फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) हरियाणा के हिसार जि़ले से आने वाले सूर्यकांत शर्मा ऐसे सीजेआई (भारत के मुख्य न्यायाधीश) बने हैं जिनके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट के जज आदर्श कुमार गोयल ने भ्रष्टाचार के आरोपों की पूरी सूची तत्कालीन सीजेआई को सौंपी थी। ‘मज़दूर मोर्चा’ के अलावा अन्य कई प्रचार माध्यमों द्वारा भी उसे प्रकाशित किया गया था। इसमें उनकी बहुत सी सम्पत्तियों का ब्योरा दिया गया था। यह शिकायत उस वक्त की गई थी जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक अन्य वरिष्ठ जज का नम्बर काट कर सूर्यकान्त को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की साजिश चल रही थी। लेकिन जब राज में दागी लोगों को उच्च शिखर पर पहुंचाना आवश्यकता बन जाए तो ऐसी शिकायतों की कोई परवाह नहीं की जाती। लिहाजा सूर्यकांत हिमाचल के मुख्य न्यायाधीश बन गए थे। कहने को बेशक हाईकोर्ट व सुप्रीमकोर्ट के तमाम न्यायाधीशों व मुख्य न्यायधीशों की नियुक्तियां कॉलेजियम सिस्टम से की जाती हैं। तीन-चार वरिष्ठतम जजों का एक ग्रुप प्रत्येक हाईकोर्ट में तथा ऐसा ही एक सुप्रीमकोर्ट में रहता है जिसे कॉलेजियम कहा जाता है। न केवल नियुक्तियां बल्कि हाईकोर्ट जजों के तबादले भी कॉलेजियम की सिफारिश पर ही केन्द्र सरकार द्वारा किए जाते है। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से देखा जा रहा है कि ये तमाम कॉलेजियम केन्द्र सरकार के इशारों पर नाचने लगे हैं। इनके द्वारा वही सब काम वैसे ही होते हैं जैसे कि सरकार चाहती है। सरकार के इशारे पर कनिष्ठ जजों को वरिष्ठ और वरिष्ठों को कनिष्ठ बना दिया जाता है। इस प्रणाली का दुरुपयोग करते हुए केन्द्र सरकार तमाम हाईकोर्टों व सुप्रीमकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए सांप-सीढ़ी वाला खेल खेलती है। सत्तारूढ़ दल दूरगामी योजना के तहत जजों को अपनी गोटियों की तरह बैठाता है।
जो जज जितना कमजोर भ्रष्ट एवं दागी होगा वह सरकार के सामने उतना ही अधिक रेंग कर चलेगा। जाहिर है ऐसे में उन्हीं भ्रष्टाचारियों को न्यायपालिका में उच्च से उच्चतम स्थान मिलते चले जाएंगे। ऐसे जजों से सरकार को कभी भी किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो सकती। सरकार के इशारे मात्र पर ही ये लोग वही सब कुछ करते हैं जो सरकार चाहती है। बीते दस वर्षों में इसके अनेकों उदाहरण देखे जा चुके हैं। इसी पद्धति को ध्यान में रखते हुए सूर्यकान्त को तमाम शिकायतों के बावजूद हिमाचल हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश, फिर सुप्रीम कोर्ट का जज और अंत में सीजेआई बनाया गया है। बीते एक साल में अपने विभिन्न कारनामों से वे सत्ता को यह विश्वास दिलाने में सफल हुए है कि वे उसकी आकांक्षाओं पर न केवल खरे उतरेंगे बल्कि इस लिहाज से अपने से पहले वाले तमाम मुख्य न्यायाधीशों के रिकॉर्ड तोड़ देंगे।
इसके बेहतरीन उदाहरणों के तौर पर विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग के विरुद्ध डाली गई याचिका को देखा जा सकता है। बिहार चुनाव में भाजपा को जिताने के लिए चुनाव आयोग द्वारा की जा रही धांधली की सुनवाई सूर्यकान्त जी सुनते रहे और चुनाव सम्पन्न भी हो गया, लेकिन धांधली का कोई इलाज आज तक नहीं हुआ। दूसरे उदाहरण के तौर पर मध्य प्रदेश सरकार के उस मंत्री का केस देखा जा सकता है जिसने महिला कर्नल कुरैशी को आतंकवादियों की बहन बताया था। मंत्री के बयान का संज्ञान लेते हुए जबलपुर हाईकोर्ट के जज ने इसके विरुद्ध तीन घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। सूर्यकान्त जी ने उस मंत्री को राहत देते हुए न केवल उसको जमानत दे दी बल्कि हाईकोर्ट के उन जज साहब का भी तबादला करा दिया। उसके बाद पूरा केस ही बट्टे-खाते लगा दिया। इसी तरह के एक और मामले में सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर महमूदाबाद द्वारा फेसबुक पर लिखी गई एक पोस्ट के लिए जिस तरह से जस्टिस सूर्य कान्त ने उन्हें प्रताडि़त होने दिया था, उससे उनका न्याय-प्रिय होने की बजाय हिन्दुत्ववादी होना सिद्ध होता है।
हाल ही में उनके द्वारा अरावली व कुलदीप सेंगर वाले मामलों में दिए गए निर्णयों से लोगों में उनके न्यायप्रिय होने का भ्रम हो सकता है। लेकिन ये दोनों ही केस एक प्रकार के कवर मात्र हैं। दोनो ही मामलों को लेकर जनता में दिन-ब-दिन बढ़ता आक्रोश मोदी सरकार को भारी पड़ता जा रहा था। ऐसे में सरकार का चेहरा बचाने के लिए अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही वह फैसला रद्द कर दिया जो उसने 20 नवम्बर को लिया था। रही बात कुलदीप सेंगर की तो उसमें मोदी जी की कोई रुचि नहीं थी बल्कि उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ का आदमी होने के नाते मोदी जी भी नहीं चाहते थे कि उसे कोई राहत मिले।
सूर्यकांत भी अपनी गोटियां बैठाते हैं, डॉ. पंकज हाईकोर्ट में लम्बी पारी खेलने का इरादा रखने वाले जस्टिस सूर्यकांत भी यथासम्भव न्यायपालिका में अपनी गोटियां बैठाने का खेल पूरी गम्भीरता से खेल रहे है। इसके लिए वह अपने सजातीय वकीलों व मजिस्ट्रेटों को पदोन्नति के अधिक से अधिक अवसर प्रदान कराते हैं। इसके चलते उन पर जातिवाद का भी बड़ा आरोप लगता रहा है। जातिवाद के इस दाग को धोने के साथ-साथ वे अपने एक खास मुरीद एवं गैर ब्राह्मण पूर्व एडीजे डॉ. पंकज को पंजाब एवंं हरियाणा हाईकोर्ट का जज बनवाने की तैयारी में हैं। 2020 के आसपास डॉ.पंकज ने अपने पद से त्यागपत्र देकर फिर से चंडीगढ़ में वकालत शुरू कर दी जो वे एडीजे बनने से पहले भी करते रहे थे। न्यायिक हल्कों में चर्चा है कि जस्टिस सूर्यकांत ने उन्हें जल्दी हाईकोर्ट जज बनवाने के लिए नौकरी से त्यागपत्र दिलवाया था। डॉ. पंकज को जज नियुक्त कराने से उन पर लगा जातिवाद का दाग मिटेगा नहीं तो हल्का जरूर हो जाएगा। शायद डॉ. पंकज अकेले ऐसे होंगे जो सजातीय न होते हुए भी उनकी कृपा से लाभान्वित हो सकें। फिलहाल उन्हें सीनियर वकील का तमगा तो दिला ही दिया है।
दरअसल दागदार लोगों को ऊंची नियुक्तियां देने की जो नीति सत्तारूढ़ दल की है उसी नीति पर चलते हुए जस्टिस सूर्यकांत भी ऐसे ही लोगों को प्राथमिकता देना पसंद करते हैं। जाहिर है ऐसे लोग सदैव अहसान तले दबे रह कर पूरी ताबेदारी करते हैं। डा. पंकज ने फरीदाबाद में बतौर एडीजे एक मामले में दो व्यक्तियों को सात-सात साल तथा तीसरे को 10 साल की सजा सुना कर जेल भेज दिया। सजा सुनाने से करीब तीन-चार माह पूर्व घर पर चली लम्बी वार्ता के दौरान उन्होंने एक आरोपी जिसे 10 साल की सजा सुनाई थी, से सौदेबाजी कराने का इशारा दिया था। नौ महीने जेल में काटने के बाद जुलाई 2017 में जमानत पर रिहा होने के बाद आरोपी शिकायतकर्ता ने सारी कहानी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिख भेजी। कोई जवाब न आने पर दो बार रिमाइंडर भेजे। उनका भी कोई जवाब नहीं आया तो आरटीआई लगा कर पूछा कि उसकी शिकायतों का क्या हुआ? तब जाकर कहीं हाईकोर्ट ने लिखा कि शपथ पत्र के माध्यम से शिकायत भेजी जाए। तुरन्त शपथ पत्र भी भेज दिया गया। उसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अन्तिम जवाब दिनांक 06.03.18, जो इन्द्र सिंह ज्वाईन्ट रजिस्ट्रार (Rules-cum-public-information officer) पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से भेजा गया, के मुताबिक शिकायतकर्ता की 31.07.2017 की शिकायत माननीय मुख्य न्यायाधीश के पास विचाराधीन है। अभी अन्तिम बार ई-मेल 14.08.2025, स्पीड पोस्ट 20.08.2025 को बतौर रिमाईण्डर भेजे गए, लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी। रेंगे भी कैसे, जिसके सिर पर सूर्यकान्त जैसे महान न्यायमूर्ति का हाथ हो उसके विरुद्ध कोई क्या कर सकता है?
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जस्टिस सूर्यकान्त की जड़ें कितनी गहरी हो सकती हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो दिनेश गुप्ता उनका पीएस उस वक्त हुआ करता था जब वे इस हाईकोर्ट में जज थे, रिटायर होने के बाद दो बार सेवा विस्तार लेकर रजिस्ट्रार के पद पर कायम हैं। हाई कोर्ट में सेवा विस्तार का शायद यह इकलौता मामला है। जाहिर है इनके सेवा विस्तार के चलते प्रभावित डिप्टी तथा असिस्टेंट रजिस्ट्रारों की पदोन्नतियां रुकना स्वाभाविक है।