मज़दूर मोर्चा ब्यूरो चुनाव सुधारों को लेकर संसद में चल रही बहस के दौरान केन्द्रीय गृहमंत्री अमितशाह ने जो बद्जबानी की सो की, राष्ट्रपिता महात्मागांधी को भी वोट चोर घोषित कर दिया। उनका कहना था कि आजादी मिलने के बाद 14 प्रादेशिक कमेटियों में से केवल दो जवाहर लाल नेहरू को और 12 कमेटियां सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी। महात्मा गांधी ने अपनी चतुराई से 12 वोट पाने वाले को प्रधानमंत्री न बना कर, वोट चोरी करके केवल दो वोट वाले को प्रधानमंत्री बना लिया था। वास्तविकता यह थी कि सरदार पटेल ने स्वत: कहा था कि बापू जिसे चाहें प्रधानमंत्री बना लें उन्हें कोई एततराज नहीं। उन्हें बेशक कोई एतराज न रहा हो लेकिन आज बड़े पैमाने पर, देश भर में वोट चोरी करने वाले गिरोह के सरगणा अमितशाह को उस चयन पर एतराज है जबकि वह कांग्रेस पार्टी का अंदरुनी मामला था।
रही बात वंदे मातरम पर चर्चा कराने की तो इसके पिछे भाजपा के निशाने पर केवल बंगाल चुनाव ही था। इसकी आड़ में भाजपा कांग्रेस पर निशाना साध रही थी लेकिन शिकार खुद तो हुई सो हुई, आरएसएस की मिट्टी भी बुरी तरह से पलीत करा दी। इस गीत में जिस कतर ब्योंत का आरोप कांग्रेस पार्टी पर लगाया जा रहा था वह निरर्थक सिद्ध हुआ। वास्तव में इस गीत में पहला सुधार गुरूदेव रविन्द नाथ टैगोर ने ही किया था। उसके बाद नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने भी वंदे मातरम के स्थान पर जय हिंद और भगत सिंह व उनके साथियों ने इन्कलाब-जिंदाबाद का नारा दिया था। वंदे मातरम को जिस रूप में स्वीकार किया गया वह संविधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से पास किया गया था। इसमें भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस की ओर से श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे।