फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) लगता है भाजपा सरकार की तरह ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रशासन ने भी अखबारों में भ्रामक खबर छपवा कर प्रोपेगेंडे की राह पकड़ ली है। ऐसी ही एक खबर में बताया गया है कि पहले जहां ओपीडी में पांच-छ: हजार मरीज प्रति दिन आया करते थे अब केवल तीन-चार हजार ही आ रहे हैं। इस कमी का कारण यह बताया गया कि पहले जो फर्जी कार्ड-धारक आया करते थे उन्हें कड़ी जांच द्वारा रोक दिया गया है। विदित है कि जो कार्ड पहले कॉर्पोरेशन का लोकल आफिस बनाकर बीमाकृत मज़दूरों को दिया करता था, पिछले कई वर्षों से यह काम खुद नियोक्ता यानी कम्पनी प्रबन्धन के जिम्मे डाल दिया गया है। कम्पनी प्रबन्धन द्वारा जारी किए जाने वाले इन कार्डों में कई बार प्रबन्धक मुहर लगाना अथवा हस्ताक्षर करना भूल जाता है और मज़दूर उसे तुरन्त देख नहीं पाता तो इसी आधार पर अस्पताल में आने वाले मज़दूरों को बैरंग लौटा दिया जाता है। इस तरह लौटाने की इस प्रक्रिया के चलते सामयिक तौर पर ओपीडी में आने वालों की संख्या कुछ घटी जरूर है। परन्तु जितनी बढ़ा-चढ़ा कर बताई जा रही है, उतनी नहीं। यहां के ओपीडी में कभी भी छ: हजार मरीज नहीं आए, जैसा कि खबर में दावा किया गया है और न ही घट कर कभी तीन हजार का आंकड़ा पहुंचा है। सामान्य-तौर पर चार-पांच हजार मरीज ही ओपीडी में आते हैं।
यह भी सत्य है कि सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट (एसएसटी) के मामलों में कुछ घपले घोटाले होते रहे हैं। उनमें होता यह रहा है कि कार्ड तो असली होता है परन्तु उसमेें एसएसटी कराने के लिए कुछ समय के लिए नाम बदल दिए जाते हैं। ट्रीटमेंट होने के बाद फिर से वापस असली नाम चढ़ा दिए जाते हैं। इसे डेटा की हेरा-फेरी कहा जाता है। यह केवल इसलिए सम्भव होता रहा कि कॉर्पोरेशन ने डेटा नियंत्रण करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अब इस ओर ध्यान देने से अवश्य ही हेरा-फेरी करने वाले काबू किए जा सकेंगे। कुल मिला कर इनकी संख्या कोई बहुत अधिक नहीं होती जिसे पकडऩे के लिए पूरे अस्पताल में हंगामा खड़ा कर रखा है। किसी भी मरीज का कार्ड ओपीडी पर्चा बनाते वक्त भी देख लेना पर्याप्त होता है। ध्यान रहे कि यह कार्ड ऑनलाइन बन कर कम्पनी तथा कॉर्पोरेशन की वेबसाइट पर उपलब्ध रहता है। कार्ड बनने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की धोखा-धड़ी सम्भव नहीं, प्रबन्धक की मोहर लगी हो या न लगी हो, उसके दस्तखत हुए हों या नहीं। कार्ड की सत्यता की तस्दीक कॉर्पोरेशन अपनी साइट से ही कर सकती है।
इस सबके बावजूद अस्पताल प्रशासन ने मरीजों को मात्र तंग करने के लिए कदम-कदम पर उनके कार्डों की जांच को मुद्दा बना रखा है। इसी के चलते जो मरीज पहले से ही उपचाराधीन चलते आ रहे हैं उन्हें भी मोहर अथवा हस्ताक्षरों के लिए दौड़ाया जा रहा है।
दवाएं व इलाज न मिलने से ओपीडी जरूर घटेगी विदित है कि कॉर्पोरेशन द्वारा मेडिकल कॉलेज अस्पताल शुरू करने से पहले इसी परिसर में राज्य सरकार द्वारा चलाए जाने वाले ईएसआई अस्पताल में मात्र 1500 मरीज ओपीडी में तथा 100-125 के करीब मरीज वार्डों में दाखिल रहते थे। रेडियोलॉजी के नाम पर मात्र एक, बाबा आदम के जमाने की टूटी-फूटी एक्स-रे मशीन हुआ करती थी। आज के मुकाबले न तो ऑपरेशन थियेटर हुआ करते थे, और न ही उपकरण आदि। लेबोरेटरी भी नाम-मात्र की थी। डॉक्टरों की कुल संख्या भी 50 से अधिक नहीं थी जो आज 600-700 से अधिक है। जाहिर है कि जब कॉर्पोरेशन ने बेहतर एवं सुपर स्पेशलिस्ट सेवाएं प्रदान करनी शुरू करी तो ओपीडी व दाखिल मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ती चली गई। इस बढ़ती संख्या में स्थानीय मरीजों के अलावा गुडग़ांव, मानेसर तथा दिल्ली व नोयडा तक के मरीज आने लगे थे। इससे अस्पताल का बजट काफी बढ़ता चला गया, शायद 600 करोड़ से भी अधिक। इस बढते बजट को घटाना, जब कॉर्पोरेशन का लक्ष्य बन गया तो दवाओं की आपूर्ति घटाने के साथ-साथ विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या भी घटा दी गई। डॉक्टरों द्वारा लिखी दवाई काउंटर पर मिलती नहीं, विशेषज्ञ डॉक्टरों की जगह काम चलाऊ एवं डंग टपाऊ डॉक्टरों को बैठा दिया जाएगा तो मरीज यह धक्के खाने कब तक आएंगे? बीते पांच माह से कैंसर मरीजों का बीएमटी बिल्कुल बंद है, ऑन्कोलॉजी में विशेषज्ञ डॉक्टरों तथा आवश्यक दवाएं न मिलने के चलते, मरीज यहां क्या लेने आएंगे? यही हालात कार्डियोलॉजी व नेफ्रोलॉजी में भी है।
हाल ही में मुख्यालय ने एक नया फरमान जारी कर कहा है कि दवाओं की खरीद आरसी की बजाय जेम (जीईएम) से की जाय। विदित है कि आरसी के माध्यम से कुछ विशेष स्तर की कम्पनियों से मोल-भाव करके दवाएं खरीदने का रेट कान्ट्रेक्ट बनाया जाता है जो दो से तीन वर्ष तक का होता है। इस व्यवस्था में दवाओं की क्वालिटी जांचने का भी प्रावधान होता है। इसके विपरीत जेम की व्यवस्था में सरकारी बाबू किसी भी चलते-फिरते सप्लायर को दवाईयां खरीदने का आर्डर दिला सकता है जिनकी गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं होती। इस व्यवस्था में सम्बन्धित बाबू को सप्लायर ढूंढने में कितना वक्त लगेगा पता नहीं चलता। केवल जेम द्वारा एनए यानी ‘अनउपलब्धता’ प्रमाणपत्र दिए जाने पर ही आरसी की दवाएं खरीदी जा सकेंगी। जहां पहले से ही आवश्यक दवाओं की कमी चल रही है वहां अब जेम के इस नए पंगे से दवाओं की और कमी होना स्वाभाविक है।
बजट घटाने के नाम पर यदि कॉर्पोरेशन का यही रवैया रहा तो कोई बड़ी बात नहीं कि इस अस्पताल की स्थिति भी 2015 से पहले वाले पुराने अस्पताल जैसी हो जाए। कॉर्पोरेशन की इसी नीयत का नमूना बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में देखा जा सकता है जहां ओपीडी 1500-2000 तथा वार्डों में दाखिल मरीजों की संख्या 300 से अधिक नहीं रहती जबकि वह 1000 बिस्तर वाला अस्पताल है और उसमें भी केवल 600 बिस्तरे चालू रखे हैं। लगभग यही दुर्दशा कॉर्पोरेशन ने अपने अन्य अस्पतालों की भी बना रखी है। जब लक्ष्य ही चिकित्सा सेवा देने की बजाय धन-संग्रह करना हो जाय तो यही स्थिति बनती है। कॉर्पोरेशन अपने चार करोड़ मज़दूरों से वसूली तो लगातार करती है लेकिन अनुबंध के अनुसार सेवाएं न देकर अपने खजाने में लगातार वृद्धि करते हुए एक लाख 88 हजार करोड़ से ऊपर का संग्रह कर चुका है। चिकित्सा सेवाओं पर होने वाले खर्च पर भले ही कैंची चलती रहे लेकिन मुख्यालय के अपने खर्च में कोई कटौती नहीं हो रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस दफ्तर का खर्च 200 करोड़ वार्षिक से अधिक बताया जाता है। दफ्तर है तो इसमें छोटे से लेकर बड़े बाबू ही तो बैठते होंगे जिनका काम केवल फाइलें घसीटने से अधिक कुछ नहीं हो सकता।