दुकानें लगाकर परिवार पालने वालों को तो उजाड़ा, पॉलिथीन की छोटी सी छत तानकर उसे ही घर और दुकान की तरह इस्तेमाल करने वाली करीब 70 वर्षीय बुजुर्ग राजस्थानी महिला के मिट्टी के चंद बर्तन भी अतिक्रमण के नाम पर इस तरह हटाए कि सब टूट फूट गए। कांपते हाथों से मिट्टी के साबित बर्तनों को तलाशने का निरर्थक प्रयास कर रही बुजुर्ग महिला ने बताया कि वह कुम्हारों के यहां से ये बर्तन खरीद कर लाती है और बेच कर थोड़ा बहुत मुनाफा होता है उससे गुजारा चलाती है। टूटे बर्तनों को देखकर उसकी हिम्मत भी टूट गई, दुखी मन से धीरे से बोली कि वह कुम्हारों के पैसे कैसे चुकाएगी और नए बर्तन के लिए कहां से पैसे लाएगी। सरकार बुजुर्गों को पेंशन देने, बेघरों के लिए आवास योजनाएं चलाने और बेरोजगारों के लिए कौशल विकास कार्यक्रम और चलाने का ढिंढोरा पीट रही है लेकिन सच्चाई ये है कि उसने सत्तर साल की एक बुजुर्ग बेघर महिला से उसका रोजगार तो छीना ही उसे बेघर भी कर दिया। सर्दियों में वह कहां रहेगी और क्या खाएगी इससे न तो प्रशासन को कोई मतलब है न धनेश अदलखा को और न ही सरकार को।