फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सन् 1948 में भारतीय संसद द्वारा बनाए गए एक्ट के द्वारा ईएसआई कॉर्पोरेशन की स्थापना की गई थी। इसके द्वारा देश के औद्योगिक श्रमिकों को बेहतरीन चिकित्सा सेवा तथा सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान किया गया था। लेकिन आज ये कॉर्पोरेशन पूरी तरह से चोर कम्पनी के रूप में परिवर्तित हो चुका है। चोर कम्पनी का सरगना जब गुजराती नस्ल का हो तो फिर कहने ही क्या। कुशल-चोर अथवा जेब-कतरे की भांति, कॉर्पोरेशन मज़दूरों के वेतन से चार प्रतिशत वसूली तो कर लेता है, लेकिन उसके बदले चिकित्सा सेवाएं देने की बजाय उन्हें इधर-उधर भटकाता रहता है। जो सेवाएं वह देता भी है वे इतनी घटिया स्तर की होती जा रही हैं कि मज़दूर अपने खर्चे पर निजी अस्पतालों की शरण लेने को मजबूर होते हैं।
एनएच तीन स्थित स्थानीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल द्वारा, बीते कुछ वर्षों से बेहतर सेवा देने का प्रयास किया जा रहा था जिसे अगस्त माह से ध्वस्त कर दिया गया है। अनेकों बीमारियों के बेहतरीन विशेषज्ञ डॉक्टरों को यहां से स्थानांतरित अथवा निलम्बित करके निकाल दिया गया है, तथा कुछ डॉक्टर डीन की बद्तमीजियों के चलते खुद भी छोड़ गए। उनके रिक्त स्थानों पर केवल दिखावटी एवं कनिष्ठ डॉक्टरों को बैठा दिया गया है। ये डॉक्टर बीमारी के विशेषज्ञ न होने के चलते मरीजों को घुमन-घेरी में घुमाते रहते हैं। समझदार एवं थोड़ा भी साधन-सम्पन मरीज़ जब इस हकीकत को समझ लेता है तो वह रोता-पीटता वैकल्पिक व्यवस्था को खोजता है।
डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली दवाईयों का भी मामला बहुत गड़बड़ है। कैंसर की महंगी दवाईयों के लिए मरीजों को डिस्पेंसरियों की ओर धकेल दिया जाता है, जहां उसे कुछ नहीं मिलता। अस्पताल का यह रवैया पूर्णत: कॉर्पोरेशन के लिखित आदेशों के विरुद्ध है। इसके अलावा और भी अनेकों दवाईयों के लिए लिख दिया जाता है ‘उपलब्ध नहीं है’। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि यह लिखवाने भर के लिए मरीज़ को पहले ‘ऑनलाइन’ की कतार में और फिर फॉर्मेसी काउंटर की कतार में लग कर दो से तीन घंटे बर्बाद करने पड़ते हैं। दबी जबान से डॉक्टर साहिबान यह भी बता देते हैं कि उन्हें वही दवाई लिखने का आदेश है जो उनके स्टोर में उपलब्ध है, इससे मरीज़ ठीक हो या न हो। जाहिर है कि यदि ठीक होना है तो चुपचाप असली दवाई बाजार से खरीद लो।
इन सब मसलों को जब डीन डॉक्टर कालीदास के सामने उठाया जाता है तो उनका एक ही रटा-रटाया जवाब होता है कि नए डॉक्टरें की भर्ती के लिए पद विज्ञाप्ति किए जा चुके हैं। इसका कोई जवाब उनके पास नहीं होता कि डॉक्टरों को हटाने से पहले उनकी जगह आने वाले डॉक्टरों का इंतजाम क्यों नहीं किया गया? दवाईयों की उपलब्धता के बारे में वे हमेशा यही कहते हैं कि ऑर्डर प्लेस कर दिया गया है, शीघ्र ही उपलब्ध करा दी जाएगी। विदित है कि अस्पताल में दवाईयां रेट कॉन्ट्रेक्ट (आर सी) तथा लोकल परचेज (एलपी) के द्वारा आती हैं। किसी भी अस्पताल में यह सम्भव नहीं हो सकता कि आरसी की दवाओं से काम चलाया जा सके। इसके लिए एलपी के माध्यम से विशेष दवाएं तथा अन्य आवश्यक साजो-सामान लेना पड़ता है।
कॉर्पोरेशन मुख्यालय को हमेशा से ही यहां खर्च होने वाले बजट से परेशानी रही है। उसने हमेशा एलपी पर रोक लगाने का पूरा प्रयास किया है। डॉक्टरों एवं अन्य स्टाफ के वेतन आदि पर होने वाले खर्च से भी मुख्यालय को बेहद परेशानी रहती आई है। मजे की बात तो यह है कि दिल्ली के मरीजों को बड़े पैमाने पर फरीदाबाद धकेल दिया जाता है, गुडग़ांव या मानेसर आदि के मरीज तो यहां आते ही हैं। मुख्यालय की नाक के नीचे चलने वाले बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चिकित्सा सुविधाओं को विकसित करने की अपेक्षा मरीज़ों को फरीदाबाद धकेलना उन्हें ज्यादा सुहाता है। संदर्भवश वहां के उक्त मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मात्र छ: आईसीयू बेड हैं जबकि यहां पर 60 भी कम पड़ रहे हैं। खर्च बचाने के चक्कर में न तो बेड संख्या बढ़ाई जा रही है और न ही रेफर करने दिया जाता है। इतना ही नहीं मेडिकल नियमों के अनुसार 60 बेड की आईसीयू के लिए एक शिफ्ट में कम से कम 60 नर्स व 60 नर्सिंग अर्दली (एनओ) तथा तीन डॉक्टर हाजिर तथा शेष ऑनकॉल रहने चाहिएं। इस हिसाब से आईसीयू के लिए 200 नर्स 200 एनओ तथा 12 डॉक्टर हर वक्त हाजिर रहने चाहिए। इसके विपरीत यहां इनकी संख्या एकदम आधी से भी कम है।
फिलहाल कॉर्पोरेशन का एक मात्र लक्ष्य, हर हाल मेंं यहां का बजट जो करीब 600 करोड़ बताया जाता है, घटा कर 300 करोड़ पर लाना है। इसके लिए जरूरी है कि इस अस्पताल को भी बसई दारापुर जैसा बना दिया जाय, जहां 600 बेड में से 300 खाली ही रहते हैं। रेडियोलॉजी, कॉर्डियोलॉजी, कैंसर व कई अन्य प्रकार के मरीजों को फरीदाबाद धकेल कर वे अपना बजट यहां के मुकाबले आधा रखते हैं। सवाल पैदा होता है कि जब फरीदाबाद भी बसई दारापुर के स्तर पर आ जाएगा तो वहां के मरीजों को कौन से कुएं में धकेला जाएगा? अभी तक तो मुख्यालय व मंत्रालय तक के अधिकारी यहां तक कि मंत्री भी इलाज के लिए यहां आया करते थे, ये लोग तो अपने अधिकार का दुरुपयोग करके निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कॉर्पोरेशन के खर्च पर करा लेंगे, लेकिन मुसीबत तो उन मजदूरों की बढ़ेगी जिन्हें न तो कॉर्पोरेशन के अस्पतालों में इलाज मिलेगा और न ही रेफर किए जाएंगे।
ईएसआई डिस्पेंसरियों की दुर्दशा हरियाणा राज्य में केवल फरीदाबाद का एनएच तीन स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल तथा गुडग़ांव के दो छोटे-छोटे अस्पताल कॉर्पोरेशन द्वारा सीधे तौर पर चलाए जाते हैं। राज्य भर के शेष अस्पताल एवं डिस्पेंसरियां राज्य सरकार के द्वारा चलाए जाते हैं। इसके बदले राज्य सरकार को कॉर्पोरेशन द्वारा, कुल खर्च का सात बटा आठ भाग अदा कर दिया जाता है। यानी कि राज्य सरकार यदि आठ रुपए खर्च करती है तो उसमें से सात रुपए कॉर्पोरेशन राज्य को देता है। इसके अलावा अस्पतालों व डिस्पेंसरियों का निर्माण, उनकी मरम्मत, यदि किराए पर है तो किराया देने का दायित्व कॉर्पोरेशन निभाता है। इसके बावजूद राज्य सरकार के निकम्मेपन एवं मज़दूर विरोधी रवैये के चलते इनके अस्पतालों व डिस्पेंसरियों की हालत अत्यंत दयनीय है। यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि इन डिस्पेंसरियों में मरहम-पट्टी व टीका लगाने की व्यवस्था तो है ही नहीं, दवाईयां भी अक्सर नदारद ही रहती हैं।
कॉर्पोरेशन के नियमानुसार डिस्पेंसरियों में दवा उपलब्ध न होने पर मरीज़ बाजार से दवा खरीद कर सरकार से पैसा प्राप्त कर सकता है। यद्यपि इस पैसे की वसूली के लिए तय की गई प्रक्रिया कम जटिल नहीं है, फिर भी मजबूरन मरीज इस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद पैसा लेने के लिए धक्के खा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार राज्य भर में करीब 80 लाख का भुगतान ऐसा अटका हुआ है कि जिसे मरीज़ खर्च कर चुके हैं और हरियाणा सरकार का ईएसआई हेल्थ-केयर विभाग उसकी अदायगी नहीं कर रहा। इसके अलावा उन दवाईयों का तो कोई हिसाब ही नहीं है जिनके बिल जमा कराने की प्रक्रिया में उलझने की मरीजों ने जरूरत ही नहीं समझी।
कुछ लोगों द्वारा पूछे जाने पर विभाग के डायरेक्टर डॉक्टर अनिल मलिक ने वही रटा-रटाया जवाब दे दिया जो वो हर साल देते हैं कि सरकार द्वारा अभी तक बजट रिलीज नहीं किया गया है। शीघ्र ही बजट आने पर भुगतान करने के साथ-साथ अन्य दवाईयां भी खरीद ली जाएंगी। संदर्भवश सुधी पाठक यह भी जान लें कि कॉर्पोरेशन की ओर से 3200 रुपए वार्षिक प्रति बीमाकृत श्रमिक के लिए खर्च करने का प्रावधान है। जबकि राज्य सरकार केवल 1500 रुपए प्रति बीमाकृत के हिसाब से बजट बनाती है। इस फार्मूले के मुताबिक हरियाणा के 30 लाख मज़दूरों के लिए 960 करोड़ रुपए का बजट हरियाणा सरकार को बनाना चाहिए। इसके विपरीत राज्य सरकार हिसाब से 450 करोड़ रुपए का बजट बनाती है और वह भी खर्च नहीं करते। इसका मतलबस्पष्ट है कि पर्याप्त पैसा होते हुए भी मज़दूरों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं देने में सरकार की कोई रुचि नहीं है।