फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सांस लेने के अधिकार से वंचित करने वाली सरकार ने प्रदूषण को ही अपने राजनीतिक प्रोपेगेंडे का हथियार बना लिया है। सांसों के लिए संकट बना वायु प्रदूषण कोई यकायक आने वाली आपदा नहीं बल्कि प्रति-वर्ष सर्दियों के मौसम में नियमित रूप से आने वाला संकट है। इसके बावजूद संकट का कोई स्थायी हल करने की अपेक्षा राजनेताओं ने इसे लूट कमाई व अपने सस्ते प्रचार का साधन बना लिया है।
इसी क्रम में स्थानीय विधायक एवं कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल ने दिनांक 14 दिसम्बर को, सेक्टर 16 स्थित अपने कार्यालय पर अच्छा-खासा मजमा लगा कर वायु प्रदूषण से निपटने का नाटक खेला। नगर निगम विभाग के मंत्री होने के नाते उन्होंने पांच मिनी व एक बड़ी रोड स्वीपिंग मशीन व आठ एंटी स्मॉग गनों को सड़कों पर उतार कर जनता को बताना चाहा कि वे कितनी गम्भीरता से वायु प्रदूषण निपटाने में लगे हैं। कोई पूछे मंत्री जी से कि इन मशीनों से शहर के कितने हिस्से को साफ किया जा सकता है? तो वे क्या बताएंगे क्योंकि उनका काम तो केवल जनता को बहकाना मात्र है, हकीकत यह है कि इन मशीनों से केवल चार-पांच सेक्टरों की ही सफाई हो पाए तो बड़ी बात है।
सुधी पाठक स्वीपिंग मशीन को समझ लें कि यह झाड़ू लगाने का आधुनिक विकल्प है। झाड़ू लगाने से जहां धूल उड़ती है वहीं स्वीपिंग मशीन धूल को उड़ाने की बजाय अपने भीतर ही खींच लेती है। अब पाठक खुद ही देख सकते हैं कि शहर की सड़कों पर कितनी स्वीपिंग मशीनें लगी हैं और कितने स्वीपर झाड़ू लगाते हुए धूल उड़ा रहे हैं। इसी प्रकार एंटी स्मॉग गन, वायुमंडल में समा चुके धूल कणों को, पानी की फुहारों के जरिए नीचे गिराती हैं। स्वीपिंग मशीनें उन पुख्ता सड़कों के लिए बनी हैं जिन पर गड्ढे आदि न हों। इतना ही नहीं सड़कों के किनारे यदि रेत मिट्टी आदि पड़ी रहेगी तो भी इन मशीनों का कोई लाभ नहीं होगा। विदित है कि यहां की तमाम सड़कों के किनारे कच्चे होने के चलते नियमित रूप से धूल का उडऩा स्वाभाविक है। इस मिट्टी को दबाने के लिए जो पानी का छिड़काव करने का दावा किया जा रहा है, वह सब फर्जी है जो सबको दिखाई दे रहा है।
इससे बड़ी अचरज व मूर्खता की बात और क्या हो सकती है कि सड़कों से उडऩे वाली धूल को तो नियमित रूप से उडऩे दिया जाता है और फिर उसे वायुमंडल से निकालने के लिए एंटी स्मॉग गनों की नौटंकी की जाती है। यदि एक बार सड़कों के किनारे रेत-मिट्टी रहित बना दिए जाए तो फिर इन एंटी स्मॉग गनों की आवश्यकता नहीं रह जाती। यदि इनकी आवश्यकता ही खत्म हो जाएगी तो इन्हें खरीदने या किराए पर लेने से कमीशन आदि के रूप में होने वाली लूट कमाई कैसे होगी? स्वीपिंग मशीनों व पानी छिड़कने वाले टैंकरों का भी जो अंधा खाता चलता है, वह किसी से छिपा नहीं है। रही बात सड़कों के किनारे संवारने की तो यह कोई असम्भव काम नहीं है। पूरे चंडीगढ़ शहर में किसी भी सड़क के किनारे रेत-मिट्टी नजर नहीं आयेगी। चंडीगढ़ तो चलो दूर है, लुटियन दिल्ली में भी शायद ही किसी सड़क किनारे रेत मिट्टी नजर आ जाए।
वायु प्रदूषण के लिए, सरकार पराली जलाने वाले किसानों के सिर ठीकरा फोड़कर निश्चिंत हो जाती है। लेकिन शहर भर में जगह-जगह कूड़े व औद्योगिक कचरे के जलते ढेर नजर नहीं आते। टूटी सड़कों व अन्य कारणों से लगते ट्रैफिक जाम व बिजली की कमीके चलते जेनरेटरों से उगलते धुएं से निपटने की ओर प्रशासन का कतई कोई ध्यान नजर नहीं आता। घरेलू एवं औद्योगिक गैस अति महंगी होने के कारण इसके उपभोक्ता वैकल्पिक सस्ते इंधन प्रयोग करके वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं। जो गरीब आदमी चूल्हा जलाने के लिए गैस नहीं खरीद सकते वे लकड़ी उपले आदि जला कर धुआं पैदा करने को मजबूर होते हैं। सरकार अपनी तरफ से ग्रैप 1,2,3,4 लगा कर निश्चिंत हो जाती है, मानो इसके घोषणा मात्र करने से प्रदूषण स्वत: समाप्त हो जाएगा। वास्तविकता यह है कि गै्रप लगने से मिले विशेषाधिकारों के बलबूते सम्बन्धित अधिकारी अपनी लूट कमाई बढ़ाने लगते हैं। उक्त ड्रामेबाजी करने की अपेक्षा यदि कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल सही ढंग व ईमानदारी से काम करें तो प्रदूषण जैसी गम्भीर समस्या से निपटना कोई मुश्किल काम नहीं है।