कब मिलेगा राजेंद्र सिंह को इंसाफ मज़दूर मोर्चा (फरीदाबाद) शहरी स्थानीय निकाय, चंडीगढ़ मुख्यालय और न्यायालय के आदेश के बावजूद लगभग तीस साल से नगर निगम में काम कर रहे राजेंद्र सिंह को करीब दो दशक तक स्थायी नहीं किया गया। 2014 में स्थायी किया गया तो पदोन्नति इसलिए नहीं की गई कि उसने एरियर के रूप मेें मिलने वाली मोटी धनराशि में दस प्रतिशत कमीशन देने से इनकार कर दिया था। इसका खामियाजा राजेंद्र सिंह आज तक भुगत रहा है, मुख्यालय के आदेश के बावजूद पहले तो स्थापना शाखा अधीक्षक वीके वर्मा ने तथ्य छिपाकर उसकी पदोन्नति रोकी उसके बाद अधीक्षक बना गिर्राज फाइलों पर कुंडली मारे बैठा रहा। राजेन्द्र सिंह 1992 में नलकूप ऑपरेटर के पद पर नगर निगम में भर्ती हुए थे। तब से वह पूरी ईमानदारी से काम करते आ रहे हैं। हरियाणा सरकार की नियमितीकरण पॉलिसी एम.सी.एफ. ई-97/344दिनांक 18.03.1996 के तहत राजेंद्र सिंह भी स्थायी होने के पूर्ण पात्र थे। तत्कालीन स्थापना शाखा अधीक्षक वीके वर्मा ने स्थायी करने के लिए राजेंद्र सिंह से मोटा शुकराना मांगा था। शुकराना नहीं मिला तो वीके वर्मा ने राजेंद्र से जूनियर कई कर्मचारियों को स्थायी कर दिया। स्थायी नहीं किए जाने पर राजेंद्र सिंह ने इसकी शिकायत तत्कालीन निगमायुक्त से लेकर यूएलबी मुख्यालय तक में की। चंडीगढ़ मुख्यालय की ओर से कराई जांच मेें पाया गया कि वीके वर्मा ने नाइंसाफी की और राजेंद्र को हक से वंचित कर जूनियर कर्मचारियों को स्थायी किया। जांच रिपोर्ट पर सरकार ने वीके वर्मा के खिलाफ रूल सात के तहत चार्जशीट जारी की। निगमायुक्त से करीबी और अपने प्रभाव के चलते वर्मा चार्जशीट को काफी समय दबाए रहा, इस दौरान उसने राजेंद्र सिंह पर समझौता करने और शिकायत वापस लेने का जोरदार दबाव बनाया था।
वर्मा के हथकंडों से तंग आकर राजेंद्र सिंह ने 2022 में अतिरिक्त मुख्य सचिव एसीएस यूएलबी चंडीगढ़ से इंसाफ की गुहार लगाई। उनकी शिकायत पर अतिरिक्त निगमायुक्त से फाइल का निरीक्षण कराया गया। एसीएमसी ने मुख्यालय को पत्र लिखकर अवगत कराया कि राजेंद्र सिंह 1992 से निर्विवाद रूप से नगर निगम में सेवाएं दे रहा है। इस पर मुख्यालय से स्पष्टीकरण तलब किया गया कि राजेंद्र को 1996 की नियमितीकरण पॉलिसी के तहत स्थायी क्यों नहीं किया गया?
इस समय तक वीके वर्मा का चेला गिर्राज स्थापना शाखा का अधीक्षक बन चुका था, अपने गुरु को बचाने के लिए उसने भी राजेंद्र सिंह की फाइल पर बेवजह की आपत्तियां आदि लगाकर अधिकारियों को गुमराह किया। आरोप है कि गिर्राज ने राजेंद्र पर वीके वर्मा से समझौता करने, एरियर का दस प्रतिशत धन देने का दबाव बनाया और फाइल पर कुंडली मार कर बैठ गया। रिश्वत देने के बजाय राजेंद्र ने संघर्ष का रास्ता चुना और एक बार फिर गिर्राज की शिकायत अक्तूबर 2023 को निगमायुक्त से की। मामले की सच्चाई समझने के बाद निगमायुक्त ने कड़ा रुख अपनाते हुए गिर्राज को फटकार लगाई और फाइल पर गैर जरूरी टिप्पणी करने से स्पष्ट मना कर दिया, निगमायुक्त के आदेश पर स्थापना अधिकारी ने भी बार बार समझाने का प्रयास किया, बावजूद इसके गिर्राज हरकतों से बाज नहीं आया और उल्टे सीधे कारण बता कर आपत्ति लगाता रहा।
इस दौरान राजेेंद्र सिंह ने एक बार फिर एएलबी मुख्यालय चंडीगढ़ का दरवाजा खटखटाया। यूएलबी से आए पत्र के जवाब लेखाधिकारी और न्यायावादी शाखा ने राजेंद्र सिंह के पक्ष में रिपोर्ट निगमायुक्त को सौंप रखी थी लेकिन गिर्राज ने इनको दरकिनार कर गलत तथ्यों के साथ रिपोर्ट पेश की। नियमों का उल्लंघन करने के खुले सुबूत होने के बावजूद गिर्राज के खिलाफ न तो निगमायुक्त और न ही चंडीगढ़ मुख्यालय ने कोई ठोस कार्रवाई की। नतीजतन राजेंद्र सिंह को आज तक इंसाफ नहीं मिल पाया है। मजबूर होकर राजेंद्र सिंह ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, चीफ सेक्रेटरी हरियाणा को पत्र लिख कर इंसाफ दिलाने की गुहार की है। उन्होंने मामले की जांच सीबीआई, एंटी करप्शन ब्यूूरो तथा उच्च स्तरीय कमेटी से करा दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर नजीर बनाने की मांग की है ताकि भविष्य में कोई भ्रष्ट अधिकारी कर्मचारियों के हक से खिलवाड़ न कर सके।